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सांदेसरा बंधुओं का करीब 60 हजार करोड़ कर्ज मात्र 5 हजार करोड़ में निपटा; आर्थिक भगोड़ों के लिए ‘सेटलमेंट’ के रास्ते खोल सकता है सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश!

नई दिल्ली। स्टर्लिंग बायोटेक घोटाले के आरोपी सांदेसरा बंधुओं—नितिन और चेतन—को सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत को लेकर कानूनी और जांच एजेंसियों के हलकों में बड़ी बहस छिड़ गई है। 19 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारित आदेश के बाद न सिर्फ सांदेसरा बंधुओं के खिलाफ आपराधिक कार्यवाहियां समाप्त हो गईं, बल्कि विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अन्य आर्थिक भगोड़ों के लिए भी ‘नेगोशिएटेड सेटलमेंट’ का रास्ता खोल सकता है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस फैसले से भारत की विदेशों में चल रही प्रत्यर्पण (एक्सट्रडिशन) कोशिशें कमजोर पड़ सकती हैं, क्योंकि अब भगोड़े यह दलील दे सकते हैं कि भारत में आर्थिक अपराधियों के साथ अलग-अलग तरीके से व्यवहार किया जा रहा है।

हालांकि जांच एजेंसियों के अधिकारियों ने इस मामले में किसी भी तरह के ‘विशेष व्यवहार’ से इनकार किया है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह पूरी तरह अदालत के आदेश के तहत हुई प्रक्रिया थी। उन्होंने बताया कि यदि कोई अन्य भगोड़ा सुप्रीम कोर्ट का रुख करता है, भुगतान की पेशकश करता है और अदालत आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का आदेश देती है, तो एजेंसियों को उसका पालन करना होगा।

वरिष्ठ अधिवक्ता तनवीर अहमद मीर ने कहा कि किसी भी संवैधानिक अदालत, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को भी, सभी आपराधिक मामलों को समाप्त करने के लिए असाधारण परिस्थितियों और आरोपी की गैर-दोषिता के स्पष्ट संकेतों की आवश्यकता होती है। सांदेसरा बंधुओं के मामले में ऐसी असाधारण परिस्थितियां स्पष्ट नहीं दिखतीं, क्योंकि जांच एजेंसियों ने उनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी, जो उनके आपराधिक दायित्व की ओर इशारा करती है।

हालांकि मीर ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह स्पष्ट किया है कि यह फैसला मिसाल (प्रेसिडेंट) नहीं बनेगा, लेकिन इसके बावजूद यह विजय माल्या, नीरव मोदी, मेहुल चोकसी जैसे अन्य आर्थिक अपराधियों के लिए समान राहत की मांग का दरवाजा जरूर खोलता है।

मेहुल चोकसी का प्रतिनिधित्व करने वाले वरिष्ठ वकील विजय अग्रवाल ने इस फैसले को ‘स्वागत योग्य कदम’ बताया। उन्होंने कहा कि बैंकों ने आखिरकार अपना पैसा वसूल लिया है। अगर मुकदमे जीवन भर चलते रहते और आरोपियों का प्रत्यर्पण कर ट्रायल पूरा करने में वर्षों लगते, तो सरकारी खजाने पर भारी खर्च पड़ता।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग ने सांदेसरा बंधुओं पर लगाए गए यात्रा प्रतिबंध हटा लिए। सांडेसरा बंधुओं ने कुल ₹7,980 करोड़ का भुगतान किया, जिसमें ₹5,111 करोड़ अंतिम सेटलमेंट राशि थी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सांदेसरा बंधुओं समेत 15 भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर सरकारी बैंकों का कुल बकाया ₹58,082 करोड़ है। अधिकतर मामलों में सीबीआई और ईडी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) और धनशोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कार्रवाई की है, जिनमें जांच और कानूनी प्रक्रियाओं पर भारी सरकारी धन खर्च हुआ है।

विजय माल्या, जिन पर बैंकों का ₹9,806 करोड़ बकाया है, पहले भी यह दावा कर चुके हैं कि उनकी संपत्तियों से ₹14,000 करोड़ की वसूली हो चुकी है, हालांकि उनके कानूनी प्रतिनिधियों ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की।

ईडी के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि सांदेसरा मामले में केस खत्म होने से यह संदेश जा सकता है कि जिन लोगों पर पहले जांच चल रही थी या जो सरकारी रडार पर थे, अब उन पर स्वतः कोई आपराधिक जिम्मेदारी नहीं रह जाती।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले का इस्तेमाल भविष्य में माल्या, चोकसी और नीरव मोदी जैसे भगोड़े विदेशी अदालतों या सरकारों के सामने यह तर्क देने के लिए कर सकते हैं कि भारत में उनके खिलाफ कार्रवाई राजनीतिक या पक्षपातपूर्ण है, जबकि कानून सभी के लिए समान है।


प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार डॉ मुकेश कुमार का ट्वीट-

संदेसरा बंधुओं पर क़रीब साठ हज़ार करोड़ का कर्ज़ा था मगर सुप्रीम कोर्ट ने पाँच हज़ार करोड़ निपटा दिया। अब डर है कि ये नज़ीर न बन जाए। बाक़ी सब घोटालेबाज़ भी सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले की आड़ में सस्ते में निपट जाएंगे। हमारा सुप्रीम कोर्ट भी ग़ज़ब है। सहारा, अडानी, अंबानी सब धनपशुओं का संरक्षक बन गया है। मोदी है तो मुमकिन है।


कुल बकाया ₹58,082 करोड़, जबकि सांडेसरा बंधुओं ने सिर्फ ₹5,111 करोड़ चुकाए हैं — जो मूल रकम भी नहीं है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें असाधारण राहतें दे दीं, लेकिन साथ ही कह दिया कि यह फैसला दूसरों के लिए मिसाल नहीं बनेगा। ऐसा इसलिए कहा गया ताकि भविष्य में अन्य भगोड़े आर्थिक अपराधी इस आदेश का हवाला देकर वही राहत न मांग सकें और सरकार-जांच एजेंसियों पर समझौते का दबाव न बने। हालांकि व्यवहार में यह फैसला विदेशी अदालतों और प्रत्यर्पण मामलों में जरूर उद्धृत होगा। यानी अदालत ने राहत तो दे दी, लेकिन उसके व्यापक असर की जिम्मेदारी लेने से खुद को अलग रखा। – सुशांत सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

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