आज ये कहना कि वे हमारे माल हैं, आरएसएस की बेहयाई है

सांप्रदायिकता पूंजीवाद और औद्योगिक सभ्यता की देन है। बाजार हथियाने के लिए बाजारवादी शक्तियां सांप्रदायिकता का हथकंडा अपनाती हैं। अपनी सांप्रदाकियता की धार को तेज करने के लिए वे अतीत को भी सांप्रदायिक बनाने का कुत्सित प्रयास करती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि सामंती काल में भी मंदिर-मस्जिद ढहाए गए पर उसके पीछे सोच सांप्रदायिक नहीं विजित नरेश के सारे प्रतीकों को ध्वस्त करना था। हिंदू शासकों ने भी जब कोई राज्य जीता तो वहां के मंदिर तोड़े और पठानों व मुगलों ने भी जब कोई मुस्लिम राजा को हराया तब मस्जिदें भी तोड़ीं।

ये अपनी प्रजा को अपने पक्ष में करने के लिए उनके पूजा स्थल बनवाते भी थे। तमाम उदाहरण मिल जाएंगे जब हिंदू शासकों ने मस्जिदें बनवाने के लिए अनुदान दिया और मुस्लिम शासकों ने मंदिरों के लिए माफी की जमीन दी। किसी भी सामंती शासक ने किसी धर्म पर प्रहार नहीं किया। जो लोग यह सोचते हैं कि फिर इतनी भारी संख्या में मुसलमान कैसे बने क्योंकि तुर्क जब आए तो मुठ्ठी भर ही थे। तो इसका भी एक मजेदार तथ्य है और वह भी परवर्ती व्यापारी कंपनी के काल का।

शुरू में अंग्रेजों को लगा कि अगर इंडिया के हिंदुओं का द्विज तबका ईसाई बना लिया जाए तो यह देश उनके कहे मुताबिक चलेगा। उन्होंने गोआ, कोचीन और कोलकाता में ब्राह्मणों और अन्य द्विज जातियों को ईसाई बनाने की मुहिम चलाई। कुछ बने भी जैसे की बांग्ला के मशहूर कवि माइकेल मधुसूदन दत्त तथा तमाम बनर्जी और मुखर्जी परिवार। इसी तरह यूपी के कुमायूं में तमाम पंत और पांडे ईसाई बन गए। लेकिन हुआ कुछ नहीं क्योंकि जो ब्राह्मण ईसाई बनते उसे उसके ही परिवारजन और उसकी जाति इकाई अलग कर देती और बाकी का कुनबा जस का तस बना रहता। तब ईसाई मिशनरियों को लगा कि द्विज जातियों से अच्छा है कि अन्य जातियों पर डोरे डाले जाएं।

आसान तरीका था यह क्योंकि अधिसंख्य तबका हिंदू धर्म की पूजा पद्घति से दूर था। इसमें सफलता तो मिली लेकिन यह गुर कारगर नहीं रहा। इसकी वजह थी मिशनरीज पर गोरों को दबाव होना। यह वह दौर था जब समानता, बराबरी और मानवता का पाठ लोगों ने पढ़ा और इसका असर यह हुआ कि लोगों को लगा कि समानता के मामले में इस्लाम ज्यादा बराबरी देता है। जब अपना मूलधर्म छोड़कर यह तबका अन्य धर्मों की तरफ जाने लगा तो उसे सूफी संतों की उदारता, सादगी और बराबरी पर जोर अधिक रास आई। इसलिए आप पाएंगे कि इस्लाम में जाने का रुझान 18 वीं व 19वीं सदी में सबसे अधिक हुआ पर इस्लाम में जो लोग गए वे या तो हिंदू धर्म की ब्राह्मण श्रेष्ठता के कारण किनारे पड़े थे अथवा वे हिंदू थे ही नहीं। वे नाथ, कनफटा और निरंजनी समाज के थे जहां एकेश्वरवाद, शून्यवाद और समान आत्मा का प्रचलन था इसलिए इस्लाम अंगीकार करने में उन्हें हिचक नहीं हुई। इसलिए आज यह कहना कि वे हमारे माल हैं आरएसएस की बेहयाई है।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के ब्लाग tukdatukdazindagi.com से साभार.

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