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सुख-दुख

राजेश अवस्थी जैसे वरिष्ठ पत्रकार आर्थिक तंगी में दुनिया छोड़ देते हैं और सिस्टम चुप रहता है!

अनुराग मुस्कान-

कहते हैं पत्रकार बहुत मजबूत होते हैं… क्योंकि वो हर दिन मौत देखते हैं। एक्सीडेंट देखते हैं… लाशें देखते हैं… रोती हुई माँएँ देखते हैं… उजड़े हुए घर देखते हैं… टूटे हुए लोग देखते हैं…

लेकिन सच क्या है पता है?

सबकी कहानियाँ दिखाने वाला पत्रकार… धीरे-धीरे अपनी ही कहानी के अंदर मर रहा होता है…

कभी किसी अस्पताल के बेड पर… जहाँ इलाज के पैसे नहीं होते। कभी किराए के घर में… जहाँ महीने की आख़िरी तारीख़ डराती है… कभी नौकरी छूटने के बाद… जहाँ फोन बजना बंद हो जाता है…

कई पत्रकारों को देखकर लगता है.. वो मजबूत हैं… लेकिन अंदर से वो बस एक फोन कॉल दूर होते हैं टूटने से…

दुनिया की खबर रखने वालों… अब एक-दूसरे की भी खबर रखो… कहीं ऐसा न हो कि कल तुम्हारी कहानी भी किसी थंबनेल का हिस्सा बन जाए…


News thumbnail: man lying on pavement while a bystander in gloves offers water as others look on; people outdoors wearing masks in the background.

देश के बड़े उद्योगपति हर चुनाव में राजनीतिक पार्टियों को हजारों करोड़ का चंदा देते हैं.
लेकिन क्या कभी उन्होंने उन पत्रकारों के बारे में सोचा, जो दिन-रात समाज और लोकतंत्र के लिए काम करते हैं .
राजेश अवस्थी जैसे वरिष्ठ पत्रकार आर्थिक तंगी में दुनिया छोड़ देते हैं और सिस्टम चुप रहता है.
अंबानी, अडानी और देश के बाकी बड़े उद्योगपतियों को भी आगे आना चाहिए।
ऐसे पत्रकार परिवारों के लिए एक स्थायी सहायता कोष बनना चाहिए.
जो लोग सत्ता, समाज और देश की आवाज़ बनते हैं, कम से कम उनके परिवार बेसहारा न रहें। -संजय शर्मा, संपादक, 4पीएम

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