
कृष्ण पाल सिंह-
संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शिक्षा और स्वास्थ्य के व्यवसायीकरण पर चिंता व्यक्त करके नीतिगत विचारों को फिर से पटरी पर लाने की कोशिश की है जो वर्तमान सरकार के कार्यकाल में लगातार डिरेल हो रहे हैं। संघ भाजपा की वर्तमान सत्ता के पहले व्यवस्था के लिए जिस मॉडल को पेश करती थी उसे लगातार भुलाया जा रहा था। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में दुनिया को अपने शोषण का चारागाह बनाने वाले उपनिवेशवादी देशों के मानक हमारे देश में नीतियों के आधार बनकर रह गये हैं। इसके चलते सुख-समृद्धि की सारी परियोजनाएं कुछ लोगों तक सिमट कर रह गई हैं और उनके उल्लास के कोलाहल में अभाव ग्रस्त हो रहे पूरे देश की कराहें दबा दी जा रही हैं।
संघ के आनुषंगिक संगठनों में स्वदेशी मंच भी शामिल हैं। स्वदेशी मंच में आवश्यकता की सारी वस्तुओं का उत्पादन देश में ही करने को प्रोत्साहन देना और अपने उपभोग को उनके दायरे में बांधकर रखना तो सम्मिलित था ही, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों को समाजसेवा की भावना से संचालित करना भी इसमें निहित था। विद्या भारती के माध्यम से संघ द्वारा संचालित की जा रहीं सरस्वती शिक्षण संस्थाओं के उत्कृष्ट स्तर की बानगी यह थी कि उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के परीक्षा परिणाम में सरस्वती विद्या मंदिर के छात्रों की पताका मेरिट सूची में गर्व से हर साल लहराती थी। शिक्षा के साथ-साथ संस्कारों को सिखाना भी सरस्वती शिक्षण संस्थाओं का काम था जिसमें वे बेहद खरी साबित हो रहीं थीं। उनमें नाम मात्र के शुल्क में एडमीशन हो जाता था और इसे संभव बनाने के लिए समर्पण की भावना से दायित्व निर्वाह करने वाले इनके आचार्य मामूली वेतन में पढ़ाने को तत्पर बने हुए थे।

भाजपा की सरकार आने के बाद विद्या मंदिर शिक्षा मिशन को और मजबूती प्रदान की जानी चाहिए थी। छल करने की बजाय वास्तविक धार्मिकता का रोपण लोगों की मानसिकता में करने की ईमानदारी दिखाई जाती तो भाजपा से जुड़ा धनाढ्य वर्ग में हजारों-लाखों भामाशाह विद्या मंदिर मिशन को सींचने के लिए आगे आ जाते। शिक्षा क्षेत्र के साथ-साथ चिकित्सा के क्षेत्र के लिए भी दानशीलता की होड़ पैदा की जा सकती थी। लेकिन सत्ता में विराजमान होने के बाद संघ की मानसिक संतान कही जाने वाली भाजपा अपनी सोच से विश्वासघात पर आमादा हो गई। उसके शासन काल में तड़क-भड़क वाले निजी शिक्षण संस्थाओं और महंगे अस्पतालों का तांता लगा दिया गया।
उत्तर प्रदेश का उदाहरण ले जहां योगी बाबा मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने शुरूआत में बहुत अच्छी उम्मीदें पैदा की। कान्वेंट स्कूलों में मनमानी फीस, किताबों, ड्रेस और ईवेंट के नाम पर अभिभावकों से होने वाली वसूली के खिलाफ वे बहुत बमके। रुपये की चार अठन्नी करने वाले स्कूल व्यवसाइयों को इससे डर भी लगा लेकिन जल्द ही जाहिर हो गया कि मुख्यमंत्री की घुड़कियां हाथी के दांत हैं जिनका जमीनी स्तर पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। आज कान्वेंट स्कूलों में जैसी लूट मची है वह पहले की तुलना में बहुत ज्यादा है।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इससे शिक्षा पर सिर्फ सम्पन्न वर्ग का अधिकार हो जाने वाला है, इसके साथ खासतौर से भाजपा के लिए जो अधिक शोचनीय होना चाहिए वह नई पीढ़ी में संस्कारों के भ्रष्ट होने का खतरा है। कान्वेंट शिक्षा संस्कृति बच्चों को पश्चिमी जीवनशैली में धकेलने की फैक्ट्री बन गई है जिससे हमारी संस्कृति का तीव्र विरोधाभास है। ये स्कूल स्वार्थी और आत्मकेंद्रित मानसिकता का निर्माण करते हैं। देश, समाज आदि को भूलकर सिर्फ अपने लाभ को साधने को मकसद बनाना इस शिक्षा की देन साबित हो रहा है। इसीलिए बड़े कान्वेंट स्कूल के बच्चे अवसर मिलते ही देश से पिण्ड छुड़ाकर विदेश की नागरिकता स्वीकार कर रहे हैं और यह बड़े पैमाने पर होने लगा है।
इस शिक्षा से नौकरशाह बनने वाले लोग इसीलिए समाज के प्रति कुछ करने की परवाह करने की बजाय सरकारी खजाना लूटने में अपनी बौद्धिक शक्ति प्रयोग करते दिखाई देते हैं। भाजपा की सरकार दो तरह के देशों का निर्माण देश के अंदर कर रही है। जिसमें एक है भारत और दूसरा है इण्डिया। कान्वेंट शिक्षित इण्डिया वाले बच्चों के लिए साला मैं तो साहब बन गया, साहब बनकर सीना कैसे तन गया गाने को याद करने की जरूरत महसूस होती है। कान्वेंट शिक्षित होकर साहब बने लोगों का सीना इसीलिए अभाव ग्रस्त आम जनता पर इतना तना नजर आता है कि उनके अधिकारों की रक्षा की बात पर उनका जायका बिगड़ जाता है। ऐसी मशीनरी से देश में विषमता और वंचना की शिकार आम जनता के लिए सहानुभूति और सेवा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।
चूंकि आम लोगों के लिए सरकार ने विकल्प तलाश लिया है इसलिए वह शैक्षणिक सुविधाओं के वितरण में पैदा हो रही असमानता की फिक्र क्यों करे। वंचित समाज के बच्चों को बहलाने के लिए उसके पास कांवड़ यात्रा जैसे नुस्खे जो हैं। किसी समय कांवड़ यात्रा जैसी आयोजनाओं की कोई उपयोगिता और प्रासंगिकता रही होगी लेकिन किसी प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ में अनिवार्य कर्तव्य या प्रथा के रूप में इसका उल्लेख नहीं है और कई ऐसी क्षेपक प्रथाएं समाज ने अतीत में भी आगे बढ़ने के लिए छोड़ी हैं तो आज जबकि कैरियर बनाने के लिए लड़के 18-18 घंटे पढ़ रहे हैं जिसके कारण उनके लिए समय की बहुत कमी हो गई है। तो वर्तमान दौर में कांवड़ यात्रा के लिए इतना जोर लगाने की जरूरत क्या है। लब्बोलुआब यह है कि सत्ता आ जाने के बाद विद्या मंदिर शिक्षा मिशन में गिरावट कैसे आ गई यह पूछने की सूझ संघ के लोगों के दिमाग में अभी तक क्यों नहीं आई।
बहरहाल, जब जागो तभी सवेरा। शिक्षा के अलावा चिकित्सा के क्षेत्र में भी व्यवसायीकरण के कारण जो हो रहा है उससे लोगों के जीवन के लिए भारी खतरा पैदा हो गया है। इलाज महँगा तो हो ही गया है साथ ही धोखाधड़ी भी बहुत हो रही है। नामी अस्पतालों तक के बारे में शिकायत मिली है कि वे ज्यादा पैसे ऐठने के लिए जरूरत न होते हुए भी मरीज का ऑपरेशन करने लग जाते हैं जिससे कई मरीजों की मौत हो जाती है। मुनाफे के लिए उन्हें ऐसी दवाएं दे दी जाती है जो उपचार की बजाए उनके मर्ज को खतरनाक बना दें। मानवीयता नाम की चीज डाक्टरों में व्यवसायीकरण ने खत्म कर दी है। कोई उनकी चौखट पर मर जाये तो मर जाये लेकिन जब तक वह रुपये जमा नहीं करेगा उसका इलाज शुरू नहीं किया जाता। गरीबों के लिए हेल्थ बीमा एक मजाक है। जुकाम के इलाज में भी एक लाख के खर्च का बिल बना दिया जाता है तांकि उसके बीमा कागजों से अपनी जेब भर सकें। जिस देश में धनहीन लोगों के लिए पढ़ाई और इलाज की कोई गारंटी न हो उस देश के कर्ताधर्ता चुल्लू भर पानी में डूब मरने लायक हैं।
हम पहले जो कह चुके हैं कि हमारी सरकार ने जिन मानकों को अपना विकास नापने का पैमाना बना रखा है वे मानक मानवता द्रोही हैं। अरबपतियों की संख्या बढ़ने से कोई देश आर्थिक महाशक्ति नहीं बन जाता। आर्थिक क्षेत्र में उसकी शक्ति मापने का पैमाना प्रति व्यक्ति आय और मूलभूत आवश्यकताओं का सुगमता पूर्वक सुलभ होने से पता चलता है कि देश कहां खड़ा है। इस पैमाने पर आंके तो देश की हैसियत कितने नीचे चली जायेगी इसका अनुमान लगाने से बहुत हीन भावना आ सकती है।
हर विकसित देश में शिक्षा और स्वास्थ्य मुफ्त है जबकि इस देश में शिक्षा भी महंगी और बीमार होने का मतलब है कि इलाज के नाम पर अपनी बर्बादी की भूमिका लिखना। तो भी हमारी सरकार डींगें हांकने में नंबर एक देश को भी पीछे छोड़ देने का दम रखती है। हर देश को अपना गुणगान करना चाहिए लेकिन इस नाम पर देश की बहुतायत आबादी की दुर्दशा पर पर्दा डालने की इजाजत देना तो संभव नहीं है।
गनीमत है कि शिक्षा और चिकित्सा में व्यवसायीकरण रोकने की वकालत मोहन भागवत ने की है क्योंकि विपक्ष का कोई नेता अगर ऐसी आवाज उठा देता तो उसे अर्बन नक्सली करार दे दिया जाता। सरकार को अभाव ग्रस्त जनता के उत्थान के लिए कुछ करने का कर्तव्यबोध कराने की हर चेष्टा को वामपंथी मानसिकता और अर्बन नक्सली करार देने की बीमारी सी मोह ग्रस्त लोगों को हो गई है जबकि उनमें से भी अधिकांश आम श्रेणी में होने के कारण सरकार की नीतियों का दुष्परिणाम भोगने के लिए अभिशप्त हैं। गजब है!


