आदित्य कुमार गिरि-
भारत के ग़रीबजीवी बुद्धिजीवी… भारत में और विशेषकर कलकत्ते में ग़रीबी को ग्लैमराइज़ करके देखा जाता है। यहाँ सी.पी.एम. ने प्रगतिशीलता की बेहद घटिया समझ बना दी है। यहाँ चिरकुट जैसे रहने को सादगी समझा जाता है।

हिन्दीवालों में तो ग़रीबी ऐसे पूजनीय है कि घिन्न ही आती है। आप अच्छा पहन लो, हिन्दीवाले आपसे घृणा करने लगेंगे।
बेरोज़गारी के दिनों में एक कॉलेज में गेस्ट लेक्चरर था। वहाँ सी.पी.एम. के एक प्रोफेसर थे, इकोनॉमिक्स के। उनके पास दो शर्ट्स थीं। बेहद गन्दी, देखकर लगता था शर्ट पर कीचड़ रखकर किसी ने इस्त्री कर दी हो।
इसे वे सादगी कहते और हर साफ सुथरे कपड़ेवाले को पूंजीपति/शोषक/अमेरिका का एजेंट/ग़रीबों का खून चूसने वाला। यह मैंने एक उदाहरण दिया सी.पी.एम. का हर नेता, उससे जुड़े हर चिरकुट की ऐसी ही समझ है। और बुरा पक्ष यह है कि इसका बंगाल के आमलोगों पर भी असर पड़ा है। पड़ना ही था एक सोच 34 सालों तक आपके यहाँ रही, अछूते कैसे रहेंगे।
नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं आपकी मामी की फूफी के चचेरे भाई नहीं हैं कि गन्दी सी शर्ट पहनकर सिर में सरसों का तैल पोतकर घूमें। एक प्रधानमंत्री को,एक नेता को, एक एम्बेसडर को हमेशा सजधज के अच्छे से रहना चाहिए।
आप विवेकानंद को देखिए। संन्यासी थे लेकिन एक शानदार ड्रेसकोड था। राजाराममोहन राय बंकिमचन्द्र से लेकर रवींद्रनाथ तक साजसज्जा की क़ीमत समझते थे। घुटने तक की ढीली शर्ट पहनना, गंवारों की तरह मफलर पहनना, गन्दी सी फालतू सी साड़ी पहनना आपकी नज़र में नेताओं में आदर्श ड्रेसकोड है तो आप एक आधुनिक राष्ट्र में रहने के लायक नहीं हैं।
मुझे लालबहादुर शास्त्री कभी अच्छे नहीं लगे। जो आदमी ग़रीबी को ग्लैमराइज़ करे उससे घिन्न आती है। एक प्रधानमंत्री के पास चार जोड़ी ढंग के कपड़ों के लिये भी पैसे न हों तो धिक्कार है। ऐसे लिजलिजे घिनौने आदमी की आप पूजा करें मैं तो घृणा की हद तक नापसन्द करता हूँ। अच्छा खाना पहनना ऐय्याशी नहीं है। यह एक आम बात है।
जिनलोगों को चिरकुट की तरह रहनेवाले प्रधानमंत्री की चाहत है वे दिमाग़ से कुंठित हैं। पंडित नेहरू हों या इंदिरा जी ड्रेसिंग की शानदार समझ थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुझे अपने स्वैग के लिए अच्छे लगते हैं जिन्हें उनका अच्छा पहनना अच्छा नहीं लगता वे किसी अच्छे मनोचिकित्सक से उपचार कराएं।


