अनिरुद्ध गुप्ता-
सौरभ द्विवेदी की विदाई जिस भी कारण हुई हो, वैसे अब साफ हो रहा है कि विदाई संस्थान के नियमों को तोड़ कर overreach करने यानी कि मालिक बनने के कारण हुई है।
चैनल मौके की तलाश में था और मुफ्ती और जावेद साहब की Does God exist वाली बहस से उन्हें अच्छा मौका मिला, और उनकी विदाई हुई। इस पर आराम से विश्वास किया जा सकता है क्योंकि ये सब हुआ तो अचानक ही है, तो खुद से छोड़ने का कोई सवाल नहीं है।
ख़ैर सौरभ भैया के लिए कुछ साल और पत्रकारिता और फिल्म लेखन से लेके यूट्यूब तक तमाम ऑप्शन खुले हुए हैं, लोकप्रियता पर्याप्त है, तो जहां जाएंगे रास्ते बन सकते हैं। और बंधना है या और खुलना है, ये देखना दिलचस्प होगा।
लेकिन उनकी मूल समस्या कुछ और है। जिस तरह से वो अपने होमटाउन यानी कि उरई शहर (जिला जालौन) की बातें अपने वीडियोज पर करते रहे हैं, जैसे उसका हाइप बनाना, वहां जाकर वहां के नेताओं से मिलना, और लंबी-लंबी छोड़ना; ये सब क्रिया कलाप करते हैं।
सहज ही ऐसा लगता है कि अपने लिए वो करियर के साथ-साथ एक चुनावी सीट भी तैयार कर रहे हैं।
अच्छा उनके परिवार की चुनावी पृष्ठभूमि भी है, चुनाव तो उनके पिताजी (रविकांत द्विवेदी “चमारी”) ने भी लड़े हैं। जहां तक मेरी जानकारी है, बीजेपी से ही लड़े हैं। (2003 शायद, हारे हैं) और हाल में बीजेपी के पूर्व सांसद भानु प्रताप वर्मा के सांसद प्रतिनिधि भी रहे हैं।
(हालांकि ये बातें आज तक सौरभ भाई ने अपने पोर्टल पर दबे मुख से भी नहीं कही हैं) लेकिन वो सभी चुनाव विधायक स्तर पर ही लड़े हैं, लेकिन सौरभ भैया का स्तर उस से तो बड़ा है। और वैसे भी जब से मैथिली ठाकुर, 25 की उम्र में विधायक बनी हैं, तब से विधायक पद का कद और भी छोटा हो गया है।
50 की उम्र में विधायक बनना और वो भी देश भर में जाने पहचाने चेहरों के लिए रोमांचकारी तो नहीं रहा, एक विधायक से ज्यादा बड़ा कद और उपलब्धि तो सौरभ भैया की अभी ही है।
मतलब अगर भविष्य में वो चुनावी राजनीति में जाएं तो कम से कम लोकसभा की सीट तो मिले। और लोकसभा सीट जीतने के लिए जमीनी जुड़ाव बहुत जरूरी है।
लेकिन समस्या ये है कि जो सीट उनकी अपनी है, जहां उनका पैतृक संसार है, जहां के लोगों में उनके लिए लगाव है। वो सीट “रिजर्व” कोटे की है। मतलब वहां से सांसदी का चुनाव सिर्फ़ दलित ही लड़ सकता है।
ख़ैर सीट तो विधायक की भी रिजर्व ही हैं, जिले में तीन से दो, एक सीट है जो ओपन है, वही एक ऑप्शन है अपने गृह जिले में तो। लेकिन वो बहुत छोटी डील होगी।
फिलहाल तो परिसीमन से भी उम्मीद नहीं है। मुझे लगता है सौरभ भैया फिल्म लाइन में जाएंगे।


