संजय श्रीवास्तव-
एक खांटी पत्रकार का रिटायर होना… मौजूदा दौर में अगर आप पत्रकारिता में 60 साल की उम्र में रिटायर हो रहे हों तो इसे बड़ी उपलब्धि ही कह सकते हैं. कितने लोगों को अब ये नसीब हो पाएगा, कहना मुश्किल है. ऐसे ना जाने कितने पत्रकार दोस्तों और सीनियर्स को जानता हूं, जिनका करियर असमय खत्म हो गया या कर दिया गया…कुछ ने इसे बीच रास्ते में थैंक्सलैस कहते हुए किनारा कर लिया.
31 दिसंबर 2025 को ऐसा एक अवसर जरूर देखने को मिला. सचिन शंकर श्रीवास्तव इसी दिसंबर में 60 वर्ष के हुए. उन्होंने 31 दिसंबर 2025 को नेटवर्क18 से विदा ली. न्यूज18 हिंदी डिजिटल के साथियों ने उन्हें यादगार विदाई दी. खुशी की बात इसलिए ज्यादा थी कि कोई अपनी पारी को सही तरीके से पूरी करके जा रहा है.


सचिन ने जब पत्रकारिता को करियर के तौर शुरू किया तो उसका मतलब था प्रिंट यानि अखबार. तब भारत में न्यूज टीवी था नहीं. डिजिटल मीडिया के बारे में तो कोई सपने में सोच सकता था. लिहाजा पिछले तीन दशक मीडिया के ना केवल बदलाव के रहे हैं बल्कि तकनीक के तौर पर व्यापक बदलाव के. हालांकि खुद प्रिंट जर्नलिज्म तकनीक के गजब के बदलावों से गुजरा है.
तब टेलीफोन की लाइनों से जुड़े टाइपराइटर्स का की बोर्ड के अक्षर रोल पेपर के कागज से टकराते थे और उनमें वाक्य दर वाक्य उभरते जाते थे, जिसे खबरों का तार कहा जाता था. टेलीप्रिंटर आपरेटर उसे फाड़ फाड़कर संबंधित डेस्क को देता था. डेस्क के साथी उस पर करेक्शन करते थे. अंग्रेजी में आए तार का हाथ से कागजों पर ट्रांसलेशन और संपादन करके खबर की शक्ल दी जाती थी. फिर इन्हें कंपोजिंग विभाग को भेजा जाता था.
जहां ब्रोमाइड की गैलीज निकलती थीं. इन गैलीज से खबरें कंपोज होकर आ जाती थीं. खाली न्यूजपेपर आकार की शीट्स पर पेस्टर उन्हें काट-काटकर पेज को लेआउट देता था. बीच-बीच में अगर कोई तस्वीरें लगानी होती थीं तो वो पीटीआई से आईं घटना की तस्वीरें होती थीं. जो बस या ट्रेन के जरिए भेजी जाती थीं. कुछ तस्वीरें मैगजीन या अखबारों से काटकर फाइल में संजोकर रखी जाती थीं, जिन्हें निकालकर पेज पर चिपका दिया जाता था.
अगर पेज मेकर से दो बार पेज की खबरों की जगह बदलवाने को कह दिया जाता था तो वो भनभना जाता था. कभी-कभी अपनी कैंची वहीं टेबल पर पटक देता था कि पेज लेट हो रहा है और तुम बार-बार खबरें बदलवा रहे हो. वो भी एक रोचक दुनिया थी. ना अखबारों में अब टेलीप्रिंटर रूम रहे, ना वैसे संपादकीय, ना कंपोजिंग औऱ ना ही खबरें चिपका पेज बनाने वाले पेस्टर – अब ये सब कुछ और तरीके से और तकनीक की मदद से होता है.
सचिन अनुशासित हैं, समर्पित हैं, मेहनती हैं, प्रिंट में खेल पत्रकार के रूप में पहचान बनाने के बाद जब वह डिजिटल में आए तो प्रिंट में तकनीक के तमाम बदलावों को देख चुके थे लेकिन डिजिटल में उनके काम का नया आयाम देखने को मिला. विविध विषयों पर आसानी से समझाए जा सकने वाले गहराई वाले तथ्यपरक, शोधपूर्ण एक्सप्लेनर्स, लांग रीड, मुश्किल और जटिल विषयों को आसान भाषा में समझाए जाने वाले राइटअप.
एक बात और. सभी के लिए वो वर्तनी और भाषा की शुद्धता को जानने वाले एक्सपर्ट पत्रकार भी, जो हर किसी को चुपचाप बता देते कि किस हेंडिंग में गलती जा रही है या कौन सा शब्द गलत तरीके से लिखा गया. जब भी कोई साथी इस तरह की समस्या में कहीं उलझता तो तुरंत उन्हीं के पास निदान के लिए पहुंचता. दो साल पहले उन्हें एक नया और रोचक काम सौंपा गया कि देश -विदेश की प्रसिद्ध मदिरा के बारे में रोचक स्टोरीज लिखने की. ये काम इतनी बखूबी किया कि लगा कि ये तो ऐसी अनएक्सप्लोर बीट है, जिस पर शायद पहली बार हिंदी में इतना बढ़िया और मौलिक काम किया गया.
मेरी सचिन से मुलाकात 90 के दशक के पहले हिस्से में मेरठ स्पोर्ट्स स्टेडियम में उत्तर प्रदेश खेलों के दौरान हुई. मैं तब अमर उजाला में खेल पत्रकार था. वह सहारा नोएडा में. फिर हम दोनों ने कई जगहों पर साथ किया. न्यूज18 में फिर मौका मिला. सचिन ने जहां काम किया, टिककर किया. शुरुआत बरेली में आज से. फिर सहारा नोएडा, हिंदुस्तान दिल्ली. जागरण सेंट्रल डेस्क, फर्स्ट पोस्ट और आखिर में न्यूज18.
हिंदी पत्रकारिता में अब वो पीढ़ी धीरे-धीरे विदा हो रही है, जो ज्ञान, भाषा, लेखनी और जानकारियों के पिटारे से लैस होना खूबी मानती थी, उसे जीती थी और उसे जतन से सीखती थी. तकनीक ने पिछले 25 सालों में जब सबकुछ बदल दिया हो, तो ऐसे में प्रिंट से डिजिटल में आकर वहां भी अपने काम का लोहा मनवाना कतई आसान नहीं. वक्त के बदलाव के साथ तकनीक को साधना ही पड़ता है. मुझको तो खैर सचिन जी का विदा होना खासतौर पर खलेगा. और ये भी पक्का सचिन दूसरी पारी में भी बैटिंग करेंगे ही.


