प्रदीप चौधरी-
हर उम्र के दोस्त होने चाहिए आपके पास। इससे यह समझ में आता है कि अलग-अलग पीढ़ियाँ दुनिया को कैसे देख रही हैं।
आज एक मेरे छोटे दोस्त ने सवाल किया। पिछले साल उसने इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया है। उसने पूछा, “आख़िर रील देखने में बुराई क्या है? आप हमेशा इसके ख़िलाफ़ रहते हैं। मान लीजिए किसी के पास समय है, पैसिव इनकम है, नॉन ऑफिस गोइंग लोग हैं, बुजुर्ग भी हैं। अगर इससे डोपामिन रिलीज़ हो रहा है और खुशी मिल रही है तो लेने दीजिए। हर कोई डोपामिन के लिए कुछ न कुछ करता ही है। आप खुद लोगों से मिलते हैं, जिम जाते हैं, उससे आपका डोपामिन रिलीज़ होता है।”
मैंने कहा, “वाह गुरु, सवाल तुम्हारा बिल्कुल ठीक है। लेकिन दुनिया केवल डोपामिन में ही नहीं है, सेरोटोनिन भी है दोस्त।”
भाई को समझ नहीं आया।
मैंने उससे कहा, “तुम जानते हो ‘हैप्पी’ यानी प्रसन्न और ‘आनंद’ में अंतर होता है। शायद इसी वजह से हमारे यहाँ भगवान को सच्चिदानंद कहा गया है। सत्, चित् और आनंद। यानी ऐसा सुख जो क्षणिक उत्तेजना नहीं बल्कि स्थिर अनुभव हो।”
यहीं से असली फर्क शुरू होता है।
डोपामिन वह केमिकल है जो दिमाग को तुरंत मिलने वाले इनाम से जुड़ा है। कोई नई चीज़ दिखी, लाइक मिला, गेम जीते, नई रील दिखी, कुछ सेकंड की हंसी मिली, दिमाग कहता है “अच्छा लगा, फिर करो।” इसलिए डोपामिन का खेल हमेशा “नेक्स्ट” पर चलता है। एक रील खत्म, दूसरी शुरू। एक वीडियो खत्म, अगला शुरू। यह तंत्र दिमाग को उत्तेजना देता है, लेकिन उसे स्थिर नहीं करता।
इसलिए डोपामिन आधारित खुशी अक्सर बेचैन होती है। थोड़ी देर बाद फिर वही खालीपन लौट आता है और दिमाग फिर कुछ नया ढूंढने लगता है।
सेरोटोनिन का मामला थोड़ा अलग है।
सेरोटोनिन उस संतोष से जुड़ा है जो धीरे-धीरे बनता है। सुबह की धूप में टहलना, किसी काम को पूरा करना, किसी के काम आना, पढ़ना, सीखना, शरीर को मेहनत देना, किसी रिश्ते में गहराई महसूस करना। यह चीजें तुरंत उत्तेजना नहीं देतीं, लेकिन मन को स्थिर करती हैं।
अगर आसान भाषा में कहें तो डोपामिन “उत्तेजना” देता है, सेरोटोनिन “संतोष” देता है।
रील्स का मसला यही है। वे पूरी तरह डोपामिन के तंत्र पर बनी हैं। हर कुछ सेकंड में नया दृश्य, नया मज़ाक, नया झटका। दिमाग को छोटे-छोटे इनाम मिलते रहते हैं। इससे समस्या यह नहीं है कि खुशी मिल रही है। समस्या यह है कि दिमाग धीरे-धीरे उसी तरह की तेज उत्तेजना का आदी हो जाता है।
फिर वही दिमाग किताब के दस पन्ने पढ़ने में बेचैन हो जाता है। किसी गंभीर बातचीत में टिक नहीं पाता। एक घंटे का काम भारी लगने लगता है।हमेशा नयापन कहाँ मिलेगा?
यानी धीरे-धीरे हमारा ध्यान तंत्र बदल जाता है। अब ध्यान नहीं लगता है ।
मैंने उससे कहा, “रील देखना अपराध नहीं है। लेकिन अगर दिमाग को केवल डोपामिन की ट्रेनिंग मिलती रहे और सेरोटोनिन वाली चीजें कम होती जाएं, तब जीवन में उत्तेजना तो बहुत होगी, पर संतोष कम होगा।”
शायद इसलिए हमारी परंपरा ने खुशी के लिए “आनंद” शब्द चुना।
आनंद वह है जो उत्तेजना के बाद भी बचा रहता है। जो शोर के बाद भी भीतर शांत रहता है। जो खत्म होने के बाद भी मन में बना रहता है।
और यही अंतर है, डोपामिन वाली खुशी और सेरोटोनिन वाले संतोष के बीच।



