यशवंत सिंह-
आज एक मित्र को रिहैब में भर्ती करा आया। ग्रेटर नोएडा में अपने घर के पास ही है। रवि राणा फोटो में दिख रहे हैं। वही संचालित करते हैं। साढ़े उन्नीस हज़ार रुपये एक महीने के। ढाई हज़ार मेडिकल टेस्ट और दवा आदि के। पाँच सौ साबुन पेस्ट आदि रूटीन खर्च के। कुल बाईस हज़ार रुपये में एसी रूम (जिसमें चार बेड हैं), भोजन, दवा आदि। एक माह तक।
जिन्हें भर्ती कराया है वे दिल से बहुत सुंदर आदमी हैं। बिन पिए और पी कर, दोनों हाल में गुस्सा नहीं करते। सीसीटीवी वाली तस्वीर में उन्हें क्रॉप कर दिया है। वे ख़ुद तैयार हो गए रिहैब जाने के लिए। वे ट्वेंटी फोर सेवन पी रहे थे।


सुबह दोपहर शाम रात मिला कर एक बोतल पी जाते थे। विल पॉवर मजबूत नहीं है। प्रेमी किस्म के स्नेहिल आदमी हैं। लेकिन एडिक्शन भयानक है दारू का। न पीने पर बेचैनी होती है इन्हें, पी लेते हैं लगातार तो भी बेचैनी रहती है। जीवन मरण के दुश्चक्र में झूलने लगे थे।
कई महीने से मेरे ऑब्जरवेशन में हैं। अब ज़ब सारे उपाय फेल हो गए और पानी सिर से ऊपर निकलने लगा तो उन्हें रिहैब के लिए कन्विंस किया। वे तैयार भी हो गए। जाने से ठीक पहले नज़र बचा के एक क्वार्टर निट पी गए। रिहैब पहुँच गए तो घबड़ाने लगे। घर चलने की बच्चों की तरह ज़िद करने लगे। उन्हें समझाया। बहुत मुश्किल से रुकने को तैयार हुए, इस शर्त पर कि कल उन्हें आकर ले जाऊँगा यहाँ से।
भारत वंश रिहैब सेंटर के संचालक रवि राणा बताते हैं कि उनके यहाँ एडिक्शन के शिकार पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी तक एडमिट हुए और नशा मुक्त इंसान के रूप में आज अपनी नौकरी में सेवारत हैं।
रवि मुझे ठीक आदमी लगे। उनसे मिलकर लगा, ठीक जगह आया हूँ। मैंने उनसे उनकी फ्रेंचाइजी अपने ग़ाज़ीपुर जिले में लेने की बात की। वो सहमत हुए। सोच रहा हूँ भड़ास आश्रम ग़ाज़ीपुर को रिहैब सेंटर में तब्दील कर दूँ!
सुजीत सिंह प्रिंस (Sujeet Singh Prince) भाई इसके कर्ताधर्ता रहेंगे। हमारे जिले में भी घर-घर में जटिल पियक्कड़ हैं। हमारा भाई और साला दोनों पियक्कड़ हैं। हम भूतपूर्व पियक्कड़ रह चुके हैं। बीच-बीच में एकाध दो दिन के लिए गड़बड़ाता हूँ लेकिन जब दारू नहीं पचती है और अगले दिन सुई दवा कराना पड़ता है तो ग्लानि होने लगती है कि ये फिर किस लाइन में आ गए भड़ास जी!
रिहैब में वही जा सकता है जिसकी औक़ात महीने की बीस पच्चीस हज़ार रुपये देने की हो। देसी पीने वाले बवालियों को कौन रक्खेगा। हर ठेका के बगल में एक रिहैब सेंटर खोलने की ज़रूरत है। जो सुबह-सुबह दुकान खुलते ही पहला पियक्कड़ दारू लेने आए उसे दबोचकर रिहैब में भर्ती करा दे और सिटकनी अंदर से बंद कर दे। लातम जूतम बीस मिनट करने के बाद छोड़ दे, अगले दिन से दिखना मत ठेका के आसपास। बहुते क्रांतिकारी टाइप आईडिया रहते हैं मेरे और सत्येंद्र पीएस (Satyendra PS) भाई साहब के पास!
बस हम लोग उसको अमली जामा पहना नहीं पाते। रिहैब सेंटर ग़ाज़ीपुर में खोलने का आईडिया सही है। कल फिर जाकर रवि राणा से मिलकर डिटेल समझूंगा। और अपने शराबी भाई का हालचाल लूँगा।



