विश्व दीपक-
क्या आपने कोई ऐसा बयान सुना है या पढ़ा है जिसमें महामानव पुतिन या शी जिनपिंग ने ईरान के मुद्दे पर नाम लेकर ट्रंप की आलोचना की हो? नहीं की. दोनों देशों ने सामान्य निंदात्मक बयान जारी कर कोरम पूरा किया.
पुतिन ने अमरीका का नाम लिया लेकिन ट्रंप का जिक्र तक नहीं किया. इस दौरान वह दो बार ट्रंप से बात कर चुका है. बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि पुतिन ने ऐसा इसलिये किया क्योंकि वह ट्रंप से अपना संबंध खराब नहीं करना चाहता. यूक्रेन हड़पना उसका मकसद है. ईरान की कुर्बानी से उसे क्या फर्क पड़ता है?
यही हाल चेयरमैन शी जिनपिंग का है. वह तो बोला ही नहीं. विदेश मंत्री वांग यी से बयान दिलवाया. उसने भी युद्ध विराम की बात की. ट्रंप का नाम लेने तक की हिम्मत नहीं.
इतना ही नहीं इसी दौरान जबकि तेहरान पर आग बरस रही है शी जिनपिंग ट्रंप के स्वागत में रेड कार्पेट बिछाने की तैयारी कर रहा है. लेकिन भारत मौजूद रूस, चीन के भक्तों को लगता है कि अमरीका का पतन होने ही वाला है.
इजराइल युद्ध छोड़कर भागने वाला है. लाल भक्त लंबी पोस्ट लिखकर बता रहे हैं कि चीन, लाइव डेटा शेयर कर रहा है और रूस पीछे से मिसाइल पहुंचा रहा है ईरान को. जब मूर्खता और भक्ति का सर्वव्यापीकरण होता है तब इसी तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आती हैं.
एक बात और : पुतिन, शी जिनपिंग की बेबसी समझी जा सकती है लेकिन भारत के क्रांतिकारियों का क्या दांव पर लगा है कि वह भी ट्रंप का नाम तक नहीं लिख पा रहे हैं?
सिर्फ एक उदाहरण बता रहा हूं. ‘द वॉयर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन. वरदराजन इसलिये क्योंकि उन्हें भारत के गरीब बौद्धिकों के बीच इंद्र का दर्जा हासिल है.
28 फरवरी को अमरीका ने अली खामनेई की हत्या की. आज 11 मार्च है. वरदराजन का एक ट्वीट नहीं है जिसमें उन्होंने सीधा ट्रंप या अमरीका का नाम लिया हो. ट्रंप को टैग करके कुछ कहने की बात बहुत दूर की है.
इनफैक्ट, कुछ कहा ही नहीं. सिर्फ रिपोस्ट-रिपोस्ट खेल रहे. जबकि इसी दौरान उन्होंने ईरान हमले के संदर्भ में मोदी, एस जयशंकर और हरदीप पुरी को टैग किया है. यही हाल दूसरे स्वघोषित क्रांतिकारियों का है.
वरदराजन या उनकी प्रजाति के लोगों को किस बात का डर है? नागरिकता चली जाएगी. वीजा मिलना बंद जो जाएगा. अमरीका यूरोप में पढ़ने वाले भाई-भतीजों, बेटे-बेटियों का एडमिशन बंद हो जाएगा. चंदा मिलना बंद हो जायेगा. यही न?
अमरीका-इजराइल तेहरान को खंडहर बना रहे हैं. ईरान अपने सामर्थ्य से ज्यादा लड़ रहा है – यह अलग बात है. लेकिन ईरान को बर्बाद होने देने में रूस, चीन की बड़ी भूमिका है. दोनों ठीक से अमरीका को धमकी तक नहीं दे पाये. हिम्मत नहीं है. ताकत भी नहीं है.
सैन्य परेड दिखाकर और प्रोपगंडा के सहारे पुतिन और शी जिनपिंग ने शक्ति संतुलन का जो स्वांग रचा था उसकी पोल खुल चुकी है. बहुध्रुवीयता का ढोल फट चुका है. भारत के स्वघोषित झंडाबरदार यह जानते हैं, मानते भी हैं लेकिन posturing की बीमारी से ग्रस्त हैं इसलिये स्वीकार नहीं करते.



