चाट का ठेला चलाना आज की पत्रकारिता से कई गुना बेहतर है, देखें तस्वीर

दिनेश चौधरी-

चाट-पकौड़ी वाली पत्रकारिता… सबको मालूम है कि चाट-पकौड़ी सेहत के लिहाज से बहुत मुफीद नहीं होती। यह बस चटखारे लेकर खाने में मज़ा देती है। इन दिनों पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ भी चल रहा है, वो मामला चटखारों से बहुत आगे निकल चुका है। धीमा जहर भी नहीं कह सकते। कहना ही हो तो तेज कहना होगा। एक बार गाँधी जी के सामने रवींद्र बाबू लूची-साग खा रहे थे। गाँधी जी ने कहा, ‘यह धीमा जहर है।” रवीन्द्र बाबू ने कहा, “मुझे भी कोई जल्दी नहीं है।” इधर लगता है कि मुल्क के लोगों में बड़ी जल्दी मची हुई है। इसलिए मजाक में ही सही Rakesh Achal जी को चाट के ठेले का ख्याल आया है, तो इसमें कुछ बुरा नहीं है।

चाट का ठेला चलाना आज की पत्रकारिता से कई गुना बेहतर है। पहले की पत्रकारिता में पत्रकारों की बड़ी इज्जत थी। पैसे भले ही न मिलते हों, रसूख बड़ा हुआ करता था। लोग पीठ पीछे भी इज्ज़त करते थे। सम्पादकों का कहना ही क्या। सम्पादक के नाम पर अखबार की छवि बनती थी कि फलां अखबार फलाने सम्पादक का है। दबंग किस्म के लोग पत्रकारों से डरते थे। अपवादस्वरूप कुछ छुटभैये भी होते थे, जिनको कोई गम्भीरता से नहीं लेता था। कालांतर में यह क्रम उलट गया। वसूली का जो काम छुटभैया पत्रकार करता था, वह दायित्व बहुत से मालिकान ने अपने कंधों पर ले लिया। ऐसे में कोई संजीदा पत्रकार चाट का ठेला लगा ले तो क्या बुराई है? वैसे भी आजकल के अखबार बस भेल-पूरी खाने के काम के बचे हैं।

पकौड़ा तलने को रोजगार की मान्यता मिलने के बाद यह अब एक सम्मानित पेशा हो चुका है। यों पत्रकारिता और चाट के धंधे में बहुत-सी समानताएं हैं। ज्यादा मात्रा में सेवन किए जाने पर एक दिमागी सेहत के लिए हानिकारक है, दूसरी जिस्मानी। अपच हो सकती है। दस्त और कै के दौरे पड़ सकते हैं। पड़ ही रहे हैं। आप सब देख तो रहे हैं। अपने जमाने में बड़े बुजुर्गों से डांट पड़ती थी कि “तुम सब फालतू की चीजें देखते-सुनते हो! समाचार देखो। ज्ञान बढ़ेगा।” अब हम बच्चों को समाचार देखने पर डांटने लगे हैं। कहने लगे हैं कि कुछ और देखो, न्यूज मत देखो। अब तो अमिताभ बच्चन भी अपने साथ हो गए हैं। कह रहे हैं, जहाँ से मिले बटोर लो, पर थोड़ा-सा टटोल लो।

माफ कीजिए! बात चाट के ठेले पर हो रही थी। ठेले पर एक ही चीज के कई नाम होते हैं, पर सामग्री एक ही होती है। कोई गोलगप्पे कहता है, कोई पुचके, कोई गुपचुप, कोई फुल्के, कोई पानी पूरी, कोई पानी बताशे। चीज वही है। ऐसे ही अपने यहाँ बहुत से न्यूज चैनल हैं, बहुत से अखबार हैं जो अलग-अलग नाम के हैं पर उनमें चीज एक ही होती है। पानी-पूरी में असली मजा तब आता है, जब मिर्च जरा तेज हो। पत्रकारिता के धंधे में भी यही चल रहा है। इन दिनों मिर्च कुछ ज्यादा ही तेज हो गयी है। यह नफरत की शक्ल में है। मुँह में रखते ही जोर का ठसका लगता है। जिसके ठेले में जितना ज्यादा ठसका लग रहा है, वो उतना पॉपुलर हो रहा है।

चाट के ठेलों में दही-भल्ले भी बड़े मशहूर होते हैं। अब भल्ले गायब हो गए और सिर्फ दही रह गया जो रायता बनाने के काम आता है। रायता बनाने में असली मजा इसे फैलाने का है। जो जितना ज्यादा रायता फैलाता है, उसे उतनी ज्यादा टीआरपी मिलती है। कुछ ठेले वाले तो एक ही खबर का रायता महीने भर फैला लेते हैं।

चाट के ठेले का असल मंजर तब सामने आता है, जब ठेले वाला कारोबार समेट कर बढ़ लेता है। नीचे पत्तलों-दोनों का कूड़ा होता है। आवारा कुत्ते इन्हें चीथते हैं। मक्खियों का झुंड इन पर भिनभिनाता है। गन्दगी देखकर उबकाई आती है। इन दिनों की पत्रकारिता भी यही कर रही है!

अचल जी अलग मिजाज के पत्रकार हैं। उनके ठेले का जायका अलग होगा। चाहें तो अपने ठेले में मुझे शागिर्दी सौंप दें।



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