छत्तीसगढ़ के सरगुजा में परसोडिकला की आदिवासी ज़मीन पर गुज़रात की निजी कंपनी को खनन दिलाने के लिए पुलिस ने स्थानीय आदिवासियों पर लाठीचार्ज और आंसू गैस छोड़ी। जिन्होंने जंगल बचाया, आज उन्हें ही जंगल से भगाया जा रहा है। आदिवासियों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष चल रहा है। नीचे पढ़िए…
पर्यावरणविद आलोक शुक्ला का ट्वीट-
आदिवासी समाज जिस जंगल – जमीन की कई पीढ़ियों से रक्षा करते आए हैं उसे अब इतनी आसानी से कैसे छोड़ देगा । संविधान कानून जरूर अनुसूचित क्षेत्रों के हितों में है लेकिन उसे लागू करने वाली सत्ता पूंजीपतियों की ग़ुलाम है । आज ये हालात छत्तीसगढ़ के सरगुजा में स्थित अमेरा कोयला खदान के विस्तार परियोजना के लिए जारी जमीन अधिग्रहण के कारण बने हैं जहाँ बिना ग्रामसभा सहमति के ही जमीन छीनी जा रही है। कोयला खदान एसईसीएल की है लेकिन इसका संचालन गुजरात की एक निजी कंपनी करती है।
विकास कुमार-
देश के एक कोने में ये भी हो रहा है. छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कुछ महीनों से ग्रामीण कोल माइंस के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.
ग्रामीणों को उनकी जमीन से हटाकर खदान विस्तार का काम किया जाना है, लेकिन ग्रामीण जमीन देने को तैयार नहीं है. आज पुलिस ने लाठी- आंसू गैस के गोले चलाए तो ग्रामीणों ने कोयला और पत्थर.
टीएस सिंहदेव-
सरकार जिनकी प्रतिनिधि है, उन्हीं पर लाठियाँ बरसा रही है ।
सरगुजा ज़िले के लखनपुर विकासखंड के ग्राम परसोडिकला का आज का दृश्य लोकतंत्र को शर्मिंदा करने वाला है – जहां गुजरात की एक निजी कंपनी से सरकारी खदान में उत्खनन कराया जा रहा है, और विरोध कर रहे स्थानीय ग्रामीणों पर पुलिस का लाठीचार्ज और आंसू गैस बरसाई गई।
यही है वह ‘गुजरात मॉडल’, जिसे देश वाराणसी और अयोध्या में भी देख रहा है – जहां स्थानीय लोगों के रोजगार और संसाधनों पर बाहर की कंपनियों और लोगों का कब्ज़ा कराया जा रहा है, और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की पूरी तरह अनदेखी कर दी गई है।
सरकार का काम जनता की रक्षा करना है – उन्हीं पर लाठियाँ चलाना नहीं। छत्तीसगढ़ के लोगों के हक़, ज़मीन और भविष्य का इस तरह दमन नहीं किया जा सकता।
प्रिंस सिंह-
ये लड़ाई है…जल, जंगल और जमीन की…तस्वीर कल यानी 3 दिसंबर की है…जब छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में वहां के स्थानीय लोग और पुलिस आमने-सामने आ गए। तस्वीरों से स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस झड़प में सैकड़ों लोग घायल हुए हैं।
लेकिन आज जो ये स्थिति है। इसके पीछे 20 साल पहले किया गया एक वादा है…एक ऐसा वादा जो गरीबों से उनके जंगल और जमीनों को छीन कर किया गया था…कि आपके जमीन के बदले मुआवजे के साथ-साथ घर के एक सदस्य को नौकरी भी देंगे। लेकिन इन 20 सालों में इन गरीबों को उम्मीद के अलावा और कुछ नहीं मिला।
ये कंपनी लोगों को नौकरी देने के बदले में अपना विस्तार करना चाहती है। और लोगों के पास जो थोड़ा-बहुत रहने के लिए जगह बची है। उसे भी कब्जाना चाहती है। लानत है ऐसी सरकार पर जो पैसों के लिए ये सब करवा रही है। हैरानी तब हो रही है जब कंपनी के अधिकारी कह रहे हैं कि सरकार ने उन्हें ये जमीन अधिग्रहण करके दिया है। इसका मतलब इस पूरे फसाद की जड़ सरकार है। फिर वो चाहे अब कि सरकार हो या पूर्व की…
चलिए अब थोड़ा उस कंपनी के बारे में जान लेते हैं जो गरीबों का खून चूसने में कोई कमी नहीं छोड़ रही है। कंपनी का नाम है SECL…!
SECL भारत सरकार की Coal India Limited (CIL) की एक सब्सिडियरी कंपनी है। यानी SECL भारत सरकार की ही कंपनी है।
SECL क्या करती है?
SECL भारत की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनियों में से एक है। इसका मुख्य काम है कोयला (Coal) का खनन करना…कोयले की प्रोसेसिंग और सप्लाई करना! ये कंपनी भारत के बिजली घरों, उद्योगों, स्टील प्लांट्स आदि को कोयला उपलब्ध कराती है।
SECL कहाँ काम करती है?
ये मुख्य रूप से दो राज्यों में काम करती है। छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में…!
तो अब सवाल सीधे सरकार से है कि जब 20 साल पहले आपने इन गरीबों से नौकरी वादा किया था तो क्यों अभी तक नहीं दी गई। नौकरी देना तो छोड़िए ऊपर से उनकी और जमीन कब्जाना चाहते हो। लानत हैं ऐसी सरकार पर जो अपने ही प्रजा का खून चूसे…!


