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सहारा मजीठिया घपला! सुप्रीम कोर्ट में कम बकाया वेतन की सूची सौंपे जाने पर भड़के मीडियाकर्मी!

नई दिल्ली। सहारा मीडिया के सैकड़ों पत्रकार और मीडिया कर्मी उस समय भड़क उठे, जब यह सामने आया कि सहारा मीडिया प्रबंधन ने उनके मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाया वेतन की अधूरी और कथित रूप से कम आंकलन की गई सूची सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर दी है। आरोप है कि इस सूची में न तो वैधानिक ब्याज जोड़ा गया है और न ही वर्षों से लंबित वेतनवृद्धि का सही हिसाब लगाया गया है।

गौरतलब है कि सहारा मीडिया में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें नवंबर 2011 से लागू मानी जाती हैं, लेकिन प्रबंधन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में जो सूची सौंपी गई है, उसमें 2011 से 2025 तक किसी प्रकार की वेतन वृद्धि नहीं दिखाई गई है। इसे लेकर सहारा मीडिया के रिपोर्टरों, सब एडिटरों और अन्य कर्मचारियों में भारी नाराज़गी है।

प्रबंधन पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप

मीडिया कर्मियों का आरोप है कि सहारा मीडिया प्रबंधन से जुड़े जिन अधिकारियों और वरिष्ठ कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ मिलना ही नहीं चाहिए था, उन्होंने न सिर्फ मजीठिया के तहत अपनी सैलरी बढ़ाई, बल्कि बीच-बीच में नियमित वेतनवृद्धि भी लेते रहे। वहीं, जिन रिपोर्टरों और सब एडिटरों के लिए मजीठिया लागू किया गया था, उन्हें इसका वास्तविक लाभ कभी नहीं मिला।

कर्मचारियों का कहना है कि प्रबंधन ने जानबूझकर पत्रकारों और गैर-प्रबंधकीय स्टाफ की बकाया राशि को काफी कम दिखाया, जबकि वरिष्ठ अधिकारियों और निदेशकों की सूची में 5 से 10 करोड़ रुपये तक का बकाया दर्शाया गया है।

16,286 कर्मियों की 434 पन्नों की सूची पर सवाल

सहारा मीडिया प्रबंधन ने सुप्रीम कोर्ट में 16,286 अधिकारियों, कर्मचारियों और सेवानिवृत्त कर्मियों के वेतन और बकाया वेतन की 434 पेज की सूची दायर की है। मीडिया कर्मियों का आरोप है कि यह सूची तथ्यों के विपरीत और भ्रामक आंकड़ों पर आधारित है।

कुछ पत्रकारों का कहना है कि जिन्होंने वर्ष 2000 से पहले सहारा मीडिया में रिपोर्टर या सब एडिटर के रूप में काम शुरू किया था, उनका सही तरीके से पुनर्गणना (रिकाउंटिंग) करने पर कुल बकाया वेतन 1 से 2 करोड़ रुपये तक बैठता है, जबकि प्रबंधन ने ऐसे कर्मचारियों का बकाया महज 10 से 25 लाख रुपये दिखाकर सुप्रीम कोर्ट में पेश कर दिया है।

चार्टर्ड अकाउंटेंट से दोबारा गणना, सुप्रीम कोर्ट में गुहार

प्रबंधन की सूची से असंतुष्ट सहारा मीडिया कर्मी अब स्वयं चार्टर्ड अकाउंटेंट के जरिए अपनी सैलरी और बकाया वेतन की नई रिकाउंटिंग करवा रहे हैं। इसके बाद यह विवरण सुप्रीम कोर्ट में न्याय मित्र के माध्यम से जमा कराया जा रहा है।

दिल्ली से जुड़े सहारा मीडिया अखबार और टीवी चैनल के 250 से अधिक पत्रकार और कर्मचारी अब तक अपनी नई वेतन गणना कराकर अदालत का रुख कर चुके हैं।

मजीठिया वेज बोर्ड लागू रहने के दौरान सहारा मीडिया के पूर्व पर्सनल हेड रामवीर भी पत्रकारों और मीडिया कर्मियों को उनकी सैलरी और बकाया वेतन की सही गणना कराने में मदद कर रहे हैं।

धरना जारी, लेकिन सत्ता मौन

इस पूरे विवाद के बीच सहारा मीडिया के कुछ पत्रकार और कर्मचारी बीते कई महीनों से नोएडा स्थित सहारा मीडिया कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे हैं। बावजूद इसके, राजधानी से सटे नोएडा में चल रहे इस आंदोलन पर न तो किसी बड़े राजनीतिक दल का ध्यान गया है और न ही केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने अब तक कोई संज्ञान लिया है।

मीडिया कर्मियों का कहना है कि यह केवल बकाया वेतन का मामला नहीं, बल्कि पत्रकारों के अधिकारों, श्रम कानूनों और न्यायिक आदेशों के पालन का सवाल है। वे सुप्रीम कोर्ट में अपनी लड़ाई पूरी मजबूती के साथ लड़ने का संकल्प जता रहे हैं।

सहारा प्रबंधन ने बकाया वेतन व ग्रेच्युटी आदि की बीते दिनों 16,282 कर्मचारियों, अधिकारियों और सेवानिवृत्त कर्मियों की कुल 434 पेज की सूची सुप्रीम कोर्ट में सौंपी है। इस सूची को देखने के बाद सहारा मीडिया कर्मी भड़क गए हैं।

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