शालिनी श्रीनेत-
राइटर्स रेजिडेंसी में लेखकों को बुलाया गया था, जहां वो लड़की जो पार्टीसिपेट करने गयी थी, जब रात को अपने कमरे में गयी और अपना बिस्तर ठीक कर रही थी तभी कवि कृष्ण कल्पित उसके साथ अभद्र व्यवहार किया। जब लड़की ने ऐतराज जताया और शिकायत करने की बात कही तो बोले, जाओ करो ! कौन मानेगा तुम्हारी बात? मेरे पास तो लड़कियां-महिलाएं खुद आती हैं।
लड़की ने शिकायत दर्ज कराई और लिखित माफीनामा मांगा। वह महान लेखक खुद बोरिया बिस्तर बांधकर निकल लिए वहां से। जो ये कह रहे थे कि कौन मानेगा तुम्हारी बात… वो एक शिकायत पर सुनहरा अवसर छोड़ कर निकल लिए।
उन्होंने सोचा और महिलाओं की तरह ये भी चुप रह जाएगी गीदड़-धमकी से डरकर। ये तो बहादुर निकली और दिखा दिया कि स्त्री अपने पर आ जाए सारे घमंड, सारे पावर धरे के धरे रह जायेंगे। वो कौन स्त्रियां हैं जो खुद जाती हैं और क्यों जाती हैं? अरे यार अपने दम पर लिखो आगे बढ़ो… मेहनत का फल मीठा होता है। सब जानते हैं। थोड़ा कम लिखो पर अपना हो, सबकुछ प्योर अपना। ये पुरूषों की खुद को सुपर बताने की आदत नहीं जाएगी अगर अपने पर भरोसा नहीं करोगी। पुरुष कोई ऊपर से अलग से ज्ञान लेकर नहीं पैदा होता वो भी जमीन पर ही आकर पढ़ता और सीखता है।
ये अक्सर सुनने को मिलता है फलां लेखक, फलां पत्रकार ने फलां लड़की को आगे बढ़ाया, लेखक बना दिया पत्रकार बना दिया। अरे भाई, अगर किसी में कोई गुण, हुनर नहीं होगा तो भला कोई कैसे किसी को कुछ बना सकता है। ये पितृसत्ता के पोषक स्त्रियों को हमेशा दोयम दर्जे का समझते हैं। जबकि स्त्रियों के अवसर छीनते रहे, बेड़ियां डालते रहे।
गजब का दंभ है कि लड़कियां खुद आती हैं… न उम्र ख्याल है न समाज का लिहाज।
मेरी जानकारी के मुताबिक POSH कानून (सेक्सुअल हैरेसमेंट ऑफ वीमन ऐट वर्कप्लेस) वर्कशॉप, सेमिनार, प्रशिक्षण कार्यक्रम जैसे अस्थायी कार्यस्थलों पर भी लागू होता है। सबको पता है कि यह कानून महिलाओं की सुरक्षा के लिए है। अगर इसका पालन भी न हो तो स्त्रियां किसी आयोजन या वर्कशॉप में खुद को कैसे सुरक्षित महसूस करेंगी?
मैं उस राइटर्स रेजिडेंसी के आयोजकों से सवाल पूछती हूं कि उन्होंने अब तक क्या ऐक्शन लिया कृष्ण कल्पित के खिलाफ? और यह सवाल उन सभी लोगों को पूछना चाहिए जिन्होंने उस रेजिडेंसी में हिस्सा लिया, या जो लोग उसके संचालकों को जानते हैं।
आखिर मोरल रिस्पांसिबिलिटी भी होती है…
संजीव चंदन-
पटना कांड में जिस ‘नई धारा ‘ संस्था के राइटर्स रेजिडेंसी का प्रसंग बताया जा रहा है,उसकी परम्परा बहुत समृद्ध रही है। नई धारा पत्रिका और संस्था से प्रतिष्ठित लेखक राजा राधिका रमण सिंह का संबंध है। उनकी कहानी ‘ दरिद्रनारायण ‘ हमारे कोर्स में होती थी।
इस परिवार से ही बिहार की पहली महिला आईपीएस हैं, और देश की पांचवीं।
पत्रिका का गौरवशाली इतिहास रहा है। लेकिन बातें जितनी उसके राइटर्स रेजिडेंसी के लेखक कृष्ण कल्पित के बारे में सामने हैं, उसमें संस्था की भूमिका सवालों के घेरे में है।
संस्था ने हमारे सवालों पर चुप्पी बना रखी है। न इन्कार कर रही है घटना से, न स्वीकार।
सवाल है कि राइटर्स रेजिडेंसी प्रोग्राम के लिए किसी लेखिका के रिकमेंडेशन पर कृष्ण कल्पित का नाम आया तो संस्था ने उनके 10 सालों के सार्वजनिक व्यवहार को क्यों नहीं देखा?
सवाल है कि कृष्ण कल्पित पर आरोप लगा और संस्था ने उन्हें भगा भी दिया। कृष्ण कल्पित पर आरोप लगने भर से वे भगाये गये। कोई जांच हुई? कोई समिति? इस परिवार से आईपीएस हैं क्या वे कानून से भी समझती नहीं हैं कि 10 खून का दोषी 11 वें का बिना जांच, ट्रायल के दोषी नहीं हो सकता।
जांच क्यों नहीं हुई। हुई तो किसने की? हुई तो संस्था मौन क्यों है? हुई तो पीड़िता को साहस क्यों नहीं दिया गया कि इस मामले में पारदर्शिता जरूरी है और यदि कानून से सजा नहीं तो सार्वजनिक रूप से इसे लोगों तक लाना जरूरी है। संस्था आगे इस प्रोग्राम को जेंडर फ्रेंडली बनाने के लिए क्या कर रही है?
पीड़िता बहादुर हैं। जितनी घटना सामने है, उसके हिसाब से उन्होंने अपने हरासमेंट के खिलाफ मुकाबला किया। कल्पित रसूखदार हैं और कहा जा रहा है कि रसूख का धौंस भी वे दे रहे थे। तब भी वह लड़ी। लेकिन संस्था उसे प्रोटेक्ट करने में और न्यायिक ढंग से काम करने में विफल रही। और दोनों को न्याय की प्रक्रिया से न्याय देने में विफल।
कल से लगातार नाम नाम चल रहा है। कल्पित जब राइटर्स रेजिडेंसी बने तब उनको मिलने वाली बधाईयों के द्विअर्थी टोन के कुछ स्क्रीन शॉट मेरे इनबॉक्स में आए हैं। यही साहित्य समाज है। बड़े नाम हैं।
पटना में एक समूह है, जो संस्थाओं को अपने हिसाब से हांकता है, उसके लोग दिल्ली में हैं। हालात यह है कि सरकार के पुरस्कार भी वे तय करते हैं, करवाते हैं। जाहिर है हाई कास्ट हिंदू मेल की दावेदारी है।
लोग पीड़िता का नाम खोज रहे, बिना जांच के कृष्ण कल्पित का बहिष्कार कर रहे। सब भेड़ चाल है। कोई संस्था की बात नहीं कर रहा। क्योंकि संस्थानों में धन है, पुरस्कार है, छपने की व्यवस्था है। हजारों करोड़ की राशि है, जिस कर लगभग सवर्ण पुरुषों का कब्जा है। इसलिए कोई बिगाड़ नहीं चाहता।
साहित्य की ऐसी घटनाओं में हर बार जाति और जेंडर के सवाल पर साहित्यकारों की पोल खुल जाती है। चौतरफा तफरी के भी फोन, पोस्ट और संवाद घूम रहे हैं। इनमें महिलाएं भी शामिल हैं।
लेकिन रिसीविंग एंड पर महिला ही होती है।
नई धारा को अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप इस पर स्पष्टता लानी चाहिए। राजा राधिका रमण सिंह से जुड़ी इस संस्था का यही महत्व है।
और साहित्यकारों को, हमें ऐसे कई प्रसंगों पर हमारे सेलेक्टिव एप्रोच पर विचार करना चाहिए।

प्रियंका दुबे-
यह बेहद बुनियादी बात है कि यौन शोषण के किसी भी मामले में विक्टिम की अपनी एजेंसी का महत्व सबसे ऊपर है। आप उसे आगे आने के हवाले से महफ़ूज़ महसूस करवा सकते हैं, आप उसे पूरा समर्थन दे सकते हैं, pro bono लीगल ऐड उपलब्ध करवा सकते हैं, आप उसके रास्ते में आ रही बाधाओं को दूर करने में मदद कर सकते हैं, थाने इत्यादि के चक्करों में साथ रह सकते हैं, थेरेपी की व्यवस्था कर सकते हैं – लेकिन बस इतना ही। मूल शिकायत के लिये, जिसकी गोपनीयता यूँ भी भारतीय क़ानून के तहत सुनिश्चित की जाती ही है, उसे आगे आना ही पड़ता है।
ऐसा सैकड़ों मामलों में होता है जब पीड़िता शिकायत करने सामने नहीं आना चाहती या शिकायत ही नहीं करना चाहती, जिसके बहुत से कारण हो सकते हैं। कारणों का अनुमान लगाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यूँ भी भारत में यौन शोषण या बलात्कार के जो मामले ऑन रिकॉर्ड FIR के रूप में दर्ज होते हैं, उन्हें सिर्फ़ ‘tip of the iceberg’ कहा जाता है। हज़ारों सैकड़ों ऐसे मामले हैं जो क़ानून तक पहुँचते ही नहीं।
इसकी मूल वजहों में से कुछ इस प्रकार हैं –
- विक्टिम ब्लेमिंग का हमारा पुराना इतिहास
- यौन शोषण से साथ जुड़ा हुआ सोशल स्टिगमा
- परिवार, परिजनों, मित्रों द्वारा भविष्य और बदनामी का वास्ता देकर हतोत्साहित किया जाना
- इन मामलों में अब तक पुलिस और अदालत के लचर और उदासीन रवैये का बहुत हिम्मत बँधाने वाला न होना। हमारी क्रूर और लम्बी न्यायिक प्रक्रिया आम लोगों में घबराहट पैदा करती है।
अगर कोई विक्टिम किसी का नाम नहीं लेना चाहती या ऑन-रिकॉर्ड शिकायत नहीं करना चाहती तो सबसे महतपूर्ण है कि उसे जज न किया जाए। दिल्ली-बंबई के प्रिविलेज्ड तबके को कभी समझ नहीं आएगा कि यह सब कितना मुश्किल होता है। हर चीज़, उदाहरण के लिए, अंग्रेज़ी के सेलेक्ट ऑनलाइन स्पेस में चल सकने वाला ‘मी टू’ का कॉल आउट नहीं होती। यह पीड़ित की एजेंसी है कि वह क्या करना चाहती है। उसका निर्णय है, क्योंकि जीवन भी उसी का है। आप उसे समझा सकते हैं, उसे सपोर्ट कर सकते हैं- लेकिन आख़िरी निर्णय तो उसी का है। आप इतने trauma के समय में किसी को किसी भी चीज़ के लिए फ़ोर्स नहीं कर सकते।
मैंने ख़ुद ऐसे कितने ही मामले देखे हैं जहाँ सामाजिक कार्यकर्ताओं के सपोर्ट के बावजूद लोग थाने पहुँचकर भी बैक आउट कर जाते हैं। आपको इस बात को स्वीकार करना होता है कि यही उसका निर्णय है। आप क्रांतिकारी हैं लेकिन आपको यह समझना होगा कि आपको कहाँ रुक जाना है। भारत में ऐसी लड़ालियाँ लड़ना बहुत मुश्किल होता है।
यह सब बहुत गम्भीर मामले होते हैं लेकिन हिन्दी में हर चीज़ का मज़ाक़ बनना-बनाना संभव है। मेरी माँ घर में अक्सर हमें डाँटते हुए एक शब्द इस्तेमाल करती हैं – हींड देना। इसकी भावना के सबसे क़रीब जो शब्द मुझे याद आ रहा है वह है – कचवाईन मचा देना। कभी कभी मुझे लगता है कि हिन्दी के फ़ेसबुक संसार में लोगों को टीवी सीरियल टाइप जीवन का बहुत चस्का है। हर बात में पत्रकारिता के स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले 5W1H जानने की इच्छा इनकी प्रबल हो जाती है। हर चीज़ गॉसिप है। जिस क्षेत्र का ज्ञान बिल्कुल न हो, उसमें भी सबको राय रखनी है। एक तरह का चौपाल है जहाँ जजमेंट सुनाया जाता है आदि आदि।
दुनिया इससे अलग है। कठिन जगह है। वहाँ इन सबसे कोई बात नहीं बनती। FIR की दरकार होती है। और कोई न करना चाहे तो वह उसकी इच्छा है, इसे स्वीकार करना होता है। करना चाहे तब (ही) बात आगे बढ़ती है।




