सिडकुल भूमि घोटालाः भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में दीपक आजाद का साथ दें

अमूमन व्यावसायिक मीडिया बाजार के दबाव में ऐसी खबरें अब नहीं देता, लेकिन उस सुबह उमर उजाला ने जिन वजहों से भी छापी हो, यह खबर छाप दी कि सिडकुल हरिद्वार और पंतनगर में जमीन के एक बड़े घोटाले के बाबत हाईकोर्ट ने सरकार से आख्या माँगी है। इस खबर को पढ़ते ही मैंने दीपक आजाद को फोन किया जिन्होंने इस पूरे प्रकरण पर एक पीआईएल हाईकोर्ट में दाखिल की थी। कोर्ट जाने से पहले दीपक ने इस मसले को स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में उठाने के अलावा सामान्य बातचीत में मुझसे भी शेयर किया था। तब मैंने सरसरी रंगत में दीपक को सुझाव दिया था कि ब्याह रचाने के बाद अब अपनी दाल-दलिया की चिंता करें और पुरानी लड़ाकू प्रवृत्ति को बदलने का जतन करें। मैंने तार्किक रूप से उनको समझाने की चेष्टा की कि आज के इस परिवेश में चोरी-चकारी और बट्टामारी की ऐसी घटनाओं को व्यवस्था के रूटीन एपीसोड समझा जाना चाहिए। जहाँ हर शाख पर उल्लू बैठा हो वहाँ गुलिस्तां के गुलजार होने की खामाख्याली छोड़ देनी चाहिए। अपनी प्रवृत्ति के मुताबिक दीपक आजाद ने प्रवचन सुना और चुपचाप वापस हो लिए। बात आई-गई हो गई।

अब कोर्ट द्वारा मामले पर राज्य से रिपोर्ट माँगने की बात सुनी तो मैंने दीपक को फोन कर पूछा- ‘खर्चा कहाँ से जुटाया?’ दरअसल खर्च ही वह मसला था जिसके चलते मैंने दीपक को आगे न बढ़कर अपनी गृहस्थी पर ध्यान देने की बात कही थी। मैं जानता हूँ कि हद दर्जे के ऐसे सैद्धान्तिक जीव अपना पूरा जीवन उन लोगों के हक में लड़ते हुए खपा देते हैं, जिनको यह भी पता नहीं होता कि लड़कर भी कुछ हासिल किया जा सकता है। दीपक का अतीत मैं जानता हूँ और यह भी जानता हूँ कि अकेले दम पर सत्ता-प्रतिष्ठानों और पूंजीपतियों से पंगा मोल लेने की उनकी यही जिद आज उनकी इस तंगहाली के लिए जिम्मेदार है- अन्यथा कई लड़ाके अंततः ‘शान्ति-समझौता’ कर ‘मुख्यधारा’ में शामिल होते देखे गए हैं। दीपक आजाद जरूरत से ज्यादा अनाड़ी हैं और यही वजह है कि तमाम क्षमताओं के बावजूद कैरियर के मामले में अपने साथियों से कहीं पीछे छूट गए हैं।

बहरहाल, दीपक खुश हुए कि मैंने अपने पुराने वर्णन के ठीक विपरीत उनको बधाई दी। वह अगले रोज ही मिलने घर पर चले आए। उनसे दिन के भोजन पर विस्तार से बात हुई और सच बताउफं कि दीपक के जाने के बाद मैं बेचैन हो उठा। उन्होंने बताया कि अगर तत्काल उनका वकील उनको हाईकोर्ट बुला ले तो उनकी जेब में नैनीताल जाने का भाड़ा भी नहीं हैं। हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील नवनीश नेगी उनके पुराने मित्र हैं। इस नाते केस रजिस्टर तो हो गया लेकिन आगे की व्यवस्था अब भगवान भरोसे है। दीपक बताते हैं कि सिडकुल भूमि घोटाले का यह प्रकरण दरअसल सत्ता, नौकरशाही और पूँजी के नेक्सस की उस ताकत का जीवंत प्रमाण है जिसने इस हिमालयी प्रदेश के जल, जंगल, जमीन पर कब्जा कर यहाँ के मूल हक-हकूकधारियों को लगभग बेदखल कर दिया है।

प्रकरण यह है कि वर्ष 2012 में उत्तराखण्ड सरकार की जिम्मेदार मशीनरी ने सिडकुल हरिद्वार की 23 एकड़ भूमि अतंरिक्ष बिल्डर को पैंसठ सौ रुपए वर्गमीटर और सिडकुल पंतनगर की लगभग इतनी ही भूमि सरकार ने सुपरटेक को कौड़ियों के भाव 5800 रुपए वर्ग मीटर पर बेच डाली, जबकि रोचक तथ्य यह है कि 2007 में इसी प्रयोजन के लिए सरकार ने हरिद्वार सिडकुल में सुपरटेक को 20 हजार रुपए वर्ग मीटर की दर से जमीन बेची थी। अब सुपरटेक 5800 रुपए वर्ग मीटर के हिसाब से खरीदी गई जमीन को 32 हजार से 35 हजार रुपए गज के हिसाब से ग्राहकों को बेच रहा है। गणित सचमुच गड़बड़ है। हरिद्वार और पंतनगर में वर्ष 2007 के मुकाबले 2012 में जमीनों के बाजार भाव में लगभग ढाई गुना उछाल आ गया था। तब प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और राकेश शर्मा सिडकुल के एमडी और प्रमुख सचिव उद्योग थे। ऐसे में सरकार अगर अपने ‘परिचित’ बिल्डरों को सोने के भाव वाली यह जमीन तिगुने कम भाव पर बेचती है तो मेरे जैसा ‘मुख्य धारा’ का सभ्रांत जीव एक बार चुप रह भी लेगा लेकिन दीपक आजाद जैसे लड़ाके तो कोर्ट जाएँगे ही, फिर चाहे फांके पड़ें या सुर्ती भी मांगकर क्यों न खानी पड़े।

दीपक आजाद का अनुमान है कि इस सौदेबाजी से स्टेट को लगभग एक हजार करोड़ का रेवेन्यू लॉस हुआ है। इस सौदेबाजी से लाभान्वित होने वाले राजनेताओं और नौकरशाहों की शिनाख्त भी वह कर चुके हैं और उनकी उंगलियाँ जहाँ उठ रही हैं वहाँ पहले भी तमाम उंगलियाँ उठ चुकी हैं। मामले को दीपक कोर्ट तक ले गए हैं तो इसमें भी संदेह नहीं कि अब कुछ तो होगा ही। अगर कहीं संदेह है तो इस बात का कि जिस आदमी की जेब में तत्काल नैनीताल पहुँचने का खर्च न हो वह इस लड़ाई को कहाँ तक ले जा सकेगा! क्या हममें से प्रत्येक आदमी किसी-न-किसी रूप में दीपक आजाद की मदद नहीं कर सकता? क्या उनकी लड़ाई हमारे समाज की सामुहिक लड़ाई नहीं है। लातीनी अमेरिका से लेकर अप्रफीका और भारतीय उपमहाद्वीप तक का इतिहास तो यही गवाही देता है कि ऐसी लड़ाइयों में अंततः संवेदनशील और जागरूक समाज लड़ाकों के पीछे हो लेता है। काश! अब के भी ऐसा हो….।

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मुकेश नौटियाल

मूल ख़बरः

देहरादून के पत्रकार दीपक आजाद की याचिका पर सुपरटेक और अंतरिक्ष कंपनियों को नोटिस

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