शैलेश गिरी-
“आज तक” मैं किसी आर्टिस्ट को इंटरव्यू के लिए लेकर गया था। वहीं सौरभ द्विवेदी से मुलाक़ात हुई। तब वे अक्सर इंडिया टुडे के लिए फिल्म रिव्यू करने आया करते थे। उसी दौरान उन्होंने बताया कि उन्होंने एक नया प्लेटफॉर्म शुरू किया है — लल्लनटॉप।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “तुम आज तक आते हो, तो छोटा सा इंटरव्यू हमारे लिए भी करवा दिया करो।” शुरुआत आसान नहीं थी। जब मैं कुछ आर्टिस्ट्स से कहता कि आज तक के बाद लल्लनटॉप के लिए भी इंटरव्यू करना है, तो कई लोग हँस देते थे — “ये कैसा नाम है?”
लेकिन सौरभ द्विवेदी ने इस नाम को सिर्फ पहचान नहीं दी, बल्कि उसे ऊँचाइयों तक पहुँचाया। कुछ ही समय में हालात पूरी तरह बदल गए।
वह दौर भी आया जब आर्टिस्ट खुद आगे से कहते थे — “यार, सौरभ से ही इंटरव्यू करवा दो।” यहाँ तक कि कई बार तय समय देने के बावजूद लल्लनटॉप का इंटरव्यू इसलिए मना कर दिया जाता था क्योंकि एंकर कोई और होता था, सौरभ नहीं।
सौरभ द्विवेदी का इंटरव्यू एक मिसाल बन गया था। हर चैनल के लिए। लोग उन्हें देखते थे, मज़ा लेते थे, जुड़ाव महसूस करते थे। उनके सवालों में जिज्ञासा थी, बातचीत में सहजता और प्रस्तुति में ईमानदारी। यही वजह थी कि सौरभ का किया हुआ हर इंटरव्यू दर्शकों को बेहद पसंद आता था।
आज जब मैं “आज तक” पहुँचा, तो रास्ते में ही पता चला कि लल्लनटॉप में सौरभ का आज आख़िरी दिन है। अजीब सी तकलीफ़ हुई। लेकिन फिर लगा — अच्छा ही होगा। कुछ बड़ा ही सोचा होगा। कहीं और एक नई शुरुआत करेंगे।
एक बात तय है — सौरभ में दम है। वे जहाँ भी जाएंगे, जो भी शुरू करेंगे, उसे ऊँचाइयों तक ज़रूर ले जाएंगे। हम सब उनके साथ थे, आज भी हैं, और आगे भी रहेंगे।
सौरभ द्विवेदी और द लल्लन टॉप एक दूसरे के पूरक हो चुके हैं। लल्लन टॉप के नाम पर सौरभ और सौरभ द्विवेदी के नाम पर लल्लन टॉप याद आता है। मैं खुद बहुत दिनों तक लल्लन टॉप को सौरभ का ही मीडिया ब्रांड जानती थी जब वे इंडिया टुडे के संपादक बने तब मुझे पता चला कि लल्लन टॉप भी इंडिया टुडे का है। लेकिन आज सौरभ ने इंडिया टुडे से विदा ले ली है। खबर है कि वे अब खुद का मीडिया ब्रांड शुरू करेंगे। एक साहसी और दिलचस्प इंसान के साथ पत्रकारिता और एंकरिंग में उन्होंने एक अलग मिसाल कायम की है। उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए शुभकामनाएं – रश्मि त्रिपाठी
रजत सेन-
मैं हमेशा से ये सोचता था कि वो दिन कैसा होगा, जब सौरभ लल्लनटॉप से जाने का फ़ैसला लेंगे. या कहें, एक डर था जो हमेशा बैक ऑफ़ द माइंड बना रहता था. शायद उम्र के साथ अपनों के बिछड़ने का एक लगातार डर सब महसूस करते हैं. उसी डर से निपटने की तैयारी भी चलती रहती है, लेकिन ऐसी तैयारी कभी पूरी कहां होती है!
उन्हीं दिनों में एक शाम आई. जून 2024. Guest In The Newsroom का 100वां एपिसोड, महमान नाना पाटेकर. सेट खास तौर पर उनके लिए डिज़ाइन किया गया. अब तक आए सभी गेस्ट्स की तस्वीरें दीवारों पर थीं. सीट्स हटाकर जगह खाली करवाई गई थी ताकि ज़्यादा लोग शो लाइव देख सकें.
शूट से कुछ घंटे पहले सौरभ को रिसर्च मिली. वो हमेशा की तरह टहलते हुए पन्नों में डूबे थे. न्यूज़रूम खचाखच भरा था, 70–80 लोग. तभी वो आकर कुर्सी पर बैठे और रिसर्च पलटने लगे. मैं कैमरों के फ्रेम लॉक कर रहा था और वहीं खड़ा हो गया, जहाँ से वो फोटो ली गई. व्यूफ़ाइंडर में देखा, शटर दबाया. कुछ पल बस उसी फोटो को देखता रहा. फोटो कम, पेंटिंग ज़्यादा लग रही थी.

उस एक फ्रेम में सब कुछ था. एक दशक की मेहनत, आइडियेशन, लगन और नज़र. और सबसे ख़ास ये कि लल्लनटॉप पर आए तमाम गेस्ट्स उस फ्रेम में सौरभ की तरफ देख रहे थे, जबकि सौरभ अपने ही संसार में मग्न थे. फ्रेम के भीतर अजीब सी शांति थी, जबकि बाहर शोर और भीड़.
एक बात और. सौरभ कभी उस तरफ की कुर्सी पर नहीं बैठते थे. वो हमेशा गेस्ट की होती थी. उस दिन सौरभ वहीं बैठे थे. दिमाग़ में आया, शायद अब टेबल्स स्विच होने का वक्त है.
मुझे लगा, शायद उनका आख़िरी दिन भी ऐसा ही होगा. रंग, लोग, निहारती नज़रें. लेकिन उनके चारों तरफ़ सुकून की शांति. एक पूरी दुनिया बसाकर अगली पीढ़ी को सौंपने की तसल्ली.
मैं सौरभ को 15 साल से जानता हूं. बीते 10 साल दिन-रात साथ काम किया. कोई कहता, “सौरभ क्या बंदा है,” तो मैं कहता, वो जादूगर है. छड़ी उठाता है और माहौल बदल देता है. ब्लैक एंड व्हाइट में रंग भर देता है.
आज वो तारीख़ आ गई. 5 जनवरी 2026. जादूगर जा रहा है. लेकिन किसी संस्थान को छोड़ देना क्या सच में विदाई होती है? मुझे नहीं लगता. जहां-जहां लल्लनटॉप होगा, सौरभ भी होगा. जोश, जज़्बा और जादू बरकरार रहे.
अमित गर्ग शुक्ला-
लल्लनटॉप को अलविदा कहने के बाद सौरभ द्विवेदी के मन में क्या चल रहा होगा, नहीं मालूम मुझे। ये भी नहीं मालूम कि लल्लनटॉप में उनके साथ काम करने वालों को कैसा लगा होगा जब सौरभ ने बताया होगा, बस यहीं तक था मेरा आपका साथ। हां लेकिन मुझे कैसा लगा जब मैंने ये सुना वो बताता हूं।
अच्छा नहीं लगा सुनकर। पता नहीं क्यों, बस अच्छा सा नहीं लगा मन को। व्यक्तिगत सौरभ से नहीं मिला कभी मैं। व्यक्ति के रूप में बहुत ज़्यादा जानता भी नहीं मैं उन्हें। हां लेकिन मेरे लिए लल्लनटॉप की पर्यायवाची थे सौरभ। या यूं कहिए कि सौरभ ही लल्लनटॉप थे मेरे लिए।
बीते एक दशक से लल्लनटॉप पर देखता सुनता आया हूं उन्हें। एक पत्रकार के तौर पर हमेशा प्रभावी लगा उनका व्यक्तित्व। सौरभ ने ठहरकर सुनना सिखाया। और ये भी कि अच्छा लिखने के लिए अच्छा पढ़ना ज़रूरी है। सरल बोलने के लिए शब्दकोश ज़रूरी है। ज्ञान के लिए किताबों से प्रेम ज़रूरी है। लोगों को जानने के लिए लोगों को सुनना ज़रूरी है।
किसी और का आधे घंटे का भी इंटरव्यू नहीं देखा जाता था मुझसे। सौरभ का दो ढाई घंटे का इन्टरव्यू भी छोटा लगता है मुझे। सौरभ की भाषा शैली प्रभावित करती है मुझे। हिंदी बोलते हुए उनका आत्मविश्वास, उनका उच्चारण लाजवाब लगता है मुझे। किसी भी विषय पर सौरभ का विश्लेषण, संदर्भ सहित व्याख्या सा लगता है मुझे।
व्यक्तिगत रूप से उनको जानने वालों को मेरी बहुत सी बातें अतिशयोक्ति सी लग सकती हैं। क्योंकि एक दो ऐसे लोग भी मिले हैं मुझे, जिन्होंने बताया कि वीडियोज़ में जैसे दिखते और बोलते हैं वैसे नहीं हैं सौरभ। फर्क नहीं पड़ा मुझे इस बात से कभी। क्योंकि कोई भी भीतर-बाहर, 100 प्रतिशत एक सा नहीं होता। हम पर निर्भर करता है किसी के व्यक्तित्व का कौन सा पहलू देखना, जानना, स्वीकारना है हमें।
आखिरी में बस इतना ही कहूंगा, सौरभ के बिना लल्लनटॉप को देखना वैसा ही होगा जैसे अमिताभ बच्चन के बिना KBC देखना।
विनीत कुमार-
दि लल्लनटॉप से सौरभ द्विवेदी के जाने का मतलबः सौरभ द्विवेदी टीवी टुडे ग्रुप के सबसे चमकीले ब्रांड दि लल्लनटॉप का अब हिस्सा नहीं हैं. द्विवेदी अब इंडिया टुडे हिन्दी के संपादक भी नहीं हैं. सौरभ द्विवेदी अब सिर्फ और सिर्फ सौरभ द्विवेदी है. आज उन्होंने इंडिया टुडे समूह के साथ अपने 12 साल के इस सफ़र को यहीं विराम दे दिया है. अब वो किसी दूसरे काम और प्लेटफॉर्म पर नज़र आएंगे.
मुझे इस ख़बर को लेकर बहुत ज़्यादा हैरानी नहीं हुई. मैं इंडिया टुडे समूह को जितना जानता हूं, उस हिसाब से ये बेहद स्वाभाविक बल्कि अपने पैटर्न के अनुसार ही एक घटना है; संभवतः बड़ी ज़रूर है. इस समूह की सबसे बड़ी बात है कि वो किसी भी हाल में अपने ब्रांड के आगे किसी चेहरे को बड़ा होने नहीं देता. वो तब तक उसे जगह देता है, पुचकारता है और स्पेस देता है, जब तक उसके होने से ब्रांड बड़ा हो. जब वो चेहरा बड़ा होने लग जाय तो समूह इस बात को लेकर बहुत सीरियस हो जाता है. समूह की यह बात उसके शुरुआत से ही जुड़ी है.
आजतक जब शुरु हुआ था कि एस.पी.सिंह घर-घर की आँखों के सितारे हो गए. दर्शकों के लिए आजतक का मतलब एसपी. बाईस मिनट के कैप्सूल कार्यक्रम के बाद बतौर ख़बरिया चैनल पर इस्तेमाल होनेवाला एक-एक शब्द, पंच..एस.पी. गढ़ा हुआ. इंतज़ार कीजिए कल तक, देखते रहिए आजतक से जो सिलसिला शुरु हुआ वो आगे चलकर ख़बरों का सिलसिला जारी रहेगा- देखते रहिए आजतक..गया. एस.पी. नहीं रहे लेकिन चैनल के लिए गढ़े गए उनके मुहावरे, इस्तेमाल किए गए शब्द, अंदाज़ और सबसे ज़्यादा स्क्रीन-उपस्थिति..सबकी सब रह गयी. अब चैनल जल्दी एस.पी का नाम तक नहीं लेता लेकिन उनके शब्द अभी भी चैनल का हिस्सा हैं.
एक समय पुण्य प्रसून वाजपेयी, आशुतोष, दीपक चौरसिया आजतक के जरिए घर-घर पहुंचे और अलग-अलग कारणों से इन्हें लगा कि ये चैनल के चेहरे हैं. समूह ने सबको बाय-बाय किया या फिर ऐसी स्थिति पैदा होती चली गयी कि इन्हें विदा करना ज़्यादा बेहतर लगा. हम दूर बैठे दर्शकों के बीच संदेश गया कि आजतक रहेगा, लोग आते-जाते रहेंगे.
दि लल्लनटॉप की जब शुरुआत हुई तो अच्छे-अच्छे लोगों को पता तक नहीं चला कि ये इंडिया टुडे ग्रुप का नया ब्रांड है. तब हिन्दी ब्लॉगिंग अपने चरम पर था और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर वीडियो कंटेंट की शुरुआत ही हुई थी. जिस तरह सालों के अनुभव के साथ मीडियाकर्मी कुछ प्रयोग करते दिखाई देते, दि लल्लनटॉप को लेकर लोगों के बीच ऐसी ही समझ बनी कि कोई सरोकारी मंच है. तब इसकी माइक मीडियाकर्मी इस तरह पकड़ते कि इंडिया टुडे की छाप तक इस पर न पड़े. देखते-देखते ऐसी चमक और धमक बनी कि उसके आगे आजतक फीका नज़र आने लगा. अपनी अलग भाषा, भदेस किन्तु सतर्क अंदाज़ से दि लल्लनटॉप ने हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजीदां-एलीट दर्शकों के बीच भी अपनी जबरदस्त पकड़ बनायी और यह सब करते हुए दि लल्लनटॉप और सौरभ द्विवेदी एक-दूसरे के पर्याय हो गए.
दि लल्लनटॉप में जो भाषा और मुहावरे सुनाई-दिखाई पड़ते हैं, उन पर द्विवेदी की छाप है. उनके जाने के बाद भी उनकी छाया से ये पूरी तरह मुक्त हो जाएगी, ऐसा हो पाना आसान नहीं है. ऐसे में प्लेटफॉर्म का फ्लेवर ही चला जाएगा.
हंस ने रविकांत और मुझे सोशल मीडिया विशेषांक संपादित करने की जब जिम्मेदारी दी तो इस माध्यम से जुड़े कईयों का हमने इंटरव्यू किया, उस इंटरव्यू में द्विवेदी ने विस्तार से बताया है कि भाषा को लेकर उनकी अपनी क्या समझ रही है और दि लल्लनटॉप के लिए लोगों का चयन करते समय क्या सोच काम कर रही होती है. तब हमारी दि लल्लनटॉप के दफ़्तर में इस संबंध में दो घंटे से ज़्यादा बातचीत हुई. मौक़ा मिला तो वो बातचीत मैं आपसे साझा करूंगा.
फ़िलहाल तो ये कि पिछले बारह साल में द्विवेदी ने दि लल्लनटॉप के जरिए जो काम किया और जिस अंदाज़ में किया, पिछले कुछ सालों से वो ब्रांड से ज़्यादा बड़े नज़र आने लगे. जूते और जुराब की साईज़ अलग-अलग पड़ने लगी. मुझे नहीं पता कि कौन अपनी साईज़ बड़ी मानने लगे लेकिन सच तो यही है कि टीवी टुडे ग्रुप से द्विवेदी जैसे ऐसे आधे दर्जन से भी ज़्यादा चेहरे तब अलग हुए जब वो शोहरत और पहचान के मामले में अपनी चरम पर रहे.
मैं एक दर्शक और मीडिया अध्येता के तौर पर यही महसूस करता हूं कि सौरभ द्विवेदी को देखकर देशभर के सैकड़ों मीडिया छात्रों ने उनकी तरह होना चाहा. उनकी तरह किताब पढ़ने और काम के आगे ख़ुद को पूरी तरह झोंक देने का साहस न कर सके तो हाव-भाव और गर्दन में गमछा-स्टोल झुलाकर ही. उनके अंगरखे और चटख रंगों के कैजुअल्स ने पत्रकारिता को प्रॉप्स जर्नलिज्म की तरफ ले जाने में बड़ी भूमिका निभायी है जो एक समय बाद ख़ुद उन पर हावी होता चला गया. दूसरी तरफ,
उन्होंने तेज़तर्रार लोगों के भीतर एक ख़ास तरह का भरोसा पैदा किया कि प्रतिभा और मेहनत का ज़माना पूरी तरह गया नहीं है. वो ख़ुद को लेकर जितना ऑब्सेस्ड रहे हैं, नयी प्रतिभाओं को लेकर उतने ही उदार भी. बाद में वो प्रतिभाएं हमारी पसंद बने. टीवी और किताबों का विवाद के अलावा कोई रिश्ता नहीं है, इस भ्रम को तोड़कर स्क्रीन पर किताबों की जो थोड़ी-बहुत वापसी हुई, उसमें द्विवेदी की भूमिका रही है..भले ही वो छापे गए अक्षरों के बजाय भौकाल टाइट करने के लिए ही क्यों न हो.
मुझे उम्मीद है कि आज सौरभ द्विवेदी पत्रकारिता की सीढ़ियों से चढ़कर जिस मक़ाम तक पहुंचे हैं, वो सीढ़ियाँ उन्हें पत्रकारिता की दुनिया से इतर नहीं धक्का देगी. कम से कम ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं कि हमें यकीन करने में मुश्किल हो कि किताबों की बात करने वाला ये शख़्स, किताबों से कितनी दूर जाकर खड़ा हो गया! मेरी शुभकामनाएं.



