
संदीप कुमार-
28 जून को हम कुछ दोस्त इंदौर में मिल बैठे और संजीव को याद किया। कौन था संजीव? बताना मुश्किल है।
जैसा कि किसी साथी ने यहीं फेसबुक पर लिखा था- “मुझे संजीव से सही मायनों में रश्क है। वो कोई संपादक नहीं था, किसी का करियर बनाने लायक नहीं था, किसी को आर्थिक मदद पहुंचाने लायक नहीं था। फिर ऐसा क्या था कि लोग उसके जाने के बाद उसे इस कदर याद कर रहे हैं, उसकी याद में इस कदर शोक में डूबे हुए हैं? सोचता हूं क्या कोई मुझे भी ऐसे याद करेगा?”
उन मित्र के इस सवाल का जवाब 28 जून की शाम इंदौर में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और कवि गौहर रज़ा ने संजीव स्मृति व्याख्यान में दिया। उन्होंने कहा, “संजीव ‘जनता का पत्रकार’ था, जो सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्ध था।”
उस सवाल का जवाब इस बात में भी छिपा है कि जब हमने मित्र Anurag Dwary से आग्रह किया कि वे हमारे साथ चलें और संजीव की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में बोलें तो उन्होंने संजीव के बारे में जानना चाहा। मैंने उन्हें उस किताब का पीडीएफ भेज दिया जिसमें संजीव के दोस्तों ने उसके बारे में लिखा है।
किताब पढ़कर अनुराग का फोन आया। उन्होंने कहा, “संदीप। मैं जितना इस किताब को पढ़ता जाता हूं, एक अफसोस में डूबता जाता हूं कि मैं जीते-जी संजीव से क्यों नहीं मिल सका। मैं उनके मित्रों में से एक क्यों हो सका?” यही था संजीव।
उसकी अनेक पहचानें थीं- वह कवि था, रंगकर्मी था, पत्रकार था, सामाजिक कार्यकर्ता था लेकिन सबसे बढ़कर वह एक बेइंतहा ईमानदार और रिश्तों में अपना 200 फीसदी देने वाला इंसान था।
शायद यही वजह है कि Vineet भैया ने अहद उठाया और 28 जून की एक गीली सुबह दूर दिल्ली से रश्मि, बालकरामजी और युवाओं का एक जत्था, औरंगाबाद से Vinod Bandawala तो भोपाल से अनुराग, संदीप, Pooja और Anil तथा बुलढाना से प्रशांत सोनाने और ऐसे ही अनगिनत जगहों से कई साथी इंदौर के अभिनव कला समाज में एकत्रित हो गए उसे याद करने। इंदौर के स्थानीय साथी तो थे ही।
संजीव की स्मृतियों का यह कारवां साल दर साल यूं ही चलता रहेगा। एक मशाल सा रोशनी दिखाता रहेगा।




