नई दिल्ली/जयपुर। पत्रकारिता की दुनिया में लंबा और सम्मानजनक सफर तय करने के बाद वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव ने एक अलग राह चुनते हुए कचौरी की दुकान शुरू की है। बीबीसी के इंडिया हेड जैसे प्रतिष्ठित पद पर कार्य कर चुके श्रीवास्तव का यह कदम सोशल मीडिया और मीडिया जगत में चर्चा का विषय बना हुआ है।
पत्रकार Arvind Chotiya से बातचीत में संजीव श्रीवास्तव ने करीब 10 मिनट के वीडियो में इस फैसले के पीछे की कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि जीवन में बदलाव और आत्मसंतोष की तलाश ने उन्हें यह नया रास्ता चुनने के लिए प्रेरित किया।
“सम्मान काम से होता है, पेशे से नहीं”
वीडियो में श्रीवास्तव कहते हैं कि पत्रकारिता ने उन्हें बहुत कुछ दिया, लेकिन अब वे कुछ अलग और ज़मीन से जुड़ा काम करना चाहते थे। उनका मानना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता—ईमानदारी और लगन से किया गया हर कार्य सम्मान के योग्य है।
पत्रकारिता से उद्यमिता तक
करीब तीन दशक से अधिक समय तक मीडिया में सक्रिय रहने के बाद उन्होंने कचौरी की दुकान खोलकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि करियर के किसी भी मोड़ पर नई शुरुआत की जा सकती है।
मीडिया जगत के कई लोगों ने उनके इस फैसले को साहसिक और प्रेरणादायक बताया है। कुछ इसे बदलते मीडिया परिदृश्य और व्यक्तिगत विकल्प की स्वतंत्रता के रूप में देख रहे हैं।
सामाजिक संदेश भी
संजीव श्रीवास्तव का कहना है कि वे युवाओं को यह बताना चाहते हैं कि पारंपरिक करियर ही सफलता का पैमाना नहीं है। हुनर, मेहनत और आत्मसम्मान से किया गया हर कार्य सार्थक है।
वरिष्ठ पत्रकार का यह कदम न केवल लीक से हटकर है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि पेशेवर पहचान से परे इंसान की असली पहचान उसके काम और दृष्टिकोण से बनती है।
शंभुनाथ शुक्ला-
फ़ारसी में एक कहावत है, “पढ़े फ़ारसी बेचें तेल, ये देखो कुदरत का खेल!” और इसे सच कर दिखाया अपने मित्र और वरिष्ठ पत्रकार साथी संजीव श्रीवास्तव ने। इंडियन एक्सप्रेस के राजस्थान हेड फिर बीबीसी के इंडिया हेड और कई टीवी चैनलों के संपादक रहने के बाद संजीव जी ने जयपुर में मटर कचौड़ी की दूकान खोली है। ऐसा वह कोई कुदरत के खेल के चलते नहीं कर रहे बल्कि मिष्ठान्न और पकवान का अपना होटल खोलने की नीयत से किया। मुझे उन्होंने जयपुर बुलाया है। जा कर खाऊँगा भी और सब मित्रों के लिये ले कर भी आऊंगा। संजीव जी के इस अभिनव प्रयोग के लिए उनको बधाई और शुभकामनाएँ!
बीबीसी के इंडिया हेड रहे सम्मानित पत्रकार संजीव श्रीवास्तव जी ने कचोरी की दुकान खोली है। क्यों? पत्रकार अरविंद चोटिया को संजीव श्रीवास्तव जी ने खुद बताया। -मुकेश माथुर, पत्रकार
अभिषेक द्विवेदी-
एक दौर था संजीव जी का….
पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में दिल्ली के एकेडमिक सेशन में तब के सीनियर जर्नलिस्ट संजीव सर की जर्नलिज़्म की क्लासेज मैंने भी ली थी…
विचारधारा को अलग रखकर देखें तो.. लीक से हटकर ‘नई शुरुआत’ थोड़ा अजीब तो है,लेकिन ऐसा सब लोग नहीं कर पाते।
आज जहां लोग अपना यूट्यूब ,डिजिटल टाइप वेंचर खड़ा करते हैं,वहां रेस्टोरेंट डालना स्वागत योग्य है, इसमें कतई कहीं से कोई शर्म का विषय नहीं है।
अखिलेश शर्मा-
संजीव जी बहुत आदरणीय हैं। मेरे प्रोफेशनल जीवन में उन्होंने बड़ा मौका दिया था। मुझे टीवीआई से बीबीसी हिन्दी टीवी लेकर गए थे जहां छोटी उम्र में ही जम कर रिपोर्टिंग करने का मौका मिला था। आज भी जब भी मिलते हैं, बहुत गर्मजोशी से पार्टनर कह कर मिलते हैं।
उन्होंने कचौरी की दुकान खोली है। ऐसा उन्होंने शौक के चलते किया। ऐसा माना जाता है कि एक पत्रकार जीवन भर पत्रकार ही रहता है। उनका कचौरी की दुकान खोलना कुछ लोगों को हैरान कर सकता है। परंतु जो उन्हें जानते हैं, वे समझते हैं कि संजीव जी हमेशा से प्रयोगधर्मी रहे हैं। वे एक्सप्रेस वाले संजीव जी के नाम से भी जाने जाते हैं और बीबीसी वाले संजीव जी के नाम से भी। अब उनकी एक नई पहचान संजीव जी कचौरी वाले भी जुड गई।
मनुष्य को एक ही जीवन मिलता है। कोई मलाल नहीं रहना चाहिए। सभी इच्छाएं पूरी कर लेनी चाहिएं। अगर यह सोचते रह गए कि लोग क्या कहेंगे, तो कुछ नहीं कर पाएंगे।
यूट्यूब के बारे में उन्होंने सही कहा कि तटस्थ पत्रकारों को कम देखा जाता है। प्रो या एंटी वालों को ही पूछा जाता है। यह हमारे बदले समाज पर एक तीखी टिप्पणी है क्योंकि एक वक्त था जब पत्रकार से केवल तटस्थ रहने की ही उम्मीद की जाती थी।
जाहिर है जब समाज बदला है तो पत्रकार भी अपने हिसाब से खुद को बदलेगा। जिसे जो काम पसंद है, वह काम भी करेगा।
संजीव जी को इस नई पहल के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। जब भी मौका लगेगा, जयपुर में उनकी दुकान पर कचौरी जरूर खाऊंगा।
अरविंद चोटिया जी को यह वीडियो पोस्ट करने के लिए धन्यवाद। बहुत ही रोचक बातचीत की आपने। पर दस मिनट में केवल एक ही कचौरी खा पाए। अपनी पाचन क्षमता थोड़ी बढ़ाइए।



Vinod kumar
February 21, 2026 at 7:13 pm
Ab iska thikra bhi Narendra Modi par phod do. Darvaari Media abhi dekho yahi karega. Wo to Sanjiv Sir ne khud kah diya kiya social media par anti Modi aur pro Modi hai. Agar ye anti modi hote to ye sab kahte ki ye sab modi ne hi karwaya hai. Shame on you gugs….
Devendra Surjan
February 22, 2026 at 5:20 pm
संदीप श्रीवास्तव ने यह काम ठीक किया है कि कोई बड़ा तामझाम दुकान में नहीं किया. सादी सी दीवारें हैं और खुद ही प्लेट उठाकर कचौड़ी ग्राहक को दे रहे हैं. हो सकता है उनका विडियो प्री-अरेंज्ड हो, पर यह शुरुआती तौर पर ठीक है, क्योंकि रेस्त्रां या खाने पीने की दुकान सबको नहीं फलती. चल गई तो चल गई नहीं तो उस जगह पर बोर्ड बदलते रहते हैं और मालिक भी. एक ही जगह पर कईयों की किस्मत का निपटारा हो जाता है. यदि ये चल गई तो दुकान को भी रंगीन बना लेंगे और ख़ुद कैश पर बैठेंगे नहीं तो घर पर बैठेंगे. बीबीसी से मुक्त होकर संदीप श्रीवास्तव ने बड़े बड़े एंकरों के साथ बैठकर मोदी चालीसा पढ़ा है. अभी कह जरूर रहे हैं कि हम तो बीच वाले थे, लेकिन यह संभव हुआ ही कब है. फेंस पर बैठकर कौन सफल हो पाता है. मोदी गान के बाद सबसे पहला काम उन्हें पकौड़ी या कचौड़ी तलवाने का मिला. कोई बात नहीं, कल हमारे एक मित्र ने कहा “कोई काम छोटा नहीं होता”, तो अपन भी उनकी सफलता के लिए दुआ कर लेते हैं. वैसे अखबार हो या दुकान, पहले दिन चल गई तो चल गई नहीं तो सामने दीवाल और आपका सिर ही रहता है.
Rajesh Mathur
February 23, 2026 at 8:08 pm
Nishpaksh patrkar Ravish jaise nahi Sanjeev ji jaise hote hain.jo apne kaam ko nishpaksh karte hain, kisi ki chamchagiri,charan vandana nahi.
RDMathur