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आज के अखबार : शीश महल का मुद्दा नहीं चला, हेडलाइन मैनेजमेंट की कोशिशें दिख रही हैं

इसमें सरकार का प्रचार तो बहुत साफ है लेकिन आज की खबर तो इंडियन एक्सप्रेस में है कल की लीड का फॉलोअप और यह है तालिबान की मांग या अपील ….

संजय कुमार सिंह

दिल्ली चुनाव के लिए भाजपा का शीश महल का मुद्दा नहीं चला। उल्टे बुरी गत हुई और 35 करोड़ रुपये की फिजूलखर्ची के मुकाबले, ‘मैंने अपने लिये घर नहीं बनाया’, के प्रधानमंत्री के दावे का सच भी सामने आ गया। सोशल मीडिया पर एक दस्तावेज घूम रहा है जिसके मुताबिक, ‘शीशमहल’ की मरम्मत (पुनरुद्धार) पर 35 करोड़ रुपये खर्च किये जाने पर हंगामा मचाने वाली भाजपा और उसके नेता नरेन्द्र मोदी के निवास स्थान, 7 आरसीआर पर ऑफिस के लिए जगह बनाने का ठेका 2016 में 33.50 करोड़ रुपये का दिया गया था। भुगतान 88.96 करोड़ रुपये का किया गया था। यही नहीं, प्रधानमंत्री के दूसरे खर्चे भी सार्वजनिक हैं और इन सबकी चर्चा नये सिरे से होने लगी थी। दिल्ली के विधानसभा चुनाव को ‘स्थानीय’ बनाने की भाजपा की कोशिशों को कामयाबी नहीं मिली। दूसरी ओर, कांग्रेस के आम आदमी पार्टी के खिलाफ खुलकर चुनाव लड़ने का एक मतलब यह हो सकता है कि कांग्रेस या राहुल गांधी को राष्ट्रीय स्तर पर बनी छवि का लाभ दिल्ली में भी मिलने की उम्मीद हो। ऐसे में भाजपा की मजबूरी है कि वह भी राष्ट्रीय स्तर के मुद्दे उठाये और कांग्रेस के मैदान में होने का न सिर्फ लाभ उठाये बल्कि उसे दिल्ली में जगह बनाने से रोके। सबको पता है कि जीतने के बाद कांग्रेस या आम आदमी पार्टी भाजपा का समर्थन करने वाली नहीं है। आज के अखबारों में भाजपा का प्रचार कम है लेकिन है। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर में बताया गया है कि दिल्ली के लिए भाजपा के घोषणा पत्र में महाराष्ट्र के वादों की छाप हो सकती है जबकि दि एशियन एज की खबर बताती है कि भाजपा विकास पर फोकस करेगी न कि हिन्दुत्व पर। दिलचस्प यह है कि इस खबर के अनुसार, भाजपा द्वारा आम आदमी पा्र्टी की नाकामी और घूसखोरी को मुद्दा बनाया जाना है। मुझे लगता है कि चुनाव दिलचस्प रहेगा।

अगर भाजपा को दिल्ली का चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के साथ लड़ना पड़ता है और यह मुमकिन है क्योंकि वह विधानसभा चुनाव बुरी तरह हार जाती रही है और लोकसभा की सभी सीटें जीत जाती है। यह ईवीएम और चुनाव आयोग की मदद का कमाल नहीं हो तो राजनीति के चाणक्य इस दिशा में भी प्रयास करेंगे ही और आज वह होता नजर आ रहा है। हालांकि, मेरा मानना है कि भाजपा जीतने के लिए हर संभव उपाय करती है ताकि उसकी जीत मुद्दा नहीं बने और जीतने के उसके तरीके की नकल नहीं की जा सके। इसमें ईवीएम की धुलाई और वाशिंग मशीन पार्टी की राजनीति शामिल है। पर वह अलग मुद्दा है। इसमें इंडिया गठबंधन से संबंधित आज की खबर उल्लेखनीय है। वैसे, कांग्रेस और गठबंधन के दल राज्यों में एक दूसरे के खिलाफ लड़ते रहे हैं और यह पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव के समय तथा पंजाब विधानसभा चुनाव के समय ही नहीं और भी कई बार अलग-अलग साबित होता रहा है। दूसरी ओर, भाजपा को इंडिया गठबंधन से स्वाभाविक डर है क्योंकि गठबंधन का मकसद स्पष्ट और घोषित है। ऐसे में इंडिया गठबंधन को नुकसान पहुंचना प्रचारक मीडिया का लक्ष्य दिखाई देता है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला कछ भी बोलें उसे पहले पन्ने पर तान दिया जाना स्वाभाविक है। लेकिन 370 पर वे क्या बोलते रहे हैं वह पहले पन्ने पर कभी नहीं दिखा।

आज ढूंढ़ने पर मुझे एक खबर दिखी कि जम्मू कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मांग की है कि वे अनुच्छेद 370 और 35ए की पुनर्बहाली का अपना वादा पूरा करें। पीडीपी की प्रेसिडेंट महबूबा मु्फ्ती ने कहा है कि अब हमारे पास निर्वाचित सरकार है और उसे 5 अगस्त 2019 के निर्णय की निन्दा करते हुए प्रस्ताव पास करना चाहिये। 16 अक्तूबर 2024 की यह खबर ना तो मुझे तब और ना उसके बाद कभी किसी अखबार में पहले पन्ने पर दिखी। 370 हटाने के समर्थन में या उसके खिलाफ उमर अब्दुल्ला का कोई बयान मुझे पहले पन्ने पर नहीं दिखा है लेकिन वे ईवीएम पर बोलें या इंडिया गठबंधन को खत्म करने पर – पहले पन्ने पर तन जाता है। आज भी यही हुआ है। अगर यह हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ही नहीं कहा-कहलवाया गया हो तो भी लपक लिया गया है। दि एशियन एज ने इसे पांच पन्ने पर छापा है। शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह उनकी राय है और किसी भी गठबंधन में लोगों की राय अलग हो सकती है वह उसे व्यक्त भी कर सकता है (नेता तानाशाह मिजाज का नहीं हो तो)। ऐसे में उन्होंने अपनी राय रखी है और निश्चित रूप से लीड भी बनाई जा सकती है। पर यह सामान्य तब होता जब 370 पर उनकी राय भी ऐसे ही बताई जाती या यह बताया गया होता कि वे क्षेत्रीय दलों की मांग के बावजूद उस मुद्दे पर नहीं बोलते हैं, चुप हैं।

दि एशियन एज में इस खबर का शीर्षक है, “इंडिया ब्लॉक अगर सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए था तो खत्म किया जाये : उमर”। उपशीर्षक में दो बातें हैं पहले मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला की और दूसरी उनके पिता व पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद फारुक अब्दुल्ला की। मुख्यमंत्री ने कहा है, दिल्ली चुनाव के बाद भविष्य की रणनीति के लिए बैठक होनी चाहिये। इससे साफ है कि अभी फैसला नहीं हुआ है और इंडिया ब्लॉक मौजूद है। उसमें इतना लोकतंत्र है कि दिल्ली के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देने की खुली घोषणा की है और यह इस तथ्य के बावजूद है कि लोकसभा का चुनाव आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों मिलकर लड़े थे तो एक भी सीट नहीं मिली थी और पिछले विधानसभा चुनाव  में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली थी। सपा और तृणमूल के क्या कहने। ऐसे में जब सब कुछ खुला और साफ है इंडिया गठबंधन से परेशानी का कारण भी साफ है। फारुक अबदुल्ला ने कहा भी है कि इंडिया गठबंधन स्थायी है। लोकतांत्रिक तरीका यही है न कि जो मुद्दा नहीं है उसे मुद्दा बनाना।

हेडलाइन मैनेजमेंट की आज की दूसरी खबर द हिन्दू में लीड है। शीर्षक है, नरेन्द्र मोदी ने दुनिया भर में फैले भारतीयों का इतिहास दर्ज करने की अपील की। भुवनेश्वर में प्रवासी भारतीय दिवस पर प्रधानमंत्री ने भारतीय मूल के लोगों की ‘यात्रा’ की प्रशंसा की और उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों की चर्चा की। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत में शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरी के लिये विदेश जाना या उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाना और वहीं अच्छी नौकरी पा लेना तो उपलब्धि हो सकती है।  लेकिन देश में संभावना नहीं होने पर विदेश जाने की मजबूरी प्रशंसा की बात नहीं है। प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता से पहले मजदूरी करने गये लोगों को भी याद किया। हाल में कनाडा से संबंध बिगड़े तो कितने लोगों को मुश्किलें आईं कितने लोग विदेश जा नहीं पाये और अभी भी अवैध ढंग से विदेश जाने की मजबूरी तथा दलालों की लूट आदि के खिलाफ किसी ठोस कार्रवाई की खबर नहीं है। इसी कार्यक्रम की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स में आज सेकेंड लीड है। शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा, भारत दुनिया को कौशल युक्त प्रतिभा मुहैया करायेगा। देश में जब निवेश न हो, रोजगार के मौके न हों और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस के दावे के बावजूद अगर लाल फीताशाही बढ़ती जाये तो यह मजबूरी भी है खासकर तब जब शिक्षा और रोजगार-व्यवसाय के हालात बुरे हैं और सरकार ने प्रचार पाने के लिए कौशल मिशन शुरू कर रखा है। हालांकि इसकी स्थिति यही है कि पूर्व कौशल मंत्री ने सांसद निधि से जनसेवा के लिए जो एम्बुलेंस खरीदे थे वो उनके घर पर ढंक कर रखे थे (कोविड के समय) और कारण उन्होंने बताया था कि ड्राइवर नहीं हैं। ठीक है कि संबंधित सांसद को मंत्री नहीं बनाया गया लेकिन कौशल मिशन तो तभी से शक के घेरे में है।  

हेडलाइन मैनेजमेंट की आज की तीसरी खबर भी भुवनेश्वर की ही है और अमर उजाला में लीड है। इसका शीर्षक है, “युद्ध नहीं, बुद्ध में भविष्य, 21 वीं सदी का भारत अविश्वसनीय रफ्तार से तरक्की की ओर : मोदी”। घुसकर मारूंगा, ज्यादातर पड़ोसियों से संबंध खराब करने और रक्षा खरीद में भारी वृद्धि के बाद इस तरह का दावा प्रधानमंत्री ही कर सकते हैं और किया है तो खबर है। आप अमर उजाला को इसे शीर्षक बनाने के लिए दाद दे सकते हैं। प्रधानमंत्री ने अपनी पीठ खुद थपथपाते हुए यह भी कहा है कि दुनिया डिजिटल इंडिया की ताकत देखकर हैरान है और अमर उजाला ने इसे उपशीर्षक बनाया है। भारत के बारे में दुनिया क्या कह रही है यह तो दुनिया घूमने वाला ही जाने। मैं तो यही जानता हूं कि प्रधानमंत्री अपने साथ पत्रकारों को नहीं ले जाते हैं और शुरू में भक्तों ने इसकी प्रशंसा यह कहकर की थी कि उन्हें पत्रकारों के प्रचार की जरूरत नहीं है। बाद में पता चला कि वे विमान में मित्र उद्यमियों को ले जाते रहे हैं। अखबारों के लिए यह सब खबर नहीं है और प्रधानमंत्री के दावों का क्या है। वे कुछ भी कह देते हैं और प्रेस कांफ्रेंस करते नहीं कि काउंटर सवाल पूछे जायें। इसी क्रम में उन्होंने कहा है कि मेड इन इंडिया विमान दूर नहीं है और यह भी अमर उजाला में छपा है। सच यह है कि कोविड के समय हम मेड इन इंडिया वेंटीलेटर नहीं खरीद पाये थे। हाल में खबर छपी थी कि वेंटीलेटर के लिए जो पैसे दिये गये थे वो वापस आ गये। दान और चंदे के पैसे वापस आ गये, सुरक्षित पड़े हैं और वेंटीलेटर के बिना कितने ही लोग दुनिया छो़ड़ गये। अब हवाई जहाज बन ही जायेंगे तो क्या हो जायेगा? इसमें सरकार की क्या भूमिका? अगर हो भी तो किस कीमत पर?

इस सवाल से मेरा संदर्भ यह है कि सरकार ने अगर बहुत परिश्रम करके अपनी योग्यता, शक्ति और प्रभाव से यह संभव भी किया हो कि भारत में विमान बनने लगेंगे और उसकी तकनालाजी देसी होगी तो क्या इस दौरान सरकार ने अपना काम ठीक से किया है? मुझे लगता है बिल्कुल नहीं और इसीलिए प्रधानमंत्री को यह सब बोलना पड़ रहा है और प्रचारक लीड बना रहे हैं। वरना खबर तो यही है कि प्रधानमंत्री के पास वोट मांगने के लिए अपना किया कोई काम नहीं है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार, महाराष्ट्र के ठाणे के एक व्यक्ति ने 269 बैंक खातों के जरिये 10 हजार करोड़ रुपये विदेश भेजे हैं। इसने 98 डमी साझेदरी फर्में और 12 निजी कंपनियां खोल रखी थीं। यह सब कैसे संभव हुआ? महाराष्ट्र में तो डबल इंजन की सरकार थी। कैसे थी यह अलग मुद्दा है और सरकार अपनी सरकार बनाने बचाने में लगी रही तो बाकी काम कब और कैसे करती। पर सच यही है कि आम आदमी के लिए एक बैंक खाता खोलना मुश्किल है, मैं एक फर्म नहीं चला पा रहा हूं, जरूरत भर कमा नहीं पा रहा हूं और लोग 10,000 करोड़ रुपये विदेश भेजने के बाद पकड़े जा रहे हैं और 269 बैंक खाते खोल लिये थे। जाहिर है सरकार की किसी एजेंसी ने काम किया होता तो बहुत पहले पकड़ा जाना चाहिये था। मुझे लगता है यह तभी संभव होता होगा जब मिल-बांट कर खाया जा रहा होगा और एक समय जब मुफ्त में खाने वालों का पेट बड़ा हो जाता होगा तो झगड़ा हो जायेगा और धंधा खुल जायेगा। वरना इतनी सख्ती के बावजूद ऐसे मामले इतने समय बाद क्यों सामने आते हैं?

तालिबान की अपील सुनी आपने?

इंडियन एक्सप्रेस में आज कल की खबर का फॉलोअप है। कल लीड का शीर्षक था, चाबहार के जरिये व्यापार को लेकर सुरक्षा की चिन्ता : भारत और तालिबान ने सर्वोच्च स्तर की पहली वार्ता की। इस खबर में बताया गया था कि विदेश सचिव दुबई में अफगानिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री से मिले थे और विदेश मंत्रालय ने कहा था, अफगानिस्तान के लोगों के विकास की अर्जेन्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत तैयार है। आज की लीड का शीर्षक है, तालिबान ने भारत से अपील की है कि अफगानिस्तान के छात्रों, मरीजों और व्यवसायियों को वीजा दिया जाये। उपशीर्षक है, भारत की सुरक्षा चिन्ता से वाकिफ तालिबान ने वीजा मांगने वालों की पुष्टि करने का आश्वासन दिया। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी और उनकी भाजपा को मुसलमानों के वोट की जरूरत नहीं है, पूरी भाजपा में  कितने मुसलमान हैं कोई नहीं जानता और प्रधानमंत्री खुद कह चुके हैं वे आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचानते हैं फिर भी तालिबान ने भारत से यह अपील की है जबकि भाजपा के कई समर्थिकों और संगठनों को हिन्दू या भारतीय तालिबान भी कहा जाता है। ऐसे में यह खबर दिलचस्प है और इसीलिये सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में आज एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। इसका शीर्षक है, तिरुपति में भगदड़ के पीछे श्रद्धालुओं की भीड़ और भीड़ का कुप्रबंध। अखबार में इसी पन्ने पर महा कुंभ की खबर का शीर्षक है, महाकुंभ डिजिटल हुआ 2700 सीसीटीवी, भीड़ को ट्रैक करने के लिए एआई और पानी के अंदर ड्रोन।  

द टेलीग्राफ की आज की लीड सुकमा के जंगलों में ड्रोन के मार्गदर्शन में चल रहे युद्ध की खबर है और बताया गया है कि इसमें तीन बागियों के मारे जाने की खबर है। खबर के अनुसार माओवादियों के हाल के हमले की जवाबी कार्रवाई चल रही है और नौ जवानों की शहादत के बदले तीन माओवादी मारे जा चुके हैं। द टेलीग्राफ में इंडिया गठबंधन पर संकर्षण ठाकुर की एक रिपोर्ट है। मुझे लगता है कि ऐसे मौके और ऐसी रिपोर्ट का जरूरत निष्पक्ष दिखने के लिए होती है और इसका अपना महत्व है। नवोदय टाइम्स की लीड आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की खबर है और शीर्षक है, आरक्षण से किसी को बाहर करना कार्यपालिका का काम है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा की हिन्दुत्व की राजनीति और कांग्रेस पर तुष्टिकरण के आरोपों के जवाब में कांग्रेस, इंडिया गठबंधन या राहुल गांधी ने आरक्षण, संविधान और दलितों का मुद्दा ऐसे उठाया है कि भाजपा उसे खेल ही नहीं पा रही है। इसके जरिये विपक्ष ऐसी गेंदबाजी कर रहा है कि भाजपा के लिए बल्ला चलाना मुश्किल हो रहा है और उसमें अंपायर भी कुछ कर नहीं सकता है। उदाहरण के लिए, नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, आम आदमी पार्टी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर मांग की है दिल्ली के जाट समाज को ओबीसी में शामिल करें। जाहिर है भाजपा के लिए इसे खेलना मुश्किल होगा और प्रवेश वर्मा ने कहा है कि 10 साल में कभी नहीं आई जाटों की याद। नवोदय टाइम्स में दोनों खबरें एक साथ छपी हैं और भाजपा या प्रवेश वर्मा के जवाब से यह सवाल उठता है कि शीश महल का मुद्दा अब क्यों उठा या बीच में क्यों छोड़ दिया था?

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