आकांक्षा-
भारत के शेयर बाजार में हमेशा कुछ न कुछ संदिग्ध होता रहता है! इधर यह सामने आया। 2025 में IPO से जुटाई गई 63% रकम कंपनियों तक नहीं पहुंची बल्कि प्रमोटर्स और प्राइवेट इक्विटी की जेब में चली गई। ये कोई संयोग नहीं, SEBI की filings में सब दर्ज है बस खँगालने की जरूरत है।

IPO में दो तरह के पैसे आते हैं – फ्रेश इश्यू , नयी पूंजी, कंपनी के काम में लगती है, जैसे फैक्ट्री बनाना, विस्तार करना और ऑफर फॉर सेल(OFS), पुराने शेयरधारक जैसे फाउंडर, PE फंड्स अपना स्टॉक बेचते हैं, पैसा सीधे उनकी जेब में।
वर्ष 2025 में 63% पैसा OFS से आया! यानी रिटेल इन्वेस्टर जो ख़रीद रहे हैं उससे किसी का कंपनी से एग्जिट हो रहा है न कि यह कंपनी की ग्रोथ में जा रहा है।
उदाहरण देखो: LG इलेक्ट्रॉनिक्स इंडिया ने ₹11,607 करोड़ जुटाए – 100% OFS! एक पैसा भी कंपनी को नहीं मिला, सिर्फ कोरियन पैरेंट ने अपना स्टेक लाभ में बेचा।
इसी तरह WeWork इंडिया का भी ₹3,000 करोड़ का IPO 100% OFS – शुद्ध एग्जिट।
बड़े IPO भी ऐसे: टाटा कैपिटल (₹15,500 करोड़) और लेंसकार्ट (₹7,200 करोड़) में 55-70% OFS। तुम्हें लगता है कि तुम एक तेजी से उभरती कंपनी के IPO में शेयर खरीद रहे हो, लेकिन असल में कोई तुम्हारे पैसे से लाभ कमाकर कंपनी छोड़कर बाहर निकल गया और तुम्हें चूना लग गया।
हाई वैल्यूएशन पर बेचने के लिए कंपनियां फाइनेंशियल्स को सजाती हैं। IPO से ठीक पहले कागजों में प्रॉफिट नजर आता है और IPO के तुरंत बाद वह गायब हो जाता है और आप ठगे रह जाते हैं!
उदाहरण: अर्बन कंपनी के FY24 में ₹93 करोड़ घाटा था लेकिन इसने FY25 में ₹240 करोड़ प्रॉफिट दिखाया। दरअसल इसने ₹211 करोड़ वन-टाइम टैक्स क्रेडिट से बुक्स में जोड़ लिए थे, असली प्रॉफिट सिर्फ ₹29 करोड़ था या और पड़ताल की जाय तो वह भी अकाउंटिंग की जगलरी हो सकती है।
इसका IPO सितंबर 2025 में 57% प्रीमियम पर लिस्ट हुआ। उसके बाद Q1 रिजल्ट आया और 59 करोड़ रुपये का घाटा निकला, नतीजा शेयर मार्केट में इसका स्टॉक 27% गिरा।
मामा अर्थ ने भी यही किया। IPO से पहले ₹29 करोड़ प्रॉफिट दिखाया और IPO खत्म होने के बाद में ₹19 करोड़ का घाटा सामने आ गया।
सबसे बुरा केस DroneAcharya का है जिसे SEBI ने पकड़ा – FY24 के 35% रेवेन्यू (₹12.35 करोड़) शेल कंपनियों से फर्जी बुक्स में चढ़ाये गए। इसके बिना 4 करोड़ रुपये का घाटा होता, न कि ₹8 करोड़ प्रॉफिट।
दरअसल IPO से पहले IPO की मार्केटिंग की जाती है। फिनफ्लुएंसर्स, ब्रोकरेज, आर्थिक मामलों के न्यूज चैनल सब मिल कर हाइप फैलाते हैं जिसमें रिटेल इन्वेस्टर को फंसाकर उसका शिकार किया जाता है।
कोई कितना सावधान रह सकता है जब नियामक संस्थानों में ही रोग लग चुका हो तो!
सौमित्र रॉय-
आए दिन मित्र पूछते हैं कि जब भारत की जीडीपी जब 8.2% की ग्रोथ के साथ बढ़ रही है तो शेयर मार्केट वीरान क्यों है?
चलिए इसका जवाब ढूंढते हैं।
क्या आप जानते हैं कि 2025 में शेयर बाज़ार से IPO के जरिए उठाया गया 63% पैसा प्रमोटर्स की जेब में गया?
कायदे से यह पैसा कंपनी की तिज़ोरी में जाना चाहिए था, लेकिन मालिकों ने माल बनाया और निकल लिए।
ये कमाल IPO के माध्यम से 63% पैसा ऑफर फॉर सेल, यानी कंपनी के शेयर बेचने से हुआ है।
अब ऐसे भगोड़ों के नाम जानिए–
एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स ने सारे शेयर बेचकर 11,607 करोड़ कमाए और निकल गए। वी वर्क इंडिया ने 3000 करोड़, टाटा कैपिटल ने 15,500 करोड़, लेंसकार्ट ने 7,200 करोड़ निकाले।
यह कमाल करने के लिए मोदिनॉमिक्स की जरूरत पड़ती है। ठीक वैसे ही, जैसे जुमलेंद्र देश की मरी हुई इकॉनमी को फ़र्ज़ी आंकड़ों से एकदम खड़ा कर देते हैं।
अर्बन कंपनी बीते साल 93 करोड़ के घाटे में थी। इस साल आईपीओ लाने से पहले अचानक 240 करोड़ के मुनाफे में आ गई। निवेशकों को यह नहीं पता कि इस 240 करोड़ के मुनाफे में 211 करोड़ टैक्स क्रेडिट से आए। मुनाफा तो सिर्फ 29 करोड़ का था।

सितंबर 2025 में 57% प्रीमियम के साथ आईपीओ आया। लेकिन उसके बाद जो हुआ, वही शेयर मार्केट को चूना लगाने की कहानी है।
दरअसल, कंपनी को पहली तिमाही में 59 करोड़ का घाटा हुआ और अब अर्बन कंपनी के शेयर 27% डाउन हैं। यही खेल मामाअर्थ जैसी कई कंपनियों के साथ हुआ।
एक और खेल देखें। द्रोणाचार्य कंपनी के खिलाफ सेबी की जांच में पता चला कि कंपनी के बीते साल के 12 करोड़ से ज्यादा के मुनाफे का 35% हिस्सा फर्जी शेल कंपनियों से आया था। वरना कंपनी 4 करोड़ के घाटे में थी।
शेयर मार्केट के दलाल, भड़वे न्यूज चैनल्स और ख़ुद को फाइनेंशियल इन्फ्लूएंसर्स बताने वाले दल्ले असल में घाटे की कंपनियों की लुभावनी तस्वीर खींचते हैं।
शेयर बाज़ार उछलता है और निवेशक बेवकूफ़ बन जाते हैं।
बीते 12 साल से भारतीय शेयर बाज़ार लूट का अड्डा बना हुआ है।
देशी/विदेशी शेल कंपनियों से आ रहे अरबों के कालेधन से बिगड़ी किस्मत चमकाकर कंपनियां भाग रही हैं और निवेशक इसे विकास मान रहे हैं।
ठीक वैसे ही, जैसे जीडीपी के नए आंकड़े। जिसे प्रोफेसर अरुण कुमार 4% से भी कम मानते हैं।
जनरल नॉलेज की बात है–आर्थिक विकास के साथ लोगों की खपत बढ़ती है।
लेकिन, उपभोक्ता कंपनियों की हालत देखें। सब नुकसान में हैं।
बस, भड़वागीरी करने वालों के लिए सब चंगा है।


