महान लेखक की यह महानता होती है कि सामने वाले को अपनी महानता से डराता नहीं है!

-समरेंद्र सिंह-

राजेंद्र यादव – आप जिंदा हैं और हमेशा जिंदा रहेंगे!

जिंदा हो? राजेंद्र यादव जी के ये शब्द अक्सर कान में गूंजते हैं। जब भी बात किए लंबा समय हो जाता था तो मिलने पर वो यही सवाल किया करते थे। और मैं हर बार उनसे कहता था कि जिंदा रहने की कोशिश कर रहा हूं। मैं झूठ बोलता था और अपने झूठ को मुस्कुराहट से छिपाने का प्रयत्न करता था। जवाब में वो भी मुस्कुरा देते थे। वो सच जानते थे। राजेंद्र जी को पहली बार मैंने 1997 में आईआईएमसी में देखा था। वो एक लेक्चर देने आए थे। उनसे पूछा गया कि आप प्रतिष्ठित लेखक हैं, हंस के संपादक हैं, क्या अब भी कुछ ख्वाब बाकी हैं? जवाब में उन्होंने एक शेर सुनाया। शायर कौन है, मुझे नहीं पता। मगर वो शेर मुझे आज भी याद है।
जिंदगी एक मुसलसल सफर है,
जो मंजिल पर पहुंचे तो मंजिल बढ़ा दी।

इस छोटी सी घटना के बाद उनसे मेरी मुलाकात जुलाई 1998 में हुई थी। उन दिनों मैं मेरठ में अमर उजाला में काम कर रहा था और छुट्टी में घर आया हुआ था। एक दोपहर किसी और से मिलने मैं हंस के दफ्तर पहुंचा, वहां राजेंद्र जी से मुलाकात हो गई। उन्होंने बेतकल्लुफ अंदाज में मेरा परिचय मांगा। फिर पूछा कि इन दिनों क्या पढ़ रहे हो? ये उनका पसंदीदा सवाल था। हर नौजवान से वो ये पूछते थे। उन दिनों मैंने पी साईनाथ की किताब “Everybody loves a good drought” खत्म की थी। उन्होंने कहा कि यार मैंने भी इस किताब की बहुत तारीफ सुनी है। हंस के लिए रिव्यू लिख दो। ये सुन कर मैं चौंक गया। मैंने पूछा कि छपेगा? उन्होंने कहा कि अच्छा लिखोगे तो जरूर छपेगा। इतने में चाय आ गई। जब तक चाय खत्म होती। राजेंद्र जी “दोस्त” बन गए थे। उन्होंने मेरे भीतर के संकोच को तोड़ दिया था। एक महान लेखक की ये महानता होती है। वो सामने वाले को अपनी महानता से डराता नहीं है।

एक महीने में मैंने वो समीक्षा पूरी की। फिर डॉ दुर्गा प्रसाद ने उसे पढ़ा। उसमें कुछ जरूरी संशोधन किए। कुछ सुझाव दिए। डॉ दुर्गा लाजवाब शख्स हैं। बेहतरीन इंसान। शानदार गुरु। मैं पत्रकारिता में आया तो इसका श्रेय डॉ दुर्गा को जाता है। मैंने उनके सुझावों के आधार पर फाइनल ड्राफ्ट तैयार किया। जिसे पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि अब तुम इसे राजेंद्र जी को सौंप सकते हो। मैंने वो समीक्षा राजेंद्र जी को सौंप दी। कुछ दिन बाद उनके दफ्तर से एक चिट्ठी मिली कि समीक्षा स्वीकार हो गई है और अक्टूबर 1998 के अंक में छपेगी। उन दिनों हंस में छपना एक बड़ी बात थी। वो हंस राजेंद्र यादव का हंस था। जीवन में मेरा कुछ लिखा पहली बार छपने जा रहा था। मैं बहुत उत्साहित था। उसी उत्साह में मैंने सितंबर में अमर उजाला की नौकरी छोड़ दी और मेरठ से दिल्ली घर लौट आया। अक्टूबर में जब हंस की प्रति आयी तो उसके कवर पेज पर मेरा नाम था। समीक्षा को उन्होंने लेख के तौर पर छापा था। शीर्षक था – अल्लाह सूखा दे, बाढ़ दे! हंस में छपने की खुशी इतनी अद्भुत थी कि मैं बयां नहीं कर सकता। किसी नौजवान लेखक को ऐसी खुशी राजेंद्र यादव ही दे सकते थे। वो लिखने के लिए उत्साहित करते थे। फिर धीमे-धीमे तराशते थे। गढ़ते थे। मेरी जानकारी में उन्होंने बहुत से साहित्यकारों को गढ़ा है। उनमें से कुछ मेरे करीबी हैं।

राजेंद्र जी बड़े लेखक तो थे ही, वो बहुत सच्चे लेखक भी थे। इसी वजह से उनका विवादों से भी नाता था। “होना सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ” जब उन्होंने लिखा और हंगामा खड़ा हो गया तो मैं उनसे मिलने पहुंचा। मैंने पूछा कि क्या जरूरत है बवाल मचाने की? लोग इस उम्र में शांत रहते हैं, लेकिन आप हैं कि कुछ न कुछ बवाल करते रहते हैं। उन्होंने कहा कि यार लेखक को जो महसूस हो वो लिख ही देना चाहिए। उसके शब्द ही उसकी पूंजी होते हैं। वो मानते थे कि जो लेखक अच्छे-बुरे सभी अनुभवों को, तमाम संघर्षों को, जिंदगी के हर रंग को, दुनिया के अश्लील चेहरों को जितनी ईमानदारी और सच्चाई से दर्ज करेगा वह लेखक उतना जिंदा रहेगा। इसलिए उन्होंने सब लिख दिया। सब कह दिया। लिखने और कहने के इस सफर में वो उस मुकाम तक पहुंचे जहां बहुल कम रचनाकार ही पहुंच पाते हैं। उतना साहस और उतनी ईमानदारी बहुत कम लोगों में होती है।

राजेंद्र जी मिलते वक्त खुद को फिल्टर नहीं करते थे और उनसे कोई भी मिल सकता था। दिल्ली के दरियागंज में मौजूद हंस के दफ्तर में हर रोज दोपहर बाद उनकी महफिल सजती थी। देश के बड़े बड़े साहित्यकारों के साथ कोई भी उस महफिल में शामिल हो सकता था। सबकी बातें सुन सकता था। सबसे बात कर सकता था। प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, अर्चना वर्मा, गिरिराज किशोर, संजीव, रवींद्र कालिया, ममता कालिया, संजय सहाय जैसे बड़े लेखकों को मैंने उसी महफिल में देखा। राजेंद्र जी की उस महफिल में थोड़ी-थोड़ी देर पर चाय आती थी। वो बीच में अपने पाइप से तंबाकू का एक-दो कश लेते थे। उन दिनों मैं भी सिगरेट पीता था। उनका भी मन कभी कभी कर जाता था। डॉक्टर ने उन्हें मना किया था। लेकिन वो बोलते थे कि डॉक्टरों का क्या है, उनका वश चले तो वो सांस पर पहरा बिठा दें। फिर हम दोनों सिगरेट सुलगाते और पीते।

मशहूर वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन ने दुनिया को E = mc2 का फॉर्मूला दिया था। यह फार्मूला बताता है कि जिसमें जितना मास होता है उसमें उतनी ऊर्जा भी होती है। इस अनित्य ब्रह्मांड में कुछ भी नष्ट नहीं होता। बस परिवर्तित हो जाता है। यहां विघटन और सृजन की प्रक्रिया साथ-साथ चलती है। ठीक ऐसे ही हर रचनाकार भी थोड़ा टूटता है तो कुछ रचता है। टूटने और रचने के इस क्रम में बहुतेरे रचनाकार जल्दी चले जाते हैं। विंसेंट वॉन गॉग, अलेक्जांद्र पुश्किन, नित्से … जैसे अनेक रचनाकार जब सृजन के चरम पर थे, तभी दुनिया से चले गए। भारत में भी जयशंकर प्रसाद, मुक्तिबोध, राजकमल चौधरी जैसे कई साहित्यकार हुए हैं जो बहुत जल्दी चले गए। किसी ने खुदकुशी कर ली। कोई मारा गया। कोई पागल हो गया तो किसी ने असमय किसी गंभीर बीमारी से दम तोड़ दिया।

टूटने की इस प्रक्रिया को धीमा करने की क्षमता बस प्रेम में है। प्रेम में वो शक्ति है जो बेजान रूह में जान डाल दे। राजेंद्र जी की यही खूबी थी कि वो जी भर के प्रेम करते थे। नफरत और कुंठाएं उनमें बहुत कम थीं। वो ममत्व और करुणा से भरे हुए थे। इसी प्रेम, ममत्व और करुणा ने इन्हें काफी समय तक जिंदा रखा। ये और बात है कि उम्र के आखिरी पड़ाव में उन ज्यादातर लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया था जिन्हें उन्होंने अपने प्रेम और ममत्व से सींचा था। इन लोगों में मैं भी शामिल हूं। एक-दो बेहूदे इंसानों ने तो पहले उनसे कई तरह के लाभ लिए और फिर काम निकल गया तो गालियां दीं। ऐसे एक घटिया इंसान को उनसे मिलवाने का अपराध मैंने भी किया था (अपने उस अपराध पर कभी विस्तार से लिखूंगा)। आज उसका अफसोस होता है। जब भी सोचता हूं तो गुस्से से भर जाता हूं कि कोई इतना गिरा हुआ कैसे हो सकता है कि एक बुजुर्ग को उसके घर की दहलीज पर चढ़ कर गालियां दें। ऐसा कोई बेहद विकृत इंसान ही कर सकता है।

मशहूर दार्शनिक रेने देकार्ते ने 17वीं शताब्दी में कहा था कि “I Think therefore I am.” इसी बात को आगे बढ़ाते हुए किसी ने कहा कि बात सिर्फ सोचने की नहीं है, बात यह भी है कि सोचा तो क्या सोचा! दुनिया को दिया तो क्या दिया! राजेंद्र जी इस दुनिया को और हम सभी को काफी कुछ देकर गए हैं। शब्दों से उन्होंने अनुभव का जो अथाह सागर रचा है, आने वाली पीढ़ियां उसमें गोता लगा कर अपने हिस्से की मोतियां बीनती रहेंगी।

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