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राष्ट्रपति के संबोधन में ‘इमरजेंसी’ और उसकी सबसे फूहड़ प्रस्तुति अमर उजाला में

संजय कुमार सिंह

राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में ‘इमरजेंसी’ का उल्लेख किया पर ज्यादातर अखबारों ने शीर्षक में इससे बचने की कोशिश की है। हिन्दी के अखबारों ने भी इमरजेंसी के जिक्र को ही खबर बनाया है लेकिन अमर उजाला ने इसे ‘घेराबंदी’ मानकर न सिर्फ ज्ञान दिया है बल्कि इसके मायने भी समझाये हैं। हालांकि, इससे यह नहीं समझ में आता है कि यह संपाकीय है, खबर या फिर पेड न्यूज। इमरजेंसी से घेरना ही हो तो कंगना रनौत की फिल्म भी आ रही है, वे उसके प्रचार के लिए अपने स्तर पर प्रयास और उम्मी कर रही हैं। यही नहीं, इमरजेंसी पर हाल में कुछ किताबें भी आई हैं या लिखवाई गई हैं। एक किताब अघोषित इमरजेंसी पर भी है। कायदे से यह सब राष्ट्रपति को पहले ही बताया जाना चाहिये था। सरकार और अखबार जब इमरजेंसी को इस तरह याद कर रहे हैं तब केजरीवाल की गिरफ्तारी और उन्हें किसी तरह जेल में रखने के प्रयासों और उपायों के कारण उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल के ट्वीट यही इमरजेंसी है के बारे में आप कल पढ़ चुके हैं। आज खबर है कि आम आदमी पार्टी के सांसदों ने राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार किया और कल देश व्यापी आंदोलन की योजना है। द हिन्दू ने आज इस खबर को चार कॉलम में छापा है। एक और महत्वूर्ण खबर द हिन्दू में है। कल आपने पश्चिम बंगाल के नव निर्वाचित विधायकों को शपथ नहीं दिलाये जाने का मामला पढ़ा था। आज खबर है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि महिलाएं राजभवन में खुद को सुरक्षित नहीं समझती हैं।

आज 18वीं लोकसभा में संसद के दोनों सदनों को राष्ट्रपति द्वारा संबोधित किये जाने की खबर मेरे सात में से दो अखबारों (द हिन्दू और द टेलीग्राफ) में लीड नहीं है। द हिन्दू में सेकेंड लीड है जबकि कोलकाता के द टेलीग्राफ में खबर अंदर होने की सूचना भर है। द टेलीग्राफ ने कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल के बयान को आज का कोट बनाया है। उन्होंने कहा है, “लोकसभा अध्यक्ष के पद से (इमरजेंसी पर) इस तरह का राजनीतिक संदर्भ संसद के इतिहास में अभूतपूर्व है”। शायद इसीलिए अखबार की सेकेंड लीड स्पीकर की शिकायत है। खबर के अनुसार कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष से इस संबंध में औपचारिक शिकायत की है। कोलकाता के टेलीग्राफ की लीड स्थानीय खबर है। लेकिन राष्ट्रपति का भाषण पहले पन्ने पर नहीं है तो शायद इसलिये कि उसमें भी इमरजेंसी की चर्चा है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार राहुल गांधी ने कहा है कि ओम बिरला द्वारा इमरजेंसी का संदर्भ दिये जाने से बचा जा सकता था। द टेलीग्राफ ने अंदर के पन्ने पर जो खबर छापी है उसका फ्लैग और मुख्य शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, संविधान के मामले में मचे हंगामे का दुनाली मुकाबला (मुख्य शीर्षक है) राष्ट्रपति ने इमरजेंसी की चर्चा अब कीइंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में इमरजेंसी की चर्चा नहीं की है। फ्लैग शीर्षक है, “संसद की संयुक्त बैठक का संबोधन” जबकि मुख्य शीर्षक है, “मजबूत और निर्णायक सरकार के लिए जनादेश, इस बजट में ऐतिहासिक कदम उठाये जाएंगे : राष्ट्रपति”। इमरजेंसी की चर्चा इस खबर के इंट्रो में है, संविधान पर सीधे हमले का सबसे काला अध्याय

द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है और शीर्षक, संसद के अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने नीट को रेखांकित किया और इमरजेंसी का उल्लेख किया”। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार और रिपोर्टर के लिए या प्रस्तुति के लिहाज से यही खबर है कि राष्ट्रपति ने नीट को महत्व दिया और इमरजेंसी का उल्लेख किया। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि एक दिन पहले ही लोकसभा या सरकार या नरेन्द्र मोदी ने निष्पक्ष व्यवहार की अपेक्षा वाले पद पर जिसे चुना या बैठाया था उनने इमरजेंसी की चर्चा की थी और उसे सही नहीं माना गया था। कांग्रेस ने इसकी औपचारिक शिकायत की है भले ही खबर प्रमुखता से नहीं छपी है। इसके बावजूद राष्ट्रपति ने ऐसा किया (और भाषण में कुछ खास नहीं हो) तो अखबार भी क्या करे? राजा का बाजा बजाना सबके लिए संभव नहीं होता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के शीर्षक या इंट्रो में इमरजेंसी नहीं है, राहुल गांधी की आपत्ति है ही भाषण की खास बातों के बॉक्स का शीर्षक नीट है, इमरजेंसी नहीं। परीक्षा विवाद की उच्च स्तरीय जांच। इसमें इमरजेंसी दूसरे मुद्दे पर है और तीसरे पर बताया गया है कि राष्ट्रपति के अनुसार ईवीएम हरेक परीक्षा पास कर चुकी है, सुप्रीम कोर्ट से जनता की अदालत तक। मुझे नहीं पता कि राष्ट्रपति के ऐसा कहने का आधार और इस मामले में वास्तविक स्थिति क्या है। जो भी हो, वे प्रधानमंत्री के इस सवाल का जवाब नहीं दे रही होंगी कि ईवीएम जिन्दा है या मर गया? यह उनका काम नहीं है और शायद उन्होंने इसका ख्याल रखा होगा। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक है, 2024 के बजट में ऐतिहासिक कदम उठाये जायेंगे, सुधार की गति बढ़ेगी : राष्ट्रपति। इंट्रो है, रोजगार कीमत पर फोकस और मांग बढ़ाने की कोशिश हो सकती है।

हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक में इमरजेंसी है पर वैसे नहीं जैसे राष्ट्रपति ने कहा है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – इमरजेंसी, नीट पर राष्ट्रपति के फोकस ने संसद में विवाद खड़ा कर दिया। मुख्य खबर के साथ दो कॉलम की एक खबर है, सेंगोल एक बार फिर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का मुद्दा बना। खबर के साथ राष्ट्रपति के भाषण की खास बातें हाईलाइट की गई हैं। इनमें एक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का ट्वीट या एक पर लिखा बयान है। इसके अनुसार उन्होंने कहा है, (राष्ट्रपति का) संबोधन मोदी सरकार का लिखा हुआ स्क्रिप्ट था। मोदी जी माननीय राष्ट्रपति से झूठ बोलवाकर सस्ती प्रशंसा पाने की कोशिश कर रहे हैं

आज अखबार पढ़ते हुए मुझे समझ में आया कि आम मध्यमर्गीय परिवार से अलग, बचपन में मेरे घर में हिन्दी का अखबार क्यों नहीं आता था और अभी भी मैं हिन्दी अखबार क्यों नहीं पसंद करता हूं। यह तथ्य है कि जनसत्ता के अलावा हिन्दी के अच्छे कहे जाने वाले अखबारों को भी मैंने बहुत कम देखा है और इनमें अभी का दैनिक भास्कर और अपने समय का नई दुनिया शामिल है। मेरे बचपन में आर्यावर्त बिहार में हिन्दी का लोकप्रिय अखबार हुआ करता था और उन दिनों बिहार में हिन्दी लिखने-बोलने-बढ़ने वालों का शायद ही कोई घर या परिवार होगा जहां यह अखबार नहीं आता था। इनमें भोजपुरी, मैथिली, महगी बोलने वाले सब शामिल होते थे। जो भी हो, हिन्दी का मामला मुझे हमेशा दोयम दर्जे का लगा। जनसत्ता में भी मैं अनुवाद करता रहा और नौकरी छोड़ी तो भी अनुवाद करता रहा।

यह शर्मनाक है कि हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में 50 साल बाद इमरजेंसी छाई हुई है। इस तथ्य के बावजूद कि इमरजेंसी पर एक फिल्म आने वाली है, नरेन्द्र मोदी की सरकार फिल्मों का राजनतिक लाभ लेने की कोशिश करती रही है और अगर इमरजेंसी की बात की जाये तो कम से कम दो किताबें मैं जानता हूं जो 2019 और 2020 में आई हैं। इनमें एक तो इंदिरा गांधी के विरोधी समूह के अधिवक्ता के संस्मरणों पर आधारित है और उनकी पत्नी ने संपादित कर प्रकाशित किया है। इसकी प्रस्तावना अरुण जेटली की है। दूसरी किताब, इमरजेंसी का कहर और सेंसर का जहर पत्रकार बलबीर दत्त की है जिन्हें 2017 में पद्मश्री मिला था। एक और किताब इंडियाज अनडिक्लेयर्ड इमरजेंसी 2022 में आई थी। मेरा मानना है कि नरेन्द्र मोदी या उनकी सरकार राजनीति कर रही हो सकती है,  मल्लिकार्जुन खरगे ने जैसा कहा, राष्ट्रपति सरकार का लिखा भाषण पढ़ रही हो सकती हैं, ओम बिरला के बारे में सबको पता ही है तो फिर राष्ट्रपति के भाषण को पत्रकार नहीं समझेगा तो कौन समझेगा। अखबार कथित घेराबंदी के मायने पाठकों को क्यों बतायेगा उसकी जगह उतना भर भी क्यों नहीं करेगा जो आज ज्यादातर अखबारों ने किया है।   

हिन्दी अखबारों की दुनिया अंग्रेजी से बिल्कुल अलग है। हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों की लीड राष्ट्रपति का संबोधन है। दोनों के शीर्षक में इमरजेंसी है। नवोदय टाइम्स में मुख्य शीर्षक है, “आपातकाल काला अध्याय : मुर्मू”। उपशीर्षक है, राष्ट्रपति ने कहा, पेपर लीक के दोषियों को सजा मिलेगी। यहां मुद्दा यह है कि लाभ उठाने वालों को क्या छोड़ दिया जायेगा? अगर पेपर लीक हुआ है तो कैसे पता चलेगा कि इसका लाभ किन लोगों को हुआ और अगर परीक्षा रद्द नहीं होगी तो लीक करने वालों को भले फांसी हो जाये, अगली बार फिर कोई इस उम्मीद में कोशिश कर सकता है कि वह शायद बच जाये। लेकिन जब नियम लीक की शंका से ही परीक्षा रद्द करने की परंपरा होगी तो कोई लीक नहीं करेगा। खबरों से पता चलता है कि लीक पहले भी होते रहे होंगे, इससे लोग कमाते रहे हैं। इस बार शोर मच गया पर दोषियों को बचाने की कोशिश चल रही है।

अमर उजाला ने राष्ट्रपति के अभिभाषण की खबर के साथ तो हद कर दी है। शीर्षक है, आपातकाल संविधान पर सीधा हमला। इसे लगभग बैनर बना दिया है जो 26 जून 1975 को भी इतने बड़े फौन्ट में बहुत कम अखबारों में छपी होगी। तब अखबार लेड के फौन्ट से कंपोज करके छपते थे और लेड के फौन्ट के बड़े अक्षर महंगे तथा भारी होते इसलिए बड़े फौन्ट लकड़ी के होते थे और ये फौन्ट मेरठ में बनते थे। लेड के फौन्ट के लिए इलाहाबाद मशहूर था। ठीक है कि राष्ट्रपति ने यही कहा है पर यहां यह राष्ट्रपति के हवाले से नहीं है। ना इनवर्टेड कॉमा में और ना राष्ट्रपति या मुर्मू लिखा है। राष्ट्रपति ने तो सांसदों और राजनीतिकों के लिए संसद में कहा, उसमें राजनीति हो सकती है पर अखबारों को तो अपने लगभग साक्षर पाठकों के लिए बताना चाहिये कि संवैधानिक व्यवस्था का पालन या उसे लागू करना संविधान पर हमला कैसे हो सकती है। अगर अंधाधुंध गिरफ्तारी संविधान पर हमला है तो 10 साल के हालात कैसे हैं? आपतकाल की व्यवस्था तो संविधान में है फिर इसे लागू करना या इसका लाभ उठाना संविधान पर हमला कैसा हो सकता है। अखबार ने यह सब तो नहीं ही बताया है। बताने का रिवाज भी नहीं है। और आप कह सकते हैं कि उपशीर्षक से पता चल जाता है कि बात राष्ट्रपति के कहने की हो रही है। इसमें सबसे दिलचस्प है, जानिये…. इस घेराबंदी के मायने। इसके नीचे तीन खबरें हैं या यह जानकारी तीन हिस्से में है। पहले का शीर्षक है, आपातकाल… कांग्रेस की दुखती रग, सहयोगी हो सकते हैं असहज। मुझे नहीं लगता इसके साथ जो लिखा है वह बताने की जरूरत है। आप जानना चाहें तो अखबार देखिये। मैं यह नहीं समझ पाया कि यह संपादकीय है या खबर या पेड न्यूज।       

अमर उजाला ने कहा ही है कि राष्ट्रपति के भाषण में इमरजेंसी भाजपा की राजनीति है और इमरजेंसी के जरिये वह विपक्ष को घेरने की कोशिश कर रही है तो आइये देखें कि कुछ और अखबारों ने आज इस खबर को कैसे प्रस्तुत किया है। पहले हिन्दी वाले। जनसत्ता में राष्ट्रपति का संबोधन दो कॉलम में टॉप पर है। फ्लैग शीर्षक है, मोदी-बिरला के बाद अभिभाषण में राष्ट्रपति ने कहा – काला अध्याय है आपातकाल। जनसत्ता की लीड एनटीए है। मुख्य शीर्षक है, अदालतों ने एनटीए से मांगा जवाब। इसमें दो मामले हैं – ओएमआर शीट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस और पाठ्यक्रम से इतर प्रश्न पूछे जाने पर हाईकोर्ट सख्त।

हिन्दुस्तान में लीड राष्ट्रपति का अभिभाषण ही है। शीर्षक में इमरजेंसी नहीं है। मुख्य शीर्षक है, पेपर लीक के दोषी बख्शे नहीं जाएंगे। राष्ट्रपति ने ऐसा कहा तो है पर यह होगा कैसा मैं समझ नहीं पाया। मेरा मामला ऊपर है। नवभारत टाइम्स में नीट की खबर चार कॉलम की लीड है। मुख्य शीर्षक है, नीट मामले में सीबीआई की पहली गिरफ्तारी, दो धरे। राष्ट्रपति के अभिभाषण की खबर यहां फोटो के साथ, लीड के ऊपर सात कॉलम में है, शीर्षक है, राष्ट्रपति के अभिभाषण में इमरजेंसी का जिक्र। अंग्रेजी अखबारों में ट्रिब्यून का शीर्षक दिलचस्प है। संसद में इमरजेंसी पर और, राष्ट्रपति ने इसे संविधान पर सीधा हमला कहा। उपशीर्षक है, लोकसभा चुनाव से सरकार में लोगों के विश्वास की पुनर्पुष्टि हुई; लोकतंत्र को कमजोर करने के प्रयासों की निन्दा हुई। इसके साथ विपक्ष की प्रतिक्रिया सिंगल कॉलम में है – झूठ का पुलिन्दा है – विपक्ष संबोधन पर। स्टेट्समैन में यह लीड है। शीर्षक है, संसदीय कार्य को बाधित न करें राष्ट्रपति। इसके साथ दो कॉलम की एक खबर है, राष्ट्रपति के संबोधन ने  प्रगति का रोडमैप पेश किया प्रधानमंत्री मोदी।

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