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आज के अखबार : सरकार का समर्थन करने के लिए अपनी अब तक की सबसे शर्मनाक भूमिका में

संजय कुमार सिंह

हिन्दी अखबारों में आज देशबन्धु की लीड महिला आरक्षण और परिसीमन पर है। लेकिन अखबार ने इस खबर में दूसरे पक्ष को भी समान महत्व दिया है। फ्लैग शीर्षक है, महिला आरक्षण और परिसीमन पर सत्ता पक्ष, विपक्ष आमने-सामने। एक तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अचानक महिला आरक्षण को भुनाने के लिए दलील दे रहे हैं और इस क्रम में विरोधियों को डरा रहे हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता गौरव गोगोई का बयान है। उन्होंने कहा है, आरक्षण के नाम पर परिसीमन कर रही है सरकार। यही नहीं, उन्होंने यह भी कहा है और किसी अन्य अखबार ने इसे इतना महत्व नहीं दिया है, महिला आरक्षण को सुरक्षा कवच बनाकर सरकार राजनीतिक मंशा पूरी कर रही है। नवोदय टाइम्स में छह कॉलम के लीड का शीर्षक है, “आरक्षण से किसी राज्य से अन्याय नहीं : पीएम”।  अमर उजाला में सात कॉलम की लीड का शीर्षक है, “परिसीमन में किसी के भी साथ भेदभाव नहीं होगा…. महिला आरक्षण को राजनीति के तराजू में मत तौलिए, यह राष्ट्रहित का निर्णय : मोदी”। मैं नहीं जानता कि इसमें राष्ट्रहित कहां है और एसआईआर के जरिए पैसे खर्च करके वोटर घटाने के बाद चुने जाने वालों की संख्या बढ़ाकर राष्ट्रहित का ख्याल कैसे रखा जाएगा। यही नहीं, महिला आरक्षण का श्रेय लेने के लिए प्रधानमंत्री ने महिलाओं की ओर से जो कहा है वह भी सर्वथा अनुचित है। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि महिला हितों के संदर्भ में महिला पहलवानों की शिकायत पर उन्होंने कुछ नहीं किया (या जो किया) और मुख्य आरोपी पूर्व भाजपा सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह का पूरा बचाव किया गया। कल शिवसेना सांसद अरविंद सावंत ने पूर्व केंद्रीय मंत्री ब्रजभूषण शरण सिंह का नाम लिया तो भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने आदित्य ठाकरे का मुद्दा उठा दिया। वे केंद्रीय मंत्री या सांसद नहीं रहे, अभी तो नहीं ही हैं और जब नाम लिया गया तो भी संसद में नहीं थे। फिर भी निशिकांत दुबे ने तथाकथित ‘पलटवार’ किया। कहने की जरूरत नहीं है कि यह पलटवार किसी भी तरह से जायज नहीं था और मुद्दे को घुमाने के लिए कुछ भी बोल देने का उदाहरण हो सकता है। वरना संसद के बाहर सुब्रमण्यम स्वामी ने जो कहा है उसपर पलटवार नहीं किया गया है। महिलाओं से संबंधित एक-दो मामले नहीं हैं। मधु पूर्णिमा किश्वर ने तो कई आरोप लगाए हैं। वैसे भी ब्रजभूषण सिंह और आदित्य ठाकरे के मामले बिल्कुल अलग हैं।

जनसत्ता की लीड का फ्लैग शीर्षक है, लोकसभा में महिला आरक्षण, परिसीमन पर चर्चा में विपक्ष से प्रधानमंत्री मोदी ने कहा। मुख्य शीर्षक है, विधेयक पारित करें, वर्ना देश की नारी शक्ति कभी माफ नहीं करेगी। दैनिक हिन्दुस्तान में फ्लैग शीर्षक आठ कॉलम में है। इसके नीचे छह कॉलम में प्रधानमंत्री का वादा है,   “परिसीमन पर पक्षपात नहीं : मोदी”। इसके साथ दो कॉलम में शीर्षक, “संघीय ढांचे को कमजोर कर रही है सरकार : गोगोई”। इसके नीचे अखिलेश यादव की मांग है, मुस्लिम महिलाओं को बी आरक्षण मिले। कहा जा सकता है कि इस प्रस्तुति में संसद में जो हुआ उसे निष्पक्ष तरीके से बताने की कोशिश की गई है। दैनिक भास्कर की प्रस्तुति और अच्छी है। मुझे लगता है कि सरकार का दबाव बहाना है। देश की मीडिया के बारे में इमरजेंसी में भी कहा गया था, झुकने के लिए कहा गया तो रेंगने लगे।

इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज देश के राजनीतिज्ञों तथा जनप्रतिनिधियों को प्रधानमंत्री की धमकी का खुला और सीधा प्रचार किया है। लीड का शीर्षक है, “प्रधानमंत्री ने संसद में कहा : विधेयक पास कीजिए वरना भारत की महिलाएं माफ नहीं करेंगी”। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक प्रधानमंत्री की उसी भाषा में है जिसका प्रयोग वे रैलियों में करते रहते हैं। हिन्दी में यह कुछ इस तरह से होगा, (महिला) आरक्षण का विरोध करने वालों को महिलाएं चुनाव में नहीं बख्शेंगी: प्रधानमंत्री। कृपया इस बात का ध्यान रखें कि अगर उन्होंने हिन्दी में कहा हो तो टाइम्स ऑफ इंडिया के अंग्रेजी शीर्षक के इस अनुवाद के शब्द अलग हो सकते हैं। अभी मुद्दा यह है कि भले ही प्रधानमंत्री या संघ परिवार की राजनीति के तहत ऐसा कहा गया हो, देश का दुर्भाग्य है कि संसद में यह बात किसी महिला सांसद ने नहीं कही, महिला सांसद से नहीं कहलवाया गया या कोई ऐसी महिला नहीं है जो सरकार या प्रधानमंत्री की तरफ से यह बात कह पाती या प्रधानमंत्री को यह बात खुद कहनी पड़ी। वह भी तब जब कांग्रेस ने कहा कि सरकार का इरादा शरारतपूर्ण है, विधेयकों को खारिज किया जाना चाहिए। संसद में इस विषय पर लगभग ऐसी ही बात प्रियंका गांधी ने भी कही है और संसद में इंडिया समूह के नेताओं की बैठक हुई तथा दि एशियन एज में छपी खबर के अनुसार कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है, हम संघर्ष करेंगे। जाहिर है, ऐसे में प्रधानमंत्री ने जो कहा वह सांसदों को चुनावी डर दिखाने के लिए है। इसमें वोट चोरी के आरोप, भाजपा के उम्मीदवारों की जीत, जिन्हें टिकट दिए जाते रहे हैं आदि भी मुद्दा है।

द टेलीग्राफ की लीड बंगाल चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश की खबर है लेकिन सेकेंड लीड मोदी जी की चेतावनी है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, संसद में महिलाओं के आरक्षण पर विपक्ष को मोदी की चेतावनी। जाहिर है, प्रधानमंत्री ने कहा है तो खबर है और नहीं छापना भी उचित नहीं है लेकिन शरारत को गंभीर खबर की तरह छापना किसी भी तरह से उचित नहीं हो सकता है। द टेलीग्राफ का शीर्षक गौर करने लायक है खासकर ऊपर बताए गए दो शीर्षकों की तुलना में। कहने की जरूरत नहीं है कि यह संपादकीय स्वतंत्रता और विवेक का मामला है। जनसत्ता में नौकरी करते हुए मैंने महसूस किया कि मेरा विवेक या मेरी स्वतंत्रता अखबार की नीति मानी जा सकती थी लेकिन जनसत्ता में मैं जब तक रहा, ज्यादातर समय अखबार की नीति यही थी कि संपादक (जो खबर या अखबार बनाता है) उसे पूरी स्वतंत्रता होती थी और इसलिए हम अखबार देखकर समझ जाते थे कि किसने बनाया होगा। अब अखबारों में शायद भिन्न सोच या विचार के लोग नहीं होते हैं या एक ही व्यक्ति का विचार लागू होता है। इसीलिए कई अखबार रोज एक जैसे ही रहते हैं। आज दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने महिला आरक्षण पर एकता की अपील की और उचित परिसीमन का वादा किया। द हिन्दू ने इसी बात को शीर्षक बनाया है, प्रधानमंत्री और अमित शाह ने कहा, दक्षिण में सीटों की संख्या कम नहीं होगी।

संसद में सीटें बढ़ाने और परिसीमन की प्रस्तावित प्रक्रिया ने राजनीतिक संतुलन को लेकर बहस तेज कर दी है। यह केवल निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण का तकनीकी मामला नहीं है, बल्कि आने वाले दशकों में सत्ता के भूगोल को तय करने वाला निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। इसीलिए कोई जरूरत नहीं दिखने या मांग नहीं होने पर भी सरकार न सिर्फ सक्रिय है इस मामले में अचानक सक्रिय हो गई है। परिसीमन का मूल उद्देश्य “एक व्यक्ति, एक वोट, एक समान प्रतिनिधित्व” के सिद्धांत को लागू करना है। भारत में आखिरी व्यापक परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर हुआ था। इसके बाद 1976 में सीटों की संख्या को स्थिर कर दिया गया, ताकि जो राज्य जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे, उन्हें नुकसान न उठाना पड़े। यह रोक 2026 तक लागू है। अब, जनसंख्या में भारी वृद्धि और क्षेत्रीय असमानताओं को देखते हुए, परिसीमन की आवश्यकता समझी गई है। इसी संदर्भ में संसद की सीटें बढ़ाने की बात भी चल रही है। 1971 के मुकाबले भारत की जनसंख्या कई गुना बढ़ चुकी है, लेकिन लोकसभा में सीटों की संख्या 543 ही बनी हुई है। इससे एक सांसद पर प्रतिनिधित्व का बोझ असंतुलित रूप से बढ़ गया है। नई संसद भवन का निर्माण भी भविष्य में अधिक सांसदों को समायोजित करने की दृष्टि से किया गया है। इस पूरी प्रक्रिया का सबसे विवादास्पद पहलू क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा है। यदि परिसीमन मौजूदा जनसंख्या के आधार पर होता है, तो उत्तर भारत के राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश को अधिक सीटें मिलेंगी, क्योंकि वहां जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है। इसके विपरीत, दक्षिण भारत के राज्यों—जैसे तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश—जहां जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित रही है, की कुल हिस्सेदारी घट सकती है। यह तकनीकी रूप से सीटों की “कटौती” नहीं होगी, बल्कि कुल सीटों में उनका प्रतिशत कम हो जाएगा, लेकिन राजनीतिक प्रभाव के लिहाज से यह बदलाव अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

यहीं से दक्षिणी राज्यों की चिंताएं शुरू होती हैं। उनका तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की, आर्थिक योगदान भी अपेक्षाकृत अधिक है, फिर भी राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना एक प्रकार की “डबल पेनल्टी” है। यह असंतोष केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक राजनीति में भी परिलक्षित हो सकता है। इससे उत्तर बनाम दक्षिण का विमर्श और तीखा हो सकता है। इस बहस का एक महत्वपूर्ण आयाम 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम से भी जुड़ता है। इस कानून के तहत लोकसभा और विधानसभा में 33% महिला आरक्षण का प्रावधान किया गया, लेकिन इसे जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करने की शर्त रखी गई। उस समय विपक्ष ने मांग की थी कि आरक्षण तुरंत लागू किया जाए और इसके साथ जाति जनगणना कर ओबीसी महिलाओं के लिए अलग कोटा सुनिश्चित किया जाए। लेकिन सरकार का रुख स्पष्ट था कि यह प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से ही लागू होगी। यही बिंदु आज की बहस का केंद्र बन गया है। महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का मतलब यह है कि प्रतिनिधित्व का नया ढांचा—चाहे वह लैंगिक हो या क्षेत्रीय—एक साथ पुनर्गठित होगा। इसीलिए परिसीमन अब केवल प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक पुनर्संतुलन का माध्यम बन गया है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह बदलाव सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए लाभप्रद माना जा रहा है। सरकार की ओर से यह आश्वासन दिया गया है कि परिसीमन प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होगी तथा किसी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र (चुनाव आयोग जैसा) निकाय होता है, जिसकी सिफारिशें बाध्यकारी होती हैं। फिर भी, विवाद का मूल यह है कि गणितीय रूप से निष्पक्ष दिखने वाला फार्मूला भी राजनीतिक रूप से असंतुलित परिणाम दे सकता है—विशेषकर तब, जब क्षेत्रीय विकास और जनसंख्या वृद्धि में व्यापक असमानताएं मौजूद हों।  

यही नहीं, नरेन्द्र मोदी महिला आरक्षण की बात कर रहे हैं जबकि उनपर एपस्टीन फाइल में शामिल होने और सुब्रमण्यम स्वामी के आरोप है। हरदीप पुरी से जुड़ा मामला अभी तक साफ नहीं हुआ है। ‘भक्त’ बताई जाने वाली महिला खुलकर नरेन्द्र मोदी का विरोध कर रही हैं और कहा है कि महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ने से ज्यादा ‘महिलाओं की भलाई’ की जा सकेगी। दूसरी ओर तथ्य यह है कि उत्तर भारत के प्रमुख हिन्दी भाषी राज्यों में पंचायतों/स्थानीय निकायों में महिला आरक्षण लागू है। इसके तहत पंचायत/वार्ड/जिला परिषद की कुछ सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाती हैं। अगली बार चुनाव में ये सीटें बदल जाती हैं। नतीजतन लाखों महिलाएं पहली बार राजनीति में आईं। कई जगह महिलाएं स्वतंत्र निर्णय लेने वाली नेता बनीं। शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, पोषण जैसे मुद्दों पर ज्यादा ध्यान गया। लेकिन कई मामलों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधि के स्थान पर उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य असली निर्णय लेते हैं। “सरपंच पति” जैसे नामों से इन्हें सामाजिक मान्यता मिली हुई है जबकि यह कोई कानूनी पद नहीं है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, लोकसभा का उचित विस्तार होगा; विपक्ष इसे लिखित में चाहता है। इससे पता चलता है कि सरकार की बातों पर विपक्ष को भरोसा नहीं है। यह स्थिति भी अच्छी नहीं है लेकिन मुझे तो लगता है कि विस्तार की जरूरत ही क्यों है। अभी अगर एक सांसद ज्यादा लोगों का प्रतिनिधित्व करता है तो इससे किसी को दिक्कत होने की शिकायत या नागरिकों की ऐसी कोई मांग नहीं है। मतदाता सूची से लाखों नाम वैसे ही हटाए जा रहे हैं। इसके अलावा, प्रतिनिधि बढ़ने से जनता को कौन सा लाभ होना है। वैसे भी जब लोगों के मतदान के अधिकार में ही कटौती हो गई तो ज्यादा लोगों को चुनकर क्या करना है? काम तो वही होना है जो सरकार चाहेगी या करेगी। पिछले 10-12 वर्षों से सरकार जिसे चाहती है उसे सांसद बनाती रही है। इनमें जज से लेकर खारिज किए जा चुके सरकारी वकील सब शामिल हैं। और तो और इस सरकार ने मनोनीत सांसद को पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ाया, विरोध होने पर इस्तीफा हुआ और हार जाने पर फिर मनोनयन हो गया, उसी बाकी अवधि के लिए। ऐसे में सांसदों के चुनाव और काम का कितना सम्मान है उसकी चर्चा करने की जरूरत नहीं है। फिर भी प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात हो रही है तो जनता के लिए नहीं, अपने लिए या अपनी सरकार के लिए।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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