त्रिभुवन-
पत्रकार सत्यम वर्मा की गिरफ्तारी प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल है। उनकी गिरफ्तारी केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी नहीं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पत्रकारिता के अधिकार और लोकतांत्रिक असहमति की जगह पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। किसी पत्रकार को उसके काम, सवालों, रिपोर्टिंग या सत्ता से असुविधाजनक प्रश्न पूछने के कारण हिरासत में लिया जाना लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है। पत्रकारिता का मूल धर्म सत्ता से सवाल करना है, न कि सत्ता के भय में चुप हो जाना।
यदि सत्यम वर्मा ने कोई रिपोर्ट लिखी, कोई तथ्य उठाया, किसी प्रभावशाली व्यक्ति या संस्था पर प्रश्न किया तो उसका उत्तर तथ्य, दस्तावेज़ और कानूनी प्रतिवाद से दिया जाना चाहिए था, गिरफ्तारी से नहीं। गिरफ्तारी अंतिम उपाय होनी चाहिए, पहला हथियार नहीं। लोकतंत्र में पत्रकार को अपराधी की तरह पेश करना समाज को यह संदेश देता है कि सच बोलना जोखिम है और सवाल करना अपराध।
यह भी समझना होगा कि पत्रकार की स्वतंत्रता केवल पत्रकार की निजी स्वतंत्रता नहीं होती; वह जनता के जानने के अधिकार से जुड़ी होती है। जब एक पत्रकार को दबाया जाता है तो दरअसल नागरिकों की आँखों पर पट्टी बाँधने की कोशिश होती है। इसलिए सत्यम वर्मा की तत्काल रिहाई आवश्यक है। यदि कोई आरोप है तो पारदर्शी जांच हो, विधिसम्मत प्रक्रिया चले, लेकिन गिरफ्तारी, दबाव और भय का वातावरण स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सरकार और प्रशासन को यह याद रखना चाहिए कि मजबूत लोकतंत्र वही है जो आलोचना सह सके। जो सत्ता सवालों से डरती है, वह अपनी नैतिक शक्ति खो देती है। पत्रकारों को डराकर व्यवस्था कुछ समय के लिए चुप्पी खरीद सकती है, लेकिन विश्वास नहीं।
सत्यम वर्मा को तत्काल रिहा किया जाना चाहिए। उनके साथ न्याय होना चाहिए। और इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी समीक्षा होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि भारत में पत्रकारिता अपराध नहीं, लोकतंत्र की अनिवार्य सेवा है।
मुझे वे दिन याद हैं, जब आज के सत्ताधारी दलों के साथ खुलकर आ रहे हमारे बहुत से मीडिया के साथी किसी अन्य दल के शासन के समय पुलिस के अत्याचारों पर बहुत गुस्सा जाते थे और रिपोर्टिंग करते-करते अचानक पुलिस के आला अफसरों से भिड़ जाते थे। लेकिन आजकल वे सब चुप हैं। पत्रकार सत्यम वर्मा कोई अपराधी नहीं हैं। वे एक अच्छे, गंभीर और सुलझे हुए पत्रकार हैं। उनकी रिहाई अविलंब होनी चाहिए।
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