Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

सीवर गैस से घरों में जलते थे चूल्हे! 26 साल पुरानी तकनीक क्यों राष्ट्रीय मॉडल नहीं बन पाई?

लखनऊ। आज जब देश एलपीजी की बढ़ती कीमतों और आयात पर निर्भरता से जूझ रहा है, ऐसे में एक पुराना लेकिन बेहद अहम सवाल फिर खड़ा हो रहा है। करीब 26 साल पहले लखनऊ में सीवर से निकलने वाली गैस का इस्तेमाल घरों में चूल्हा जलाने तक के लिए किया जा रहा था। उस वक्त इस तकनीक पर रिपोर्टिंग भी हुई थी, लेकिन यह मॉडल आगे नहीं बढ़ सका।

क्या था पूरा मामला?

बताया जाता है कि सीवर से निकलने वाली गैस—मुख्य रूप से मीथेन—को पाइपलाइन के जरिए घरों तक पहुंचाकर जलाया जा रहा था। यह वही सिद्धांत है जिस पर आज बायोगैस प्लांट काम करते हैं। उस समय यह प्रयोग सफल भी माना गया, लेकिन बाद में इसे बड़े स्तर पर लागू नहीं किया गया।

क्यों रुक गया प्रोजेक्ट?

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा रही कि छोटे स्तर के इस मॉडल में बड़े निवेश या ठेके की गुंजाइश कम थी, जबकि बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) परियोजनाओं में भारी बजट और ठेके शामिल होते हैं। नतीजतन, नीति और प्राथमिकताओं का फोकस बड़े प्रोजेक्ट्स की ओर चला गया और यह तकनीक पीछे छूट गई।

विदेशों में सफल मॉडल

दुनिया के कई देश जैसे Singapore, Japan और यूरोप के कई हिस्सों में सीवर और वेस्ट से निकलने वाली गैस का इस्तेमाल बिजली और कुकिंग गैस के रूप में किया जाता है। इसे “वेस्ट टू एनर्जी” मॉडल के तौर पर विकसित किया गया है, जिससे ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत तैयार होते हैं।

भारत के लिए कितना फायदेमंद?

अगर इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया जाता, तो:

  • एलपीजी के आयात में कमी आ सकती थी
  • शहरी कचरे और सीवर प्रबंधन में सुधार होता
  • सस्ती और स्थानीय गैस उपलब्ध हो सकती थी

अब क्या है स्थिति?

भारत में फिलहाल कुछ शहरों में बायोगैस और वेस्ट-टू-एनर्जी प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं, लेकिन सीवर गैस को सीधे घरेलू उपयोग तक पहुंचाने का मॉडल व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो पाया है।

बड़ा सवाल

जब तकनीक मौजूद थी और सफल प्रयोग भी हो चुका था, तो आखिर क्यों इसे नीति स्तर पर प्राथमिकता नहीं मिली? क्या यह केवल तकनीकी चुनौती थी या फिर सिस्टम की प्राथमिकताओं में ही बदलाव आ गया? यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है—खासतौर पर तब, जब देश सस्ती और स्वदेशी ऊर्जा के विकल्प तलाश रहा है।


26 साल पहले लखनऊ में सीवर से लोगों के घर में गैस जल रही थी। ख़ुद मैंने ही रिपोर्ट किया था। बाद में सरकारी लोगों को समझ आया कि इसमें कट कमीशन नहीं है। वो तो बड़े बड़े एसटीपी यानी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने में ही मिलता है, इसलिए प्रोजेक्ट आगे बढ़ने नहीं दिया गया। कायदे से सिंगापुर, जापान और यूरोप की तरह भारत में भी चूल्हे और बल्ब जलाने में यह तकनीक इस्तेमाल की जानी चाहिए थी। इससे भारत का एलपीजी इम्पोर्ट काफ़ी हद तक कम हो जाता। -सुधीर मिश्रा, संपादक, एनबीटी

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन