अभिषेक मेहरोत्रा-
करियर के शुरुआती दौर में मैंने और सौरभ ने साथ-साथ नवभारत टाइम्स में काम किया। वो प्रिंट में थे और मैं डिजिटल में। संयोगवश मेरी और उनकी सीट अगल-बगल ही थी। सौरभ आईआईएमसी और जेएनयू का एक डेडली प्रडक्ट है, जो ऊर्जा, नवाचार और साहस से परिपूर्ण है।
प्रारम्भिक तौर पर ही सौरभ एस्ट्रोवर्ट रहे हैं इसलिए वे हमेशा अपने बॉसेज के ब्लू आईड बॉय बने। लल्लनटॉप ने उन्हें ‘द सौरभ’ बनाया और इसका पूरा क्रेडिट सौरभ की मेहनत और केपी मैम का उन पर अटूट ट्रस्ट को जाता है।
यूट्यूब के जरिए पत्रकारिता को एक नया नजरिया सौरभ ने दिया। किताबों की दुनिया को लेकर उनके प्रयोग बेहद सफल रहे। कई विषयों पर उनसे भिन्नता भी है, पर एक साथी के तौर पर उनकी शख्सियत काबिल-ए-तारीफ है।
गुंजन जी का साथ उनको जीवन के एक सोपान पर ले गया है तो उनके द्वारा चयनित उनकी टीम के डेडिकेशन ने उनको आज उस मुकाम पर पहुंचाया जहां बिरले ही पहुंचते हैं। आगामी जीवन के लिए उनके शुभकामनाएं। आज गूगल ट्रेंड में उनका आना उनके लिए ‘फेदर इन अ कैप’ है।
आशीष नौटियाल-
सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप को बनाया, पैदा किया और निकल लिए कुछ और सृजन करने। वो अपने सर से बाल पटककर फेंक मारे तो 5-7 और लल्लनटॉप पैदा हो जाएँगे। छींक भी देगा तो सौ-पचास इन्फ़्लुएंसर निकल आएँगे। जिस आदमी में हुनर होता है वो फ़ैसले लेने से नहीं घबराता। शायद रवीश कुमार के बाद इस किस्म की लोकप्रियता हासिल करने वाले हिंदी के दूसरे पत्रकार बन गए।
आज के समय में जब हर कोई इंफ्लुएंसर है और सिर्फ़ इस बात पर केंद्रित हैं कि जैसे-तैसे कहीं से बस पैसा आता रहे, तब सड़कों पर हुजूम इकट्ठा करवा लेने का आकर्षण सौरभ जैसा शायद ही अब किसी नए समय के इंगेजमेंट फार्मर में हो। मैं रवीश या सौरभ के किए धरे की तो बात ही नहीं कर रहा हूँ। उन्होंने युवाओं की विश्वसनीयता हासिल तो की। बुद्धि थी तो उसका दोहन किया, रवीश कुमार मगर TV से उतरते ही ख़त्म हो गए। पैसा कमा रहे होंगे मगर अब वो विश्वसनीयता नहीं रही जिसके लिए उन्हें मोदी-घृणा से पहले लोकप्रियता मिली।
सौरभ द्विवेदी ने अंग्रेजीदां किस्म लोगों के बीच बहस बनने का साहस किया। जब हर कोई नकारना चाहता था तब वो बड़े बनते चले गए। जिन्हें उन्होंने तैयार किया वो अपने अपने जॉनर में और भी बड़े होते चले गए। एक लीडर की यही भूमिका होती है।
गोविंद राम-
संस्थापक सदस्यों में से एक सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप छोड़ दिया! समझ नहीं आया क्यों? क्या ऐसी वजह रही होगी? अगले कुछ दिनों में पता चल जाएगा! हिंदी में लंबे लंबे इंटरव्यू लेना इनकी खासियत रही! इनकी सादगी और शांत स्वभाव आकर्षित करता है!
ज़्यादा अंदर की तो पता नहीं लेकिन मुझे काफी सुलझे हुए मानुष लगे! शुरू में तो मैं इन्हें लल्लनटॉप का मालिक समझता था! बहुत बाद में पता चला कि ये इंडिया टुडे का हिस्सा है!
फ़िलहाल ऐसा लग रहा है जैसे लल्लनटॉप से लल्लन निकल गया बस टॉप बचा है! क्योंकि लल्लनटॉप की यही पहचान थे! अब शायद अपना निजी चैनल या पॉडकास्ट खोलेंगे!
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