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सुख-दुख

सहारा कथा : हिंदी पत्रकारिता के बड़े नामों के ब्लैकलिस्ट होने से तख्तापलट तक!

चंद्र भूषण-

सजे दरबार में पत्रकारिता मीडिया का एक मध्यकालीन अनुभव

इस घटनाक्रम के तीन मुख्य चरित्र नामवर सिंह, विष्णु खरे और मंगलेश डबराल दिवंगत होकर दुख-सुख से परे जा चुके हैं। तीनों की स्मृति को नमन करता हूं। बाकियों से अग्रिम क्षमायाचना के सिवा कोई चारा नहीं है। नौकरी-चाकरी से जुड़े निजी अनुभव बीस साल से पहले सार्वजनिक नहीं किए जाने चाहिए, क्योंकि मन के घाव भरने में इतना वक्त तो लग ही जाता है। किताब लिखने के क्रम में यह गलती मुझसे 18 साल में ही हो गई, इसके लिए हृदय से खेद व्यक्त करता हूं।

यह पत्रकारिता की मेरी छठीं और होलटाइमरी छोड़ने के बाद गुजरे सात वर्षों में कुल मिलाकर सातवीं नौकरी थी। अखबार था सहारा समय साप्ताहिक। अजीब सनकमिजाजी में मैंने इसे जॉइन किया था। सबेरे दस बजे के आसपास अपने चेतक बजाज स्कूटर से घर से निकलता। एक-डेढ़ घंटे लाइब्रेरी में कुछ नोट्स बनाकर ‘सहारा समय’ साप्ताहिक की तैयारी बैठक में बैठता। फिर वहां से, यानी नोएडा सेक्टर-11 से तीन बजे जनसत्ता यानी नोएडा सेक्टर-2 जाता, जहां एक संपादकीय लिखकर शाम पांच बजे की भारी भीड़ में स्कूटर भगाता हुआ छह बजे तक आईएनएस पहुंचता।

दिल्ली, पार्लियामेंट के ठीक बगल में पड़ने वाले इस दफ्तर में तारीख बदलने तक दैनिक भास्कर के लिए फ्रंट पेज के हिसाब से कुछ खबरें और एक बॉटम पीस तैयार करना मेरा काम था। वह समय इराक पर 2003 वाले अमेरिकी हमले का था। एक तयशुदा कॉन्ट्रैक्ट के मुताबिक हर रोज रात दस बजे बगदाद में बैठे सतीश जैकब से बात करनी होती थी। दिन-रात जारी बमबारी के बीच वहां उनका ज्यादातर समय अपने होटल के बेसमेंट में ही बीत रहा था। बताने को उनके पास कुछ नहीं होता लेकिन अखबार में उनका बॉटम पीस बाईलाइन के साथ रोज लग जाता था।

भास्कर अखबार में मेरी नौकरी की यह शुरुआती शर्त थी और इसके एवज में सतीश जैकब को रोजाना बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के एक निश्चित कमाई हो जाती थी। संपादक हरीश गुप्ता- जिन्हें मित्रवर मनोहर नायक उनके संक्षिप्त हिंदी नाम ह.गु. के जरा बिगड़े हुए रूप ‘हग्गू’ के जरिये ही याद करते थे- फोन पर अपने इष्ट-मित्रों को बताते कि ‘आपको पता है, कितने सस्ते में हमारी फर्स्ट हैंड रेग्युलर वॉर प्रेजेंस बनी हुई है? जस्ट टू थाउजैंड रूपीज डेली। थिंक अ मिनट, सर। सिर्फ दो हजार रुपये। पीनट्स, यू नो!’

रात साढ़े बारह और जब-तब एक बजे दफ्तर के ऊपरी फ्लोर का ताला बंद करके मैं वहां से निकलता था। बेध्यानी में दो मौके ऐसे आए कि टंकी खाली होने के चलते स्कूटर स्टार्ट होते ही बंद हो गया। तेल भराने के लिए उसे घसीटकर कनाट प्लेस के इनर सर्कल तक लाना पड़ा। ऐसी नौबत क्यों आई कि एक ही समय में मैं तीन नौकरियां कर रहा था? संक्षेप में इतना ही कि यह कसरत मैं चोरी-छिपे टाटा-बिड़ला बन जाने के लिए नहीं कर रहा था। बस, स्थितियों का उलझाव था। तीनों अखबारों के संपादकों को पता था कि ऐसा हो रहा है, और सिर्फ एक महीना यह सिलसिला चला।

बड़ा खेल… सहारा समय बहुत ही दिलचस्प जगह थी लेकिन उसके ब्यौरों में जाने का कोई अर्थ नहीं है। कुछ खराब हुआ हो तो भी नहीं क्योंकि जिस काम से अपनी रोजी-रोटी निकली हो, उसकी अवमानना मेरे उसूल के खिलाफ है। इस किस्से का संबंध सिर्फ वहां गुजरे एक छोटे से वक्फे से है, जिसमें इंसान का एक अलग ही रूप मुझे देखने को मिला था। ऐसा रूप, जिसके बारे में इन घटनाओं से पहले मुझे लगता था कि वह मध्यकाल में ही विदा हो चुका है।

‘सहारा समय’ निकलना शुरू हुआ तो उसके तीन कार्यकारी संपादक थे- कुमार आनंद, मंगलेश डबराल और मनोहर नायक। इनके ऊपर सहारा के समूह संपादक गोविंद दीक्षित थे जो इस ग्रुप के सभी अखबारों और पत्रिकाओं में छपी सामग्री के लिए जवाबदेह थे। तीनों कार्यकारी संपादकों की पृष्ठभूमि जनसत्ता की थी लेकिन कुमार आनंद बीच में लंबे वक्त के लिए ‘हिंदुस्तान’ चले गए थे और ‘सहारा समय’ में वे बाकी दोनों से पहले आ गए थे।

सहारा के एपॉइंटमेंट्स में कुछ धुंध यूं भी रहती ही थी, लेकिन सहारा समय साप्ताहिक के मामले में यह कुछ ज्यादा घनी थी। कुमार आनंद की धारणा थी कि यह टैब्लॉयड उनके ही संपादकत्व में निकलेगा। शायद उनके एपॉइंटमेंट लेटर में इस बात का जिक्र भी था। लेकिन सहारा के संपादकीय कर्म में स्थापित लोग उन्हें इतना भाव देने को राजी नहीं थे। उनका पारिवारिक जुड़ाव आरएसएस से था। संभवतः राजनीतिक संपर्कों से ही वे अमर सिंह से जुड़े और सहारा जॉइन करने के बाद दैनिक अखबार से अपने करीबी लोगों को छांटकर वीकली की डमी तैयार करने लगे।

फिर अचानक सीन में नामवर सिंह की एंट्री हुई तो चीजें कुछ और शक्ल लेने लगीं। ग्रुप के भीतर समझ यह थी कि सहाराश्री (ग्रुप के मालिक सुब्रत रॉय) हिंदी के चर्चित नामों के साथ अपनी अबतक की सबसे बड़ी पीआर एक्सरसाइज शुरू करने जा रहे हैं। यह दांव खेलने के पीछे मुख्य कारक हाउसिंग और रीयल एस्टेट सेक्टर में उनकी एंट्री थी, जिसमें 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपये की पूंजी लगाने की बात वे करते थे।

इतने बड़े निवेश का कोई अर्थ तभी था जब दस लाख से ज्यादा लोग फ्लैट बुक कराएं। इसके लिए समाज में कंपनी की अच्छी साख जरूरी थी। सहारा समय टीवी के जरिये इस भगीरथ कार्य का जितना भी हिस्सा होने से रह जाएगा, वह इसी नाम वाला साप्ताहिक कर डालेगा, ऐसी उम्मीद सुब्रत रॉय ने इस वेंचर से लगा रखी थी। किस्से की शुरुआत इस जमीनी पेच से होती है कि इस नए-नए प्रकाशन में सत्ता संघर्ष इसके विमोचन से पहले ही शुरू हो गया था।

शीत युद्ध…. ‘सहारा समय’, ‘सहारा टाइम’ और ‘आलमी सहारा’ साप्ताहिकों के विमोचन के दिन सुब्रत राय ने नोएडा सेक्टर-11 के सहारा परिसर में बहुत बड़ा आयोजन किया। इस तनाव की झलक उस आयोजन में भी साफ देखी जा सकती थी। साल भर के अंदर सहारा समय साप्ताहिक की हिंदी क्षेत्र में ठीकठाक पहचान बन गई। इस टैब्लॉयड अखबार को देखकर शायद ही किसी को लगता रहा हो कि इसकी सामग्री का फैसला करने वाले दो शीर्ष व्यक्तित्वों गोविंद दीक्षित और कुमार आनंद के आपसी रिश्ते कितने खराब थे।

रोज ही लगता था कि आज कोई बड़ा बवाल होकर रहेगा। दोनों एक-दूसरे के पर कतरने में लगे रहते थे। इनसाइडर होने के चलते गोविंद दीक्षित को इस काम में बरतरी हासिल थी, जबकि कुमार आनंद के साथ मुश्किल यह थी कि राजनीतिक संपर्कों के बावजूद ग्रुप के भीतर से उन्हें कोई बैकिंग नहीं मिली हुई थी। हां, सहारा समूह में उनके करीबी लोग यह जानते थे कि सुब्रत राय के छोटे भाई जयब्रत राय गोविंद दीक्षित को सख्त नापसंद करते हैं। उन्हें सिर्फ एक ऐसे मौके की तलाश थी, जब गोविंद दीक्षित कंपनी को किसी तरह का नुकसान पहुंचाते दिखें और ‘छोटे साहब’ उन्हें ढंग से रगड़ दें।

इस बीच जनसत्ता के कार्यकारी संपादक ओम थानवी सहारा से अलग खार खाए हुए थे। कारण यह कि वहां से कई लोग अचानक इस तरफ चले आए थे। संयोग ही कहा जाएगा कि सहारा समय के शीर्ष स्तरीय टकराव के ग्रह-गोचर जनसत्ता में बनने शुरू हुए। वहां अखबार के इतवारी संस्करण में एक बहस चल रही थी कि हिंदी अखबारों में कंटेंट के स्तर पर मालिकान का दखल कितना बढ़ गया है, सच्ची और खरी बात लिखना यहां कितना कठिन हो गया है, और प्रिंट से टीवी तक समूचा हिंदी मीडिया किस कदर वाजपेयी सरकार की चमचागिरी पर उतारू हो गया है।

ऐसी बातें विष्णु खरे आदतन सबसे ज्यादा सख्त लहजे में कहते थे और उन्होंने कही भी। लेकिन बहस में शामिल किसी दूसरे सज्जन ने वहीं अपने जवाबी लेख में कहा कि खरे का ऐसा ही खरापन सहारा ग्रुप के मामले में कभी नहीं दिखता, जिसके प्रकाशनों में लिखकर वे हर महीने मोटा माल उठाते हैं।

इससे फनफनाकर विष्णु खरे ने एक और लेख लिखा, जिसका शीर्षक ‘तो अब कहता हूं’ जैसा कुछ था। इसमें उन्होंने बताया कि सहारा को बचाने की कोई मुद्रा उन्होंने पहले भी नहीं अपनाई थी, लेकिन अगर किसी को लगा हो कि उस समूह और उसके मालिक के प्रति उनका रुख नरम है, तो अब वे ब्यौरे के साथ दोनों के ही बारे में अपनी राय बता रहे हैं। इसके आगे उन्होंने पूरा उकटा पुराण बांच दिया।

लगा पलीता…. उनके इस लेख के छपते ही सहारा ग्रुप में बवाल हो गया कि एक ऐसा आदमी, जिसको हर महीने कंपनी से अच्छा-खासा पेमेंट मिल रहा है, कंपनी के बारे में कैसी-कैसी बातें लिख रहा है! रातोंरात समूह संपादक गोविंद दीक्षित की बड़े दरबार में पेशी हुई। अगले दिन उन्होंने सहारा समय से जुड़े लोगों की बहुत ही सख्त क्लास ली। पूछा कि विष्णु खरे हमारे यहां किसके संपर्क से छप रहे हैं? जिसने भी उन्हें छापा हो वह उनसे अभी के अभी बात करे कि यह कोई तरीका नहीं है। यह भी कि आगे से विष्णु खरे का लिखा हुआ कुछ भी सहारा के किसी भी प्रकाशन में नहीं छपना चाहिए। ठीक इसी बिंदु पर कुमार आनंद ने बहुत बड़ा गेम खेला।

ग्रुप के सारे प्रकाशनों की उस साझा मीटिंग में उन्होंने पहले एक छोटा सा भाषण दिया कि ‘जो भी हुआ है, वह बहुत गलत हुआ है। कई लोग, जो सहारा को हर मौके पर गालियां देते हैं, सारी जानकारी के बावजूद यहां छपते जा रहे हैं।’ इस अस्त्र की सीधी चोट मंगलेश डबराल पर थी, जिनकी विष्णु खरे से व्यक्तिगत मित्रता जगजाहिर थी। मंगलेश जी ने कहा कि लेख किसी का भी हो, साप्ताहिक में छपता तो है सबसे सलाह-मशविरे के बाद ही।

बात समस्या के समाधान की आई तो कुमार आनंद ने मीटिंग में कहा कि क्यों न ऐसे लेखकों की एक सूची बनाकर सारे प्रभारियों को सौंप दी जाए, जो हमारे प्रकाशनों में नहीं छप सकते। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि किसी विशेष स्थिति में अगर इस सूची में से किसी व्यक्ति का कुछ छापना ही हो तो इसके लिए समूह संपादक से इजाजत लेना जरूरी बना दिया जाए। यह उपाय वहीं के वहीं स्वीकृत हो गया।

उसी शाम हिंदी के तीस-चालीस सबसे अच्छे लेखकों-पत्रकारों की सूची बनाकर हर डेस्क इंचार्ज को सौंप दी गई। ऊपर दर्ज इस हिदायत के साथ कि ये लेखक हमारे प्रकाशनों में नहीं छपेंगे। मजे की बात यह कि इसके घंटे भर बाद ही इसकी एक प्रति जनसत्ता पहुंच गई, और अगली सुबह उस अखबार की फ्रंट पेज बॉटम न्यूज के रूप में कुछ ऐसे शीर्षक के साथ छपी- ‘सहारा ने जारी की हिंदी लेखकों की ब्लैक लिस्ट’।

इस खबर से सहारा ग्रुप में इतना बमचख मचा कि विष्णु खरे के इतवारी लेख से पैदा हुआ बवाल उसके सामने कुछ भी नहीं रह गया। सुब्रत राय का हाई प्रोफाइल हिंदी पीआर एक्सरसाइज उनके लिए इतनी बड़ी बदनामी का सबब बन जाएगा, इसकी वहां किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

पता नहीं किन बुद्धिमान लोगों ने यह लिस्ट तैयार की थी कि अच्छा अखबारी लेखन करने वाले तकरीबन सारे ही लेखक वहां की प्रतिबंधित काली सूची का हिस्सा बना दिए गए थे। इससे भी बुरी बात यह कि पूरे ग्रुप में अजीब संदेह का माहौल बन गया कि अखबार के भीतरी कामकाज के लिए बनाई गई यह सूची दूसरे अखबार में भला पहुंची तो किस तरह। आखिर कौन भेदिया यहां काम कर रहा है?

हम सात लोग जनसत्ता से सहारा समय साप्ताहिक में काम करने आए थे- मंगलेश डबराल, मनोहर नायक, अरिहन जैन, मनोज चतुर्वेदी, वेंकटेश, प्रेम और मैं। बीच में डेढ़-दो महीने भास्कर में काम करके आने से मेरी जगह इन नामों में जरा अलग थी, लेकिन संदेह की सुई सबसे पहले इन सात की ओर ही घूमी। हमारी पगार सहारा के पुराने पत्रकारों से थोड़ी ज्यादा थी, तो संदेह में कुछ योगदान इस विषमता का भी रहा।

शुक्रवार की रात सहारा समय साप्ताहिक प्रेस में जाता था। उस दिन मीटिंगों का सिलसिला चलता रहा, जिनमें हमारा कोई दखल नहीं था। पहले गोविंद दीक्षित ने घोषणा की कि जिसका भी हाथ इस खेल में पाया गया, उसको तत्काल नौकरी छोड़कर जाना होगा। इसके तुरंत बाद वहां खुद गोविंद दीक्षित को लेकर मीटिंगें शुरू हो गईं।

रात ग्यारह बजे के आसपास हम अखबार के तीन सेगमेंट छोड़ने की तैयारी में थे। चौथा फिल्मी हिस्सा एक दिन पहले छूट जाता था। मनोहर नायक और मंगलेश डबराल शीर्षकों को अंतिम रूप दे रहे थे कि तभी कुमार आनंद अपने कुछ सिपहसालारों के साथ वहां पहुंचे। बोले- ‘खूब बढ़िया हेडिंग लगाइएगा आप लोग। कुछ ऐसी कि दूर से ही देखकर लगे, अखबार पर कुमार आनंद की छाप है।’

मनोहर नायक अति महत्त्वाकांक्षी बम-पटाखों को लुत्ती लगाने की कला में माहिर थे। उन्होंने कहा, ‘क्यों? गोविंद जी को नहीं दिखाना है क्या?’ उस समय किसी और ही तल पर चल रहे कुमार आनंद ने कहा- ‘लगता है, अभी तक कोई सूचना नहीं आई आप लोगों के पास। गोविंद तो शायद हटा दिए गए हैं। सहारा समय अब पूरी तरह मैं ही देख रहा हूं। नोटिस का प्रिंटआउट लेके कोई चपरासी इधर आ ही रहा होगा।’

चिटफंडिया चंगेज…. पत्रकारिता में ही नहीं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में यह पहला तख्तापलट मैंने देखा था। बाकायदा योजना बनाकर किसी को सत्ता से हटाया जाना। लेकिन यह तो सिर्फ समुद्र में तैर रहे बर्फ के पहाड़ का ऊपरी छोर था। कुमार आनंद और गोविंद दीक्षित के लिए और थोड़ा-बहुत हमारे लिए भी दुनिया रातोंरात बदल गई थी लेकिन सहारा ग्रुप के लिए यह बहुत छोटा गेम था। पूरी दाल तो क्या, दाल के छौंकन से उछले जीरे जितनी हैसियत भी वहां इसकी नहीं थी। दसेक दिन बाद हमने पूरा पहाड़ देखा। मजा यह कि छह महीने में पहाड़ भी पिलपिला होकर बह गया।

फ्लोर पर सनसनी थी कि कोई बड़ा जालिम मिजाज का हाकिम लखनऊ से नोएडा की तरफ चल पड़ा है। चालीस से ज्यादा गाड़ियां, कुछ कंपनी की और कुछ पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों की, उसको लिवाने के लिए सबेरे से ही पालम हवाई अड्डे पर डेरा डाले हुए हैं। फिर कहीं से शोर उठा कि इनमें से एक गाड़ी के हवाई अड्डा पहुंचने में पांच मिनट की देरी हो गई। यह हादसा उसी गाड़ी के साथ हुआ, जिसपर इस खतरनाक आदमी को खुद सवार होना था!

मैनेजमेंट का जो बंदा गाड़ियों का इंतजाम देखता था, उसने मुनादी पीटने के ढंग से घोषणा की कि इस देरी के लिए वह सबके सामने माफी मांग रहा है और अपनी दस फीसदी सैलरी सरेंडर कर रहा है। चमत्कार! इस घोषणा के सिर्फ दो दिन बाद वह ट्रांसपोर्ट मैनेजर से सीधा ‘फ्लोर मैनेजर’ हो गया।

सुधीर श्रीवास्तव नाम का यह चिटफंडिया चंगेज खां जब हमारे फ्लोर पर सलामी लेने निकला तो मेरे लिए उसे देख पाना भी मुश्किल था। बीसियों दरबारी पत्रकारों से घिरा, टांगें छितराए सेकंड हैंड जिल्ले इलाही की तरह फ्लोर पर कदमताल करता साढ़े चार फुट का इंसान।

वहां बारह साल से नौकरी कर रहे मेरे एक पुराने गीतकार मित्र ने विह्वल होते हुए मुझे बताया कि ‘चंद्रभूषण जी, आप इनको जानते नहीं। ये सहारा के बिल्कुल शुरुआती लोगों में से हैं। सहाराश्री के तो ये इतने भरोसेमंद हैं कि अभी के अभी वे इनके दोनों अंडकोश मांग लें तो तुरंत काटकर हाथ में दे देंगे!’

यह बात उन्होंने सलामी परेड के बीच में खुसफुस लहजे में ही कही थी सो थोड़ा बाद में मैं उनसे पूछ पाया कि ‘दे तो ये जरूर देंगे, मानता हूं। लेकिन मटर से थोड़ा ही बड़े इनके अंडकोशों का सहाराश्री करेंगे क्या?’ खैर, सुयोग्य व्यक्ति होने के बावजूद काफी समय से मेरे ये मित्र सीनियर सब-एडिटर की पोस्ट पर अटके हुए थे। सुधीर श्रीवास्तव के प्रति अपनी अंधश्रद्धा का फायदा उन्हें इस रूप में मिला कि महीने भर के अंदर ही वे चीफ सब-एडिटर बन गए।

ट्रिपल प्रमोशन…. इस तरह के फायदे वहां कई लोगों को हुए, लेकिन कुछ लोगों को डबल-ट्रिपल फायदे भी हुए। मीडिया में किसी का ट्रिपल प्रमोशन शायद ही कभी सुनने में आया हो, लेकिन यह कमाल हमने उसी समय देखा। सहारा समय में अपने खास समझे जाने वाले एक रिपोर्टर को सीधे ब्यूरो चीफ बनाने की घोषणा कुमार आनंद ने कर दी। सामान्य स्थितियों में वह सीनियर रिपोर्टर और चीफ रिपोर्टर/स्पेशल करेस्पांडेंट का पायदान पार करने के बाद, यानी कम से कम दस साल का वक्त गुजर जाने के बाद ही इस पद पर पहुंच सकता था। आनंद जी की घोषणा अमल में न आ पाई, यह और बात है।

चर्चा थी कि काली सूची की हाथोंहाथ डिलिवरी जनसत्ता तक इसी बंदे ने पहुंचाई थी। कुछ बॉस की कृपा का लाभ उसे मिला, कुछ मुंह बंद रखने की कीमत। गोविंद दीक्षित को समूह संपादक पद से हटाकर रद्दी नियंत्रण (वेस्ट मैनेजमेंट) के काम में लगा दिया गया और डेली अखबार की संपादकीय जिम्मेदारी तीन लोगों को सौंप दी गई। शीर्ष पर एक सज्जन को सहारा समय न्यूज चैनल से लाकर रखा गया जबकि हमारे साथ काम कर रहे दो किनारे पड़े लोग नंबर दो और तीन बनकर ऐंठे-ऐंठे घूमने लगे।

अंग्रेजी अखबार सहारा टाइम और साथ में समूह संपादक का भी काम देखने के लिए लखनऊ से अंबिकानंद सहाय को लाया गया। लंबे समय से हिंदुस्तान टाइम्स के साथ जुड़े एक ऐसे सलामी जर्नलिस्ट, जो हमारी पहली ही मीटिंग लेते वक्त घंटा भर मोबाइल फोन पर अमर सिंह से बतियाते रहे, और हम सब उबासियां लेते हुए उनका यह मक्खनी एकालाप सुनते रहे। फिर दूसरी तरफ से बिना किसी दुआ-सलाम के अचानक फोन रख दिए जाने के बाद बोले- ‘यही आखिरी है। ऐसी कोई मीटिंग आज के बाद से यहां नहीं होगी।’

यह मध्यकालीन ड्रामा पता नहीं कैसे छह महीने के अंदर 180 डिग्री पलट गया। गोविंद दीक्षित पुराने पद पर वापस लौट आए। आते ही उन्होंने एक नोटिस जारी करके कुमार आनंद, मंगलेश डबराल और मनोहर नायक की सेवाएं समाप्त कर दीं और ‘सहारा समूह को अबतक प्रदान किए गए सहयोग को लेकर’ लिखित में नामवर सिंह का धन्यवाद ज्ञापित कर दिया। बोर्ड पर चिपकी यह नोटिस आलोचक प्रवर के यहां डाक से रवाना की जा चुकी है- यह सूचना भी नोटिस के नीचे दर्ज थी, सो हर किसी ने मान लिया कि इस भव्य इमारत में उनके दर्शन आगे कभी भी नहीं होने वाले।

जिन लोगों ने सुधीर श्रीवास्तव के राज में सहारा दैनिक का जिम्मा संभाल रखा था, उनमें दो का ट्रांसफर सैलरी में से महानगर भत्ता काटकर कानपुर कर दिया। पटना पृष्ठभूमि के एक वरिष्ठ पत्रकार को गोविंद दीक्षित ने अपने केबिन में बुलाकर कहा कि या तो आप अभी के अभी रिजाइन कर दें या दो डिमोशन पर (यानी असिस्टेंट एडिटर से सीनियर सब एडिटर बनकर) पटना चले जाएं। ट्रिपल प्रमोशन वाले रिपोर्टर को भी पुरानी पोजिशन में लाकर पटना भेज दिया गया, वहीं के सैलरी लेवल पर। मेरे ‘अंडकोश विशेषज्ञ’ मित्र इस बार छिपने में सफल रहे, पता नहीं कैसे।

छह महीने बाद इस उठापटक का अगला बिंदु गोविंद दीक्षित को एक बार फिर पैदल करके उन्हें दिल्ली स्थित कंपनी के पीआर डिपार्टमेंट में भेज दिए जाने के रूप में दिखा, लेकिन इससे पिछले सत्तारूढ़ खेमे का कोई फायदा नहीं हुआ। दोनों खेमों ने अपने-अपने रंग में आकर जिन लोगों की जिंदगियां पटरी से उतार दी थीं, उनमें लगभग एक तिहाई फिर कभी पटरी पर वापस नहीं लौट पाए। बाद में इससे मिलती-जुलती कुछ खुड़पेंचें मैंने जीवन में कुछ और जगह भी देखीं, लेकिन उनका पैमाना इससे छोटा था। (दो साल पहले आई किताब ‘पच्छू का घर’ से एक अंश)

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