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रज़ा फाउंडेशन और अशोक वाजपेई कृष्णा सोबती की स्मृति को बचाना चाहते हैं या बेचना?

कृष्ण कल्पित-

नंदलोक सोसाइटी ने नियमों का हवाला देकर जब पूर्वाशा स्थित कृष्णा सोबती के आवास को रज़ा फाउंडेशन को सौंपने से इंकार कर दिया तो रज़ा फाउंडेशन ने आनंदलोक सोसाइटी को कृष्णा सोबती के अपार्टमेंट को बेचने का प्रस्ताव दिया है। कहा गया कि इसे बेचकर जो पैसा मिले उसे रज़ा फाउंडेशन को दे दिया जाए, जिससे वे कहीं और प्रॉपर्टी खरीद सकें।

कृष्णा सोबती ने अपने अंतिम दिनों में रज़ा फाउंडेशन को शिवनाथ कृष्णा सोबती निधि के लिए एक करोड़ रुपए दिए। ज्ञानपीठ पुरस्कार में मिले ग्यारह लाख भी। और अपना करोड़ों का अपार्टमेंट भी। लेकिन इतने दिनों की मशक्कत के बाद भी रज़ा फाउंडेशन को अपार्टमेंट का क़ब्ज़ा नहीं मिला। अब रज़ा फाउंडेशन इसे बेचने को तैयार है।

अपने अंतिम दिनों में अशोक वाजपेई ने सैयद हैदर रज़ा को जिस तरह से घेर लिया था, उसी तरह कृष्णा सोबती को भी घेर कर अवा ने उनसे अपने अपार्टमेंट की रज़ा फाउंडेशन के पक्ष में वसीयत लिखवाई, जबकि कृष्णाजी के पति शिवनाथ पहले ही वसीयत कर गए थे। और भी कई बातें हैं। मामला अब कानूनी दांव पेंच में फंस गया है।

पिछले कुछ बरसों से रज़ा फाउंडेशन एक बड़ी लेखिका की स्मृति को संजोने के लिए जो नाटक कर रहा था, वह अब उसी स्मृति को बेचने को तैयार हो गया है।

अशोक वाजपेई जीवन भर इसी तरह के संदिग्ध धंधों में लिप्त रहे हैं और उनकी इच्छा यह है कि उन्हें हिंदीसंसार एक कवि लेखक के रूप में मान्यता दे। उन्हें याद किया जाएगा लेकिन एक मीडियाकर और महत्वाकांक्षी कवि लेखक के रूप में। अवा के गोरखधंधे को समझने की ज़रूरत है।

रज़ा फाउंडेशन और अवा ने कृष्ण बलदेव वेद पर भी उनके नाम से एक निधि बनाने और उनके दिल्ली के घर को राइटर्स रेजीडेंसी बनाने के डोरे डाले थे, लेकिन वेद मूर्ख नहीं थे।

हमारी इच्छा तो यह है कि यदि कृष्णा सोबती के अपार्टमेंट पर किसी का दावा सत्य नहीं हो तो स्वयं आनंदलोक सोसाइटी को चाहिए कि इसे कृष्णा सोबती स्मारक बना दिया जाए। यही काव्यात्मक न्याय होगा!

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