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सुख-दुख

शंकराचार्य जी का संघर्ष देखकर बनारस के SSP का मुझपर लिखा झूठा मुकदमा याद आ गया.. तब मैं ईटीवी का रिपोर्टर था!

शरद दीक्षित-

मायावती की सरकार थी. मैं ईटीवी का पत्रकार. क्रांति करने पर आमादा.. मजलूमों के लिए आखिर तक लड़ाई लड़ने को तैयार. बनारस में एक SSP आये. खूब दोस्ती करने वाले. क्राइम रिपोर्टरों के यार. हमारे चैनल की ओर से घाट पर भोजपुरी एवार्ड का कार्यक्रम था. कुछ लोगों को उससे नाराज़गी थी. हमारे क्राइम रिपोर्टर ने SSP से कहा. उन्होंने तगड़ी फोर्स भेज दी. खूब बढ़िया कार्यक्रम हुआ.

मेरे ऊपर सच का भूत सवार था. मैं इस व्यवहार को नहीं निभा पाया. पुलिस ने दो बदमाशों का फर्जी एनकाउंटर किया मैंने खबर दिखाई. SSP को नहीं भाया. बसपा के SC नेता पर दूसरे SC के बच्चे के अपहरण और घर पर पुलिस की मदद से क़ब्ज़ा करने का आरोप लगा जिसकी IG की जांच में पुष्टि हो गयी थी. मैंने खबर दिखाई तो ये भी SSP को नहीं भाया. क्योंकि खबर पर मायावती ने जांच के आदेश दे दिये और आरोपी बसपा नेता पर कार्रवाई की SSP की हिम्मत न थी.

SSP सीधे तौर पर कुछ बिगाड़ न सकते थे. क्योंकि ईटीवी का रिपोर्टर था. उन्होंने अपहरण के आरोपी बसपा नेता से आशुतोष पांडेय की तरह कोर्ट से SC/ST act में मुकदमा लिखवाया. कहानी गढ़ी. शरद दीक्षित और उनका साथी रिपोर्टर आया. रुपया मांगा. मैंने रसीद मांगी तो गालियाँ देने लगे. जातिसूचक शब्द कहने लगे. मायावती की तस्वीर देखकर जातिसूचक गालियाँ देने लगे. दो गवाह तैयार कर लिये. जब मैंने तहरीर देखी तब हक्का बक्का रह गया. इतने झूठ पर भी मुकदमा लिखा जाता है क्या. हाईकोर्ट से अरेस्ट स्टे मिला. दो साल मुक़दमा लड़ा और जीता..

शंकराचार्य जी का संघर्ष देखकर पूरी कहानी याद आ गयी. बिना डरे सच कहने की हिम्मत सबकी नहीं होती. सच कहने वाले का विरोध तय है. प्रताड़ना भी तय है. तमाम टूट जाते हैं. बहुत कम हैं जो शंकराचार्य जी की तरह डटे रहते हैं..


शिवानी साहू-

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद की गिरफ्तारी पर रोक लग गई। उनके वकील ने कोर्ट में जो तर्क रखा, वह पढ़िए…

यौन उत्पीड़न के आरोप विद्वेषपूर्ण हैं, इस घटना का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जब घटना होना बताया गया, उसके काफी दिनों के बाद FIR कराई गई, इससे संदेह पैदा होता है।

देखा जाए तो इस FIR को दर्ज करने से पहले पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। जिन बटुकों का रेप होना बताया जा रहा है, वो कभी शंकराचार्य के आश्रम में रहे ही नहीं, इसके कोई साक्ष्य भी नहीं हैं।

कहा गया कि पीड़ित बटुक हरदोई के एक स्कूल के रेगुलर स्टूडेंट हैं, वो इस वक्त भी परीक्षा दे रहे हैं। तब वो कैसे शंकराचार्य के आश्रम के छात्र हो सकते हैं?

ये आरोप सही नहीं हैं, माघ मेला में स्नान के दौरान जो घटनाएं हुईं हैं, सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ मुखर होने का परिणाम है।

एक बटुक की मार्कशीट को कोर्ट के सामने पेश किया गया, दावा किया गया कि वो बालिग है, जांच करवानी चाहिए।

सवाल उठाए गए कि मजिस्ट्रेट के सामने सिर्फ एक बटुक क्यों पेश किया गया? दूसरे को क्यों नहीं…जवाब मिला, उसके एग्जाम चल रहे हैं।

इन जिरह को सुनने के बाद जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा ने गिरफ्तारी पर रोक लगा दी। अगली सुनवाई मार्च के तीसरे सप्ताह में की जाएगी। तब तक शंकराचार्य को पुलिस अरेस्ट नहीं करेगी।

राज्य सरकार के अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने अरेस्ट स्टे दिए जाने का विरोध करते हुए पॉक्सो एक्ट का हवाला दिया, मगर जज ने इसको अनसुना कर दिया।

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