उमेश चतुर्वेदी-
दैनिक भास्कर के दिल्ली स्थित राजनीतिक ब्यूरो का कार्यालय रफी मार्ग आईएनएस बिल्डिंग में अब भी है। उस दफ्तर में मेरा दाखिला पिछली सदी के नब्बे के दशक के मध्य में हुआ था.. दैनिक भास्कर आज देश के सबसे बड़े हिंदी अखबारों में शुमार है.. तब उसकी धमक संयुक्त मध्य प्रदेश में थी। राजस्थान में जोरदार दस्तक देकर हिंदी समाचार पत्र प्रकाशन उद्योग को चकित कर चुका था। तब शरद द्विवेदी जी ब्यूरो चीफ हुआ करते थे।
शरद जी सिगरेट के शौकीन थे। ब्यूरो कार्यालय में उनकी केबिन होती थी, जिसमें दो मेज और दो ही कुर्सियां लगी थीं। एक मेज कुर्सी पर कंप्यूटर लगा था, जिस पर संवाददाताओं के हस्तलिखित समाचारों की टाइपिंग होती थी, जिसे नागेंद्र राय पूरा करते थे। आज की पत्रकारों की पीढ़ी मॉडम से अनजान है। तब उस वक्त तक की सबसे तेज तकनीक मॉडम से ही समाचार, ग्राफिक्स आदि भेजे जाते थे। नागेंद्र राय की बगल की मेज-कुर्सी शरद द्विवेदी की थी और उसके ठीक सामने एक छोटा सा सोफा होता था.. जिस पर रोजाना शाम को कुछ लोगों की बैठकी जमती थी।
हिंदी जगत की खबरों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए आईएनएस बिल्डिंग स्थित गैर हिंदी और अंग्रेजी अखबारों के पत्रकारों की आवाजाही लगी रहती थी। शरद जी सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए उन्हें खबरों का एंगल समझाते रहते थे।
शरद जी के सामने के सोफे पर एक बुजुर्ग सज्जन एक-दो दिन बीच लगाकर रोजाना शाम को आते थे। हाथ में एक लिफाफा होता था। एक वही सज्जन थे, जिनके सामने शरद जी परहेज करते, अन्यथा शरद जी पूरे दबंग अंदाज में सामने बैठे लोगों को खबरें समझाते, राजनीतिक अंत:पुर की कहानियां बताते थे। क्षीणकाय, ठिगने कद के बुजुर्ग सज्जन के सारे बाल सफेद हो चुके थे, लेकिन वे सिर की शोभा बने हुए थे। वे सज्जन अक्सर सफेद रंग की शर्ट पहनते।
जब ब्यूरो में मेरी नियुक्ति हुई तो लोगों से परिचय होना शुरू हुआ। शरद जी ने शुरू में मुझसे ट्रेनी की तरह का व्यवहार किया, लेकिन बाद के दिनों में बड़ी स्टोरियां लिखाने लगे। इसी दौरान पता चला कि एक-दो दिन के अंतराल पर आने वाले वे क्षीणकाय बुजुर्ग व्यक्ति केपी श्रीवास्तव हैं.. जिन्हें पीठ पीछे शरद जी नवाब साहब कहा करते थे।
बाद में पता चला कि उन्हें नवाब का विशेषण चंद्रशेखर ने दिया था.. चंद्रशेखर यानी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर..
हाल ही में चंद्रशेखर जी की जयंती बीती है। इसे संयोग कहें या कुछ और…इसी के आसपास हरिवंश जी तीसरी बार राज्यसभा के सदस्य और उपसभापति बन गए।
पूछा जा सकता है कि इन घटनाओं से केपी श्रीवास्तव का क्या लेना-देना।
हरिवंश जी की बड़ी पहचान तो उनकी पत्रकारिता ही है, लेकिन उनकी एक और पहचान को इन दिनों खूब याद किया जा रहा है… वे चंद्रशेखर के मीडिया सलाहकार रहे।
इसी वजह से केपी श्रीवास्तव की याद आ जाती है। श्रीवास्तव जी भी चंद्रशेखर के प्रधानमंत्री रहते मीडिया सलाहकार रहे। मीडिया नहीं, प्रेस सलाहकार। तब प्रेस था, मीडिया नहीं। इसके पहले वे पीटीआई के संपादक रहे, पीटीआई की हिंदी सर्विस भाषा के संस्थापक संपादक रहे।
दैनिक भास्कर के दिल्ली में ब्यूरो में आते वक्त जो लिफाफे लाते थे, दरअसल उनमें उनके स्तंभ की हस्तलिखित प्रति होती थी, जिसे भास्कर के सेवा संपादक राजाराम आईएनएस स्थित राजस्थान पत्रिका के दफ्तर को दे आते थे।
श्रीवास्तव जी राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश के मित्र थे और उन दिनों पत्रिका के संपादकीय पृ्ष्ठ पर उनकी टिप्पणियां छपा करती थीं।
श्रीवास्तव जी बड़े पत्रकार होने के बावजूद जमीन से जुड़े थे। पान के शौकीन थे। लेकिन चलते बस से ही थे। उन दिनों 680 नंबर की बस से अक्सर हम साथ यात्रा करते थे।
उनसे जुड़ी कई स्मृतियां कौंध रही हैं। तब पत्रकारों का बड़ा औरा था। वे बड़े पत्रकार रहे, पीटीआई में संपादक होना मामूली बात नहीं होती। प्रधानमंत्री के प्रेस सलाहकार होने के बावजूद आखिरी वक्त तक उनकी जिंदगी बेहद सादगी में गुजरी। फोटो खिंचाने से भी हिचकते थे। वैसे तब पत्रकार भी फोटो खिंचवाने से बचते थे। मैंने भी कई बड़ी हस्तियों का दैनिक भास्कर के लिए इंटरव्यू किया, लेकिन किसी के साथ मेरा फोटो नहीं है। श्रीवास्तव जी की याद आई तो नेट पर उनके फोटो खोजने लगा। फोटो तो छोड़िए, उनसे जुड़ी कोई खबर नहीं दिखी, सिवा उनके निधन के समाचार के।
के पी श्रीवास्तव का निधन 6 नवंबर 2018 को हुआ था, चंद्रशेखर जी के निधन के ठीक ग्यारह साल चार महीने बाद…..
अच्छा संस्मरण है। मैंने उनके काम की गति देखी है। आपके संस्मरण से अचानक बिजली की तरह दिमाग की नसों में वो यादें चमकीं। आईटीओ के पास यंग इंडियन का दफ्तर होता था। वहां वो यंग इंडियन इंग्लिश देखते थे। सम्भवतः 2000 से कुछ समय पहले की बात होगी। यंग इंडियन हिंदी नर्मदेश्वर राय जी देखते थे। कुछ महीने तक हफ्ते में एक दिन मैं उनके पास जाता था एक लेख लेकर। वहीं उनके सामने केपी साहब आते और बैठतेl इंग्लिश यंग इंडियन को फाइनल करते। मैं तो उतना नहीं जानता था लेकिन नर्मदेश्वर जी बताते थे कि जो काम हमलोग साप्ताहिक अंक निकालने में 4 दिन लगाते हैं उस काम को वो एक दिन में कर जाते थे बाकी का काम उनके सहायक करते थे।
वाकई हर हफ्ते मैंने 2/3 घंटे की वहां की बैठकी में उनके काम की गति और जो तल्लीनता देखी थी वह आज भी स्मृति में है। -संजीव श्रीवास्तव


