अमृता शादीशुदा होकर भी साहिर पर मर मिटी थीं. बावजूद इसके साहिर ने अमृता से शादी नहीं की. अमृता से हटे तो सुधा मल्होत्रा से जा मिले. अधूरी आशिकी का अंत वहां भी वही जो अमृता प्रीतम के साथ था.…

संजीव चौहान-
वो खूबसूरत तारीख थी 8 मार्च और साल 1921. यह बात है गुलाम हिंदुस्तान के दौर की. जगह थी आज के पंजाब का जिला लुधियाना. यहीं रहते थे जागीरदार चौधरी फ़ज़ल मुहम्मद. इन्हीं चौधरी फ़ज़ल मुहम्मद के यहां इसी हसीन-यादगार तारीख को एक बालक का जन्म हुआ था. नाम रखा गया ‘अब्दुलहई फ़ज़ल मुहम्मद’. यही बालक कालांतर में आगे चलकर जमाने में मशहूर हुआ, गीतकार साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi ) के नाम से.
यह अर्टिकल ऐसे बिरले और जमाने भर के चहेते गीतकार, जनाब साहिर लुधियानवी की याद में उनके जन्मदिन के मौके पर लिखा जाना जरूरी है. ताकि साहिर साहब यादों में हमेशा मौजूद रह सकें.
अब्दुलहई उर्फ साहिर लुधियानवी अपने वालिद की ग्यारहवीं, मगर खुफ़िया, बीवी सरदार बेगम से उनकी पहली औलाद थे. साहिर लुधियानवी के जन्म के तुरंत बाद ही उनकी मां, चाहती थीं कि, उनके पति (साहिर के पिता) बेटे को बाप का नाम दें. जबकि फ़ज़ल मुहम्मद ने अपनी ग्यारहवीं बीवी के बारे में किसी को नहीं बताया था. लिहाजा बात बनती न देखकर सरदार बेगम बेटे अब्दुलहई उर्फ साहिर को लेकर जागीरदार चौधरी फ़ज़ल मुहम्मद से अलग हो गईं. क्योंकि वे बेटे को बाप का नाम और सरदार बेगम को, शौहर के रूप में अपना नाम देने को राजी नहीं थे.
हालांकि, इससे पहले यहां जिक्र जरूरी है कि साहिर की सुपुर्दगी को लेकर चौधरी फ़ज़ल मुहम्मद और सरदार बेगम के बीच मुकदमेबाजी भी हुई. कुल जमा साहिर की परवरिश ननिहाल में हुई. मालवा ख़ालिसा स्कूल से उन्होंने मैट्रिक किया. चूंकि तब तक लुधियाना ‘उर्दू’ का सरगर्म सेंटर बन चुका था. सो साहिर ने भी शौक-शौक में चढ़ती उम्र में ही शे’र-ओ-शायरी की ओर रुख कर दिया.
मतलब दसवीं जमात तक पहुंचते-पहुंचते साहिर साहब शे’र लिखने-पढ़ने लगे. साल 1939 में उन्हें गवर्नमेंट कॉलेज लुधियाना में दाखिला मिल गया.
राजनीतिक समझ आई तो उनका रुख कम्यूनिस्ट आंदोलन की तरफ हो गया. बीए के आखिरी साल में उनकी आंखें साथ पढ़ने वाली लड़की ईशर कौर से टकरा गईं. नतीजा यह रहा कि आशिकी और राजनीति के कॉकटेल ने साहिर लुधियानवी को, बीए के आखिरी साल में कॉलेज से बाहर करवा डाला. बीए भी नहीं कर सके. कॉलेज के पढ़ाई बीच में ही छुड़वा जिस आशिकी ने उन्हें तालीम से महरुम किया-कराया, उसी आशिकी ने मानो, साहिर को एक सफल शायर और आशिक बनाने में मील के पत्थर का सा काम कर डाला.
साहिर की उर्दू शायरी की पहली किताब ‘तल्खियां’ साल 1944 में पब्लिश हुई तो, तहलका मच गया. कॉलेज से निकाले जाने के बाद वे लाहौर (आज का पाकिस्तान) जा चुके थे. वहां उन्होंने दयाल सिंह कॉलेज में एडमिशन ले लिया था. लेकिन आशिकी के जुनून और पढ़ाई से उचट चुके जी ने उन्हें दयाल सिंह कॉलेज से भी बाहर का रास्ता नपवा डाला.
‘अदब-ए-लतीफ़’ के एडिटर बने, तो अरमानों को पंख लगना शुरू हो गया. इसी बीच कॉलेज के जमाने के एक दोस्त ने अपनी फिल्म ‘आजादी की राह पर’ के लिए साहिर से गीत लिखने को कहा और उन्हें मुंबई बुला लिया. फिल्म पिटी तो साहिर भी लुटे-पिटे से खाली हाथ रह गए. मतलब किस्मत यहां भी दगा दे गई.
एसडी बर्मन से मुलाकात हुई. एसडी बर्मन ने उन्हें एक धुन सुनाई जिस पर साहिर ने, ‘ठंडी हवाएं लहरा के आएं’ गीत के बोल लिख डाले. जिसे सुनकर एस डी बर्मन कूद पड़े. उस गीत ने साहिर और एसडी बर्मन की जोड़ी बनवा दी थी. बचपन में बेरुखी, बेअदबी का शिकार हो चुके, साहिर लुधियानवी की हसरतों को मुंबई में पहुंचते ही पंख लगे, तो वे अमृता प्रीतम और सुधा मल्होत्रा की आशिकी के जाल में फंसते चले गए.
इसे साहिर की किस्मत/बदकिस्मती कहें या फिर अजीब-ओ-गरीब हुनरमंदी समझें कि, साहिर के इश्क में जो लड़की गिरफ्तार होती, बाद में साहिर उसी के माशूक बन जाते. और आखिर में वे उससे अलग हो जाते. इस तरह से दिली-आशिक साहिर लुधियानवी साहब, खुद ही अपना सीना लहू-लुहान करते.
अमृता शादीशुदा होकर भी साहिर पर मर मिटी थीं. बावजूद इसके साहिर ने अमृता से शादी नहीं की. अमृता से हटे तो सुधा मल्होत्रा से जा मिले. अधूरी आशिकी का अंत वहां भी वही जो अमृता प्रीतम के साथ था.
कहते हैं कि आशिकी के ऐसे आलम में, और फिल्म इंडस्ट्री में बतौर गीतकार मुकाम हासिल करने के बाद, साहिर लुधियानवी में घमंड ने भी घर कर लिया था. इसी का नतीजा था कि वे गीत लिखने के लिए शर्त रखने लगे थे कि, वे किसी भी धुन पर गीत नहीं लिखेंगे, वरन् जो गीत वे (साहिर लुधियानवी) लिखेंगे उसके हिसाब से धुन बनाई जाएगी. यहां तक कि जिन एसडी बर्मन ने उन्हें बॉलीवुड (मुंबई फिल्म इंडस्ट्री) में मुकाम हासिल कराया, उनसे भी साहिर ने कह दिया कि, अगर बर्मन को गीत लिखवाने हैं तो वे, उनके घर (साहिर के घर) अपना हारमोनियम लेकर आएं. सामने बैठकर धुन बनाएं.
नतीजा यह रहा कि फिल्म ‘प्यासा’, एस डी बर्मन और साहिर लुधियानवी की एक साथ की आखिरी फिल्म साबित हुई. उसके बाद दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया. इस तमाम के बाद भी साहिर लुधियानवी को साल 1964 और 1977 में मतलब दो मर्तबा, बेहतरीन गीतकार का फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला.
साल 1971 में हिंदुस्तानी हुकूमत ने साहिर लुधियानवी को अगर पद्मश्री से, तो 1972 में महाराष्ट्र सरकार ने ‘जस्टिस ऑफ़ पीस’ से नवाजा. 8 मार्च 2013 को उनकी याद में भारतीय डाक विभाग ने टिकट जारी किया. 25 अक्टूबर 1980 को दिल का दौरा पड़ने से, साहिर लुधियानवी इस मायावी दुनिया के तमाम झंझटों से मुक्त होकर ‘परदा’ कर गए.
लेखक संजीव चौहान 1988 से मीडिया में हैं और खोजी पत्रकार के बतौर प्रतिष्ठित हैं। साल 1988 में चार पन्ने के हिंदी सांध्य दैनिक ‘विश्व मानव’ से शुरु सफर, हिंदी दैनिक ‘आज’, ‘दैनिक-जागरण’, ‘राष्ट्रीय सहारा (सभी अखबार), सहारा समय नेशनल न्यूज चैनल, स्टार न्यूज (अब ABP), आजतक, द्विभाषी (हिंदी अंग्रेजी) इंटरनेशनल न्यूज एजेंसी आईएएनएस, टीवी9 भारतवर्ष (डिजिटल) तक पहुँचा।



Prakriti kashyap
March 9, 2025 at 9:14 am
आर.डी.बर्मन नहीं एस. डी.बर्मन है
कुमार रहमान
March 9, 2025 at 1:43 pm
कृपया करेक्ट करें…
‘ठंडी हवाएं लहरा के आएं’ गीत आरडी बर्मन नहीं उनके पिता एसडी बर्मन ने लिखवाया था और इसके बाद उनकी जोड़ी बनी…