उर्दू अखबार रोज़नामा खबरें की हालत खराब, वर्कर्स को दो माह से सेलरी न मिली

आज से चार साल पहले भड़ास ने “सहारा छोड़ ज़ैन शमसी भी गए रोज़नामा ख़बरें” की सुर्खी से ख़बर छापी थी। इसमें लिखा था कि रोज़नामा ख़बरें ने बड़े-बड़े अख़बारात के सहाफ़ीयों को अपने यहां ला कर एक बड़ा कारनामा अंजाम दिया है। लेकिन इस के बाद भड़ास ने रोज़नामा खबरें की कोई ख़बर नहीं ली कि आख़िर इस अख़बार का क्या हुआ और वो सहाफ़ी जो कॉरपोरेट के अखबारात इन्किलाब और सहारा को छोड़कर निजी हाथों में चलने वाले अख़बारात में जाते हैं, क्या वो अपने करियर से मज़ाक़ नहीं करते।

ये बात इसलिए पूछी जा सकती है कि रोज़नामा ख़बरें ने बड़े बड़े उर्दू सहाफ़ीयों को अपने यहां बुला कर किस तरह पैसा बनाया और उन लोगों को जिन्होंने उनकी मदद की, उन्हें सड़कों पर बे-यार-ओ-मददगार छोड़ दिया। सहाफ़ी ज़ैन शमसी तो तीन साल पहले ही रोज़नामा ख़बरें छोड़ गए। उनके साथ बुरा बरताव किया गया और उनकी सेलरी बग़ैर किसी इत्तिला के काट ली गई। उन्होंने अपने साथ होने वाले इस सुलूक को किसी के साथ शेयर नहीं किया और बग़ैर किसी को बताए रोज़नामा ख़बरें से अलग हो गए। अब यह कहा जा रहा है कि अख़बार के मालिकान की नीयत ख़राब हो गई थी। वो अख़बार जो एक बड़ा मीडिया बन सकता था, हिर्स-ओ-लालच के कारण दलालों का अड्डा बना दिया।

इसॉके बाद मुसलसल रोज़नामा खबरें ने अपने मुलाज़मीन के साथ बुरा सुलूक जारी रखा। तनख़्वाह पर गाज़ गिरने लगी। रोज़नामा ख़बरें का प्रबंधन ऐश की राह पर चल निकला। नतीजा ये हुआ कि आहिस्ता-आहिस्ता उस की मक़बूलियत ख़त्म होती गई। जमीअत उल-उलमा हिन्द को अपनी ख़बों से दिलचस्पी होती है, उसने ख़ूब पैसा दिया, जमात-ए-इस्लामी ने अपने कैम्पस में उसे किराए की जगह दी। मुस्लिम पर्सनल ला के ख़िलाफ़ ख़बरें लगा कर पैसा बनाने की तरकीब भी ख़ूब चली। लेकिन मालकान भूल गए कि उनके यहां काम करने वालों की मेहनत ने ही उन्हें इस मुक़ाम पर पहुंचाया था।

नतीजा वही होना था। फंडिंग करने वाले की हालत ख़राब हुई और इधर मुलाज़मीन के साथ बुरा बरताओ, सैलरी रोकना और काटना मामूल का हिस्सा बन गया था। अंजाम कार जब मुलाज़मीन ने अपने पैसे का मुतालिबा शुरू किया तो मालिकान फ़रार हो गए, यहाँ तक कि अख़बार को भी बंद कर देना पड़ा। अब रोज़नामा ख़बरें के मालिकान ऐसे लोगों की तलाश में हैं जो चुनाव में उन्हें अच्छा-ख़ासा पैसा कमा कर दे और 50 फ़ीसद पैसा उन्हें दे दे।

ज़ाहिर है कि मीडिया मैनेजमेंट में ऐसे लोगों की भरमार होती है और रोज़नामा ख़बरें के मालिकान इससे बख़ूबी वाक़िफ़ हैं। उन्हें कोई ना कोई रास्ता मिल ही जाएगा, लेकिन उनके यहां काम करने वालों की हालत ये है कि उन्हें गुज़श्ता दो माह से तनख़्वाह नहीं मिली और पीएफ़ का पैसा भी हड़प लिया गया। वो बे-यार-ओ-मददगार सड़कों पर घूम रहे हैं और लाख कोशिशों के बावजूद मालिकान से उनकी बात नहीं हो पा रही है। मजबूरन उन लोगों ने भड़ास को अपनी ये सब बात बताई और मदद की अपील की है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.



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