
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों की खबरों में शेख हसीना के प्रत्यपर्ण का मुद्दा महत्वपूर्ण है। टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पन्ने पर आज यह खबर सेकेंड लीड है। खबर के अनुसार, बांग्लादेश के मुख्य विपक्षी दल बीएनपी ने भारत से कहा है कि बांग्लादेश में अपने खिलाफ मुकदमों का सुनवाई के लिए शेख हसीना का भारत से प्रत्यर्पण किया जाये और उन्हें शरण देना लोकतंत्र के खिलाफ है। खबर के अनुसार, बांग्लादेश और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि है और जिन लोगों के खिलाफ अदालत में मामले चल रहे हैं उन्हें सौंप दिया जाना चाहिये। खबर के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेट्री जनरल एंटोनियो गुटरेस ने कहा है कि बांग्लादेश अपने इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है और वह समावेशी व संपन्न लोकतंत्र की दिशा में इसके प्रयासों का भरपूर समर्थन करता है तथा अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा पर जोर देता है। शीर्षक के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने युनूस से कहा है, सभी नागरिकों की रक्षा होनी चाहिये, खासकर अल्पसंख्यकों की। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज यह खबर सेकेंड लीड है जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर इतनी प्रमुखता से नहीं है। आप जानते हैं कि भारत सरकार 1975 के इमरजेंसी को अब याद कर रही है उसे असंवैधानिक बता रही है और तमाम असंवैधानिक तथा अलोकतांत्रिक निर्णय करने के बाद अब विपक्ष के मजबूत होने से मुश्किल में है और ऐसे में बीएनपी का शेख हसीना को संरक्षण देना लोकतंत्र के विरुध कहना मायने रखता है। मुझे लगता है कि केंद्र सरकार के लिए यह एक मुश्किल मामला है इसलिए अखबारों में इसकी चर्चा नहीं है जबकि बंगाल का मामला तृणमूल सरकार को बदनाम करने के लिए उपयोग किया गया। वहां की जनता ने जो किया वह अपनी जगह है। अखबारों ने सिर्फ उसे रिपोर्ट नहीं किया बल्कि अपनी तरफ से पहल की जो दूसरे मामलों में नहीं होती है या कम से कम दिखती तो नहीं है।
इसके अलावा आज के अखबारों में डॉक्टर की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट के बनाये टास्क फोर्स की खबर भी महत्वपूर्ण है। हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगले बलात्कार का इंतजार नहीं कर सकते हैं। द टेलीग्राफ ने अपने शीर्षक से बताया है कि सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर में देरी और प्रिंसिपल को बढ़िया पद देने के लिए बंगाल की खिंचाई की। फ्लैग शीर्षक में अखबार ने लिखा है, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं, अदालत ने चेतावनी दी और चिकित्सकों की सुरक्षा के लिए टास्कफोर्स बनाया गया। टेलीग्राफ ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही की की खास बातों को भी बिन्दुवार छापा है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि राज्य की शक्ति शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर न लगाई जाये। आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों बाद किसी मामले में स्वतः संज्ञान लिया था और संभव है यह आईएमए के आंदोलन के कारण लिया गया हो।
अमर उजाला की खबर के अनुसार, डॉक्टरों ने काम पर लौटने की अपील ठुकराई, कहा – अभी नहीं तो कभी नहीं। अखबार में यह खबर तीन कॉलम के विज्ञापन से बचे पांच कॉलम में लीड है और दो लाइन का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – जो हुआ वह भयावह… एक और दुष्कर्म का इंतजार नहीं कर सकते। उपशीर्षक है, कोर्ट का सख्त रुख…. सुरक्षा के लिए सुझाव देने को टास्क फोर्स का गठन। अखबार में एक फोटो भी छपी है जिसका कैप्शन है, जूनियर डॉक्टर से दुष्कर्म-हत्या के विरोध में देशभर में डॉक्टरों का विरोध प्रदर्शन जारी है। कानपुर में मंगलवार को प्रदर्शन करते जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर। नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है। चार कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, डॉक्टरों की सुरक्षा पर बनाई नेशनल टास्क फोर्स। उपशीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – तीन सप्ताह में अंतरिम रिपोर्ट दे 10 सदस्यीय कार्यबल। कहने की जरूरत नहीं है कि आज के अखबारों में इस खबर का जो हिस्सा सबसे ज्यादा प्रचारित किया गया है वह है, बंगाल सरकार को कड़ी फटकार जबकि मामला चिकित्सकों की सुरक्षा का ज्यादा है। यह सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने एक चर्चित मामले पर स्वतः संज्ञान लिया और उससे संबंधित जो खबर आज अखबारों में छपी है उसकी चर्चा ऊपर की गई है।
साथ ही आज के अखबारों में अदालत औऱ कानून से संबंधित कई अन्य खबरें हैं। इनमें प्रमुख है 30 साल के एक युवक के इलाज के खर्चे नहीं उठा पाने वाले परिवार की उसके लिए सुखमृत्यु की अपील को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किया जाना और सरकार से पूछना कि कोई संस्था उसकी देखभाल कर सकती है। आज एक खबर अजमेर के बलात्कार और ब्लैकमेल मामले में पॉस्को कोर्ट द्वारा छह लोगों को उम्र कैद की सजा दिया जाना भी है। यह 1992 की खबर है और आज एक खबर यह भी है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री की न्यायिक हिरासत 27 अगस्त तक बढ़ा दी गई है। यही नहीं, एक मामला आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह का भी है। दो दशक पुराने एक मामले में हाजिर नहीं होने को गंभीरता से लेते हुए सुलतानपुर की अदालत ने पुलिस को आदेश दिया है कि उन्हें गिरफ्तार कर 28 अगस्त को पेश किया जाये। हाल में खबर थी कि पूर्व गृहराज्य मंत्री चिन्मयानंद के खिलाफ बलात्कार और यौन शोषण के मामले वापस लिये जायेंगे।
खबरों के अनुसार, 2018 में, यूपी सरकार ने चिन्मयानंद के खिलाफ मामला वापस लेने का फैसला किया और सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में याचिका दायर की, जिसे बलात्कार पीड़िता के “आपत्ति” दर्ज करने के बाद सीजेएम ने खारिज कर दिया। इस मामले में मुकदमा 2022 में शुरू हुआ। पर पीड़िता ने अर्जी दी कि मामले को वापस ले लिया जाये तो उसे कोई एतराज नहीं है। विशेष अतिरिक्त जिला और सत्र न्यायाधीश अहसान हुसैन ने उन्हें यह कहते हुए बरी कर दिया कि चिन्मयानंद के खिलाफ सबूतों की कमी थी, इसके अलावा शिकायतकर्ता भी मुकर गई और उसके पक्ष में बयान दिया जिसके कारण उसे बरी कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने जजों से कहा है कि वे मामलों का फैसला कानून और तथ्यों के आधार पर करें। कोलकाता हाईकोर्ट की एक टिप्पणी को दृढ़ता से नामंजूर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जजों से अपील की कि वे मामलों का फैसला कानून और तथ्यों के आधार पर करें। हाईकोर्ट ने किशोरियों को यह सलाह भी दी थी कि दो मिनट की खुशी के लिए समर्पण करने की जगह वे अपनी यौन इच्छाओं को नियंत्रित करें। सर्वोच्च अदालत ने इस टिप्पणी को भी अस्वीकार किया है।

कोलकाता बलात्कार और हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने के बाद जो सब हुआ उसे बताने के साथ यह भी बताना जरूरी है कि कल ही (20 अगस्त 2024 को) नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर एक साथ छपी दो खबरों के शीर्षक इस प्रकार थे, अस्पताल में डॉक्टर ने दलित नर्स से रेप किया। यह उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा थाना क्षेत्र के एक निजी अस्पताल का मामला है और पीड़िता दलित है। उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ अत्याचार के ढेरों मामले हैं और हाथरस के एक मामले का हाल आप कल यहां पढ़ चुके हैं जो टेलीग्राफ में छपी सिंगल कॉलम की खबर के आधार पर था। नवोदय टाइम्स में कल ही छपी दूसरी खबर का शीर्षक है, पीजीआईएमएस से छात्रा को अगवा कर मारपीट।
इस मामले में एक डॉक्टर पर डेंटल की छात्रा ने मारपीट का आरोप लगाया है। डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया है। पीड़िता का आरोप है कि डॉक्टर उससे शादी करना चाहता है और उसपर दबाव बना रहा है। 16 अगस्त को उसे अगवा कर लिया गया था। मुझे लगता है कि डबल इंजन वाले दोनों राज्यों की ये खबरें कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। डॉक्टर, दलित, नर्स, अस्पताल, चिकित्सक और डेंटल छात्रा के साथ शादी के लिए दबाव बनाने से जुड़ी हैं इसलिए इसपर कलकत्ता जैसा आंदोलन नहीं होना यहां के समाज (और शायद प्रशासन की भी) स्थिति बताती हैं और ज्यादा चिन्ता पैदा करती हैं। मेरा मानना है कि भाजपाई पत्रकारों और प्रचारकों के दबाव में यह सब हुआ है वरना स्वतः संज्ञान के लिए और भी बहुत सारे मुद्दे थे बशर्ते उनके बारे में खबरें इसी तरह छपतीं।
हालांकि, आज द हिन्दू में पहले पन्ने पर पांच कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, महाराष्ट्र (यह भी डबल इंजन वाला राज्य है और सरकार जबरन बनाई गई है) के स्कूल में दो लड़कियों का दो लोगों ने यौन शोषण किया। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह सिंगल कॉलम में है। दूसरे अखबारों में भी यह खबर है पर वैसे नहीं जैसे कोलकाता की खबर छपती रही है। यहां अभिभावकों की शिकायत है कि पुलिस कार्रवाई में देरी हुई। घटना के कई दिनों बाद एफआईआर हुई और उसके अगले दिन पहली गिरफ्तारी हुई। महाराष्ट्र के गृह मंत्री देवेन्द्र फड़नवीस हैं। यह खबर आज मेरे दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता स नहीं है। जहां तक नवोदय टाइम्स की कल की खबरों की बात है, ये मामले भी पर्याप्त गंभीर है और हंगामा पहले हुआ होता तो कोलकाता का मामला अलग होगा। पर अभी वह मुद्दा नहीं है। खबर के लिहाज से कोलकाता का हादसा इसके मुकाबले, जैसा भी था, बंगाल का समाज न्याय मांगने में सक्षम है, मांगता रहा है और मामले की जांच में दूसरे राज्यों तथा सरकारों के नियंत्रण में जो होता रहा है उससे उसमें कोई कमी भी नहीं थी।
फिर भी भाजपा के समर्थकों और पत्रकारों ने उसे मुद्दा बनाया, आईएमए ने पहले की तरह दबाव बनाया और नतीजा यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान लिया। उसके फैसले से आज हेडलाइन मैनेजमेंट भी हुआ है हालांकि अब यह पहले की तरह व्यापक और बेशर्मी से नहीं किया जा रहा है। इसके बावजूद यह तथ्य है कि ये दोनों खबरें कल किसी और अखबार में इस तरह पहले पन्ने पर नहीं थी जबकि 9 अगस्त की कोलकाता की घटना टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं थी तो इसकी आलोचना की गई थी। जबकि उसके बाद से यह खबर रोज पहले पन्ने पर रह रही है और लगातार कई दिनों तक लीड बनी है। इन दों खबरों के अलावा देहरादून में सामूहिक बलात्कार की खबर भी है जिसे कोई याद नहीं कर रहा है और महिला उत्पीड़न की खबर की बात की जाये तो हमेशा महिला पहलवानों का मामला याद किया जायेगा। इसीलिये आज यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड तो छोड़िये, पहले पन्ने पर भी नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया में सरकारी सेवा में लैटरल एंट्री के सरकारी अभियान को रद्द किये जाने की खबर लीड है। शीर्षक में कहा गया है, प्रधानमंत्री चाहते हैं कि इसमें कोटा लागू हो। इसके बावजूद यह इस तरह क्यों प्रकाशित हुआ यह समझने की बात है। कल यहां मैंने लिखा था कि कानून मंत्री ने इसके फायदे बताये थे और अपनी तरफ से यह भी बताने की कोशिश की थी कि सरकार कुछ नया नहीं कर रही है। सरकार के इस कदम का प्रचार सरकार के तमाम समर्थकों और प्रचारकों ने किया था और इस योजना को वापस लेकर सरकार ने अपने प्रचारकों को मुंह छिपाने का समय भी नहीं दिया है। सोशल मीडिया पर वे सब बुरी तरह ट्रोल हो रहे हैं और सरकार ने अगर लैटरल एंट्री के कांग्रेसी उम्मीदवारों के नाम गिनाये तो उनके मुकाबले भाजपाई (राहुल गांधी आरएसएस के कह रहे हैं) लैटरल एंट्री वालों के नाम खुल रहे हैं और उनका काम सामने आ रहा है जो कांग्रेसी लैटरल एंट्री वालों ने नहीं किये थे या इसके लिए नहीं जाने जाते हैं। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव इसके लिए अच्छे से ट्रोल हो रहे हैं। हाल के समय में बड़ी संख्या में रेलगांड़ियों के पटरी से उतरने के कारण उन्हें डीरेलमेंट मंत्री तो कहा ही जा सकता है, लैटरल एंट्री मामले में उन्होंने खुद भी पलटी मारी है।


