यशवंत सिंह-
साम्राज्यवाद किसी को नहीं छोड़ता, ख़ुद को भी नहीं! इसके ताकतवर लोग भी कैसे ग़ुलाम बन जाते हैं, इन दो उदाहरणों से समझिए!
पहला उदाहरण: लार्ड क्लाइव जैसे ताकतवर आदमी ने सुसाइड क्यों किया था?
लार्ड क्लाइव (Robert Clive), जिसे “Clive of India” भी कहा जाता है, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का एक प्रमुख अधिकारी था जिसने भारत में ब्रिटिश सत्ता की नींव रखने में बड़ी भूमिका निभाई। विशेष रूप से 1757 की प्लासी की लड़ाई में जीत के बाद उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया था। लेकिन अंत में उसने 1774 में आत्महत्या कर ली।
लार्ड क्लाइव ने भारत में रहते हुए भ्रष्टाचार और लूटखसोट में भाग लिया। बंगाल में 1765 में दीवानी मिलने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जमकर धन अर्जित करने लगे, जिससे भयानक अकाल (1770 का बंगाल अकाल) पड़ा।
क्लाइव को इस व्यवस्था का शिल्पकार माना गया, और बाद में उसे लगा कि उसने बहुत कुछ गलत किया है। ब्रिटेन लौटने के बाद उसे ब्रिटिश संसद में भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा। भले ही उसे कानूनी रूप से दोषी नहीं ठहराया गया, लेकिन उसकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुंचा।
क्लाइव को गैस्ट्रिक समस्या और दर्दनाक बीमारियाँ थीं, जिनका इलाज उस समय प्रभावी नहीं था। उसे लगातार शारीरिक दर्द रहता था, जो उसकी मानसिक हालत को और खराब करता था। लंबे समय से मानसिक रूप से अस्वस्थ था। उसे डिप्रेशन, बेचैनी और आत्मग्लानि रहती थी। इतिहासकारों का मानना है कि उसने अफीम और अफीम-आधारित दर्दनिवारक दवाओं का अधिक सेवन किया, जिससे उसका मानसिक संतुलन और बिगड़ गया।
लार्ड क्लाइव ने आत्महत्या अपने मानसिक, नैतिक और शारीरिक संघर्षों के कारण की। भारत में किए गए कार्यों की नैतिक जिम्मेदारी, भ्रष्टाचार के आरोप, अवसाद और स्वास्थ्य समस्याओं ने उसे इस हद तक तोड़ दिया कि उसने 1774 में आत्महत्या कर ली।
अब दूसरा उदाहरण : जॉर्ज ऑरवेल को न चाहते हुए भी मजबूरन हाथी को क्यों मारना पड़ा!
जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) की प्रसिद्ध लघु-कहानी “Shooting an Elephant” एक अर्ध-आत्मकथात्मक निबंध है, जिसे Orwell ने 1936 में लिखा था। आइए इसकी कहानी को समझते हैं:
“Shooting an Elephant” की कहानी बर्मा (अब म्यांमार) में घटती है, जब जॉर्ज ऑरवेल वहाँ ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन एक पुलिस अधिकारी के रूप में तैनात थे। एक हाथी शहर में बेकाबू हो जाता है और लोगों की संपत्ति नष्ट करता है। एक आदमी को वह कुचलकर मार भी देता है! ऑरवेल को उस हाथी को काबू करने के लिए बुलाया जाता है। जब ऑरवेल हाथी को ढूँढ़ते हैं, तो वह शांत खड़ा होता है और अब कोई खतरा नहीं लगता। लेकिन तब तक हजारों लोग जमा हो जाते हैं और चाहते हैं कि वह हाथी को मार दे।
ऑरवेल खुद हाथी को मारना नहीं चाहता, लेकिन उसे डर है कि अगर वह नहीं मारेगा, तो लोग उसे कमजोर और डरपोक समझेंगे। वह साम्राज्य का प्रतिनिधि है, और भीड़ को खुश रखने के लिए “शक्ति” दिखाना उसकी मजबूरी बन जाती है। वह हाथी पर गोली चलाता है, लेकिन हाथी एक ही बार में नहीं मरता। यह दर्दनाक और लंबी प्रक्रिया हो जाती है।
बाद में वह मानता है कि उसने हाथी को इसलिए नहीं मारा क्योंकि वह खतरनाक था, बल्कि इसलिए मारा क्योंकि वह “भीड़ की नजर में कमज़ोर नहीं दिखना चाहता था”
यह कहानी साम्राज्यवाद की आलोचना है। जॉर्ज ऑरवेल बताते हैं कि कैसे साम्राज्य के शासक खुद भी गुलाम हो जाते हैं – जनता की अपेक्षाओं के!
सत्ता में होने / पॉवरफुल होने का मतलब हमेशा स्वतंत्र होना नहीं होता। इसलिए सत्ता / ताक़त की रैट रेस से बचिए, जितना हो सके सहज जीवन / आम आदमी का जीवन जीने की कोशिश करिए!
(वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सौरभ सर के साथ रामगढ़ नैनीताल में भड़ास एडिटर)


