राकेश कायस्थ-
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुंबई एडिशन की चार खबरें मैंने यहां इसलिए लगाई हैं, ताकि आप इनमें भारतीय राजनीति का भावी चेहरा देख सकें। जो लोग राजनीति के गंभीर अध्येता हैं, उन्हें ठीक से सोचना चाहिए कि इस वक्त देश में चल क्या रहा है।
मैं घोषित तौर पर आरएसएस की राजनीति का विरोधी हूं और इसे एक विभाजनकारी और विनाशकारी संगठन मानता हूं। इसके बावजूद मेरा शुरू से ये मानना रहा है कि संगठन का सर्वोच्च नेतृत्व सादगी पसंद है और प्रचार से दूर रहता है।
लेकिन नरेंद्र मोदी के तीसरी बार सत्ता में आने के बाद से संघ के इस व्यवहार में अप्रत्याशित बदलाव आया है। कोई ऐसा दिन नहीं होता जब आरएसएस के हेडलाइन वाली खबर प्रमुख अख़बारों में ना हो। संघ कोई खबर देता नहीं है, ज़ाहिर है, खबर के नाम पर आरएसएस नेताओं के बयान छपते हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने आज के एडिशन में आरएसएस से जुड़ी एक नहीं बल्कि चार खबरों को जगह दी है। पहले पन्ने की लीड हेडलाइन में बताया गया है कि संघ ने कहा है कि औरंगजेब की कब्र जहां है, वहीं रहेगी।
पेज नंबर नौ पर उपर दत्तात्रेय होसबेले हैं और ठीक नीचे भइया जी जोशी, वो भी पर्याप्त जगह घेरे हुए। होसबेले साहब कह रहे हैं कि अगर आरएसएस के सदस्य चाहे तो मथुरा और काशी के आंदोलन में शामिल हो सकते हैं लेकिन उन्हें मस्जिदों को निशाना नहीं बनाना चाहिए। इसके नीचे वाली खबर पहले पन्ने पर छपी उस खबर का विस्तार है, जिसमें भइया जी जोशी औरंगजेब के कब्र विवाद को ठंडा करने का प्रयास कर रहे हैं। पहले पन्ने पर लगभग 500 शब्द और फिर पेज नंबर नौ पर 700-800 शब्द संघ को समर्पित हैं। लेकिन कवरेज यही खत्म नहीं हुई।
पेज छह पर स्वयं सरसंघचालक मोहन भागवत अवतरित हैं, जो कह रहे हैं कि ये दुनिया की मजबूरी है कि वैश्विक नेतृत्व के लिए वो भारत की ओर देखे। घोषित तौर पर एक गैर-राजनीतिक संगठन से संबंधित बयानों को इतनी जगह!!!
यह सब अकारण नहीं है। विस्तृत विश्लेषण बाद में। लेकिन इस पैटर्न पर गौर कीजिये, देश की मौजूदा राजनीति के बारे में आपको बहुत कुछ समझ में आएगा।






