दयाशंकर शुक्ल सागर-
आखिर बाबूजी नहीं रहे। बहुत दुख और भरे मन के साथ सूचित करना पड़ रहा है कि मेरे पूज्य पिता श्री सीताराम शुक्ल जी का 2/3 जनवरी 2026 को मध्य रात्रि देहावसान हो गया। उनका अंतिम संस्कार 4 जनवरी को लखनऊ के भैंसाकुंड स्थित बैकुंठ धाम में प्रातः 11 बजे सुनिश्चित हुआ है।
पिता की चिता को अग्नि देकर लौटा हूं। खाली हाथ…। उदासी और अकेलेपन का घना कोहरा भीतर कहीं गहरे जम गया है। अंतिम संस्कार के लिए बैकुंठ धाम वालों ने सबसे किनारे के प्लेटफार्म नम्बर 80 की जगह मुकर्रर की थी, जहां पिता के जीवन की अंतिम ट्रेन छूटनी थी। लंबी धुंध और ठंडे कोहरे के बाद बाहर साफ खुला आकाश है। हमारे धर्मग्रंथों में पिता को आकाश माना गया है जो पूरे परिवार को अपनी छत्रछाया में रखता है और उसे स्थिरता प्रदान करता है। मुझे वह आकाश अब कहीं नज़र नहीं आता।
बाहर खिली हुई धूप में पीछे गोमती नदी का किनारा कितना शांत है। थोड़ी गीली, ज्यादा सूखी लकड़ियों के ढेर पर चिता बड़े करीने से सजाई गई है। मैं किसी यंत्र की तरह महापात्र ब्राह्मण के निर्देशों का पालन कर रहा हूं। दिमाग बिलकुल संज्ञाशून्य है। कहीं कोई विचार नहीं..कोई सवाल नहीं..कोई जिज्ञासा नहीं…कोई तर्क नहीं…कोई स्मृति नहीं।

सामने प्लास्टिक की कुर्सियों पर गुनगुनी धूप में नात, हीत, रिश्तेदार, प्रियजन, सुख-दुख में साथ निभाने वाले तमाम मित्र बैठे अपनी व मेरी चिंताओं में व्यस्त हैं। पद्मपुराण में एक श्लोक है-“पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परमं तपः।” यानी पिता ही धर्म, स्वर्ग और सबसे बड़ी तपस्या है। पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न होते हैं। इस तस्वीर को देखिए। इस उम्र में भी मैं बच्चों की तरह लाड में आकर अपने पिता को ऐसे प्रसन्न कर देता था। अब कौन प्रसन्न होगा?
लकड़ियों से घिरे उनके चेहरे की तरफ देख रहा हूं। आखिरी के कुछ महीनों को छोड़ दें तो लंबे…स्वस्थ, संतुष्ट भरेपुरे जीवन की सारी चमक और खुशी उनके चेहरे पर घनीभूत है। बीमारी के दिनों में वह टूट से गए थे। किडनी और दिल के साथ अब न्यूरांस भी साथ छोड़ने लगे थे। एक-एक कर देह के जरूरी अवयव विछोह की जि़द ठान ले तो भला जीवन में क्या ही शेष रह जाता है?
86 साल की निर्जीव..निस्पंद देह चिता पर रखते वक्त महसूस हुआ कि देह कितनी हल्की हो गई है। कहीं पढ़ा था अक्सर लोग उम्र गुज़रने के साथ खुद को रिक्त करने लगते हैं। ताकि मृत्यु के बाद जब परिजन उनकी देह को चिता पर रखें तब उन्हें कोई भार महसूस न हो। और पवित्र अग्नि को भी देह पर बेवजह ज़्यादा वक्त न गँवाना पड़े। शायद अपने जीवनकाल में ही उन्होंने अपने भीतर वह सब कुछ जला दिया था, जो लकड़ियों पर बोझ बन सकता था।
मां का सिन्होरा… घर पर ही पिता की अर्थी के साथ ही एक मजबूत सुतली से मां का सिन्होरा बांधा गया था। उस वक्त मुझे किसी तरह का अहसास नहीं हुआ। और अंतिम संस्कार के लिए घाट पर पहुंचते ही जैसे सारी अनुभूतियों को काठ मार गया हो। सारी भावनाएं, जज़्बात और संवेदनाएं जैसे जम कर सख़्त चट्टटान हो गईं। वह चट्टान जैसे किसी ने आंखों में आसूंओं के सोते पर रख दी हो। चिता पर रखी देह को अग्नि देते वक्त आंसू नहीं निकले। लाठी से कपाल पर चोट देने की निर्मम परंपरा निभाते वक्त भी आंसू नहीं निकले। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि सारे बांध टूट गए।
आंच तेज होते ही चिता से हटकर मैं सामने रखी खाली कुर्सी पर किंकर्तव्य मूढ़ बैठ गया। सामने जलती चिता के किनारे लगभग अब सफेद पड़ चुके पीले कपड़े से लिपटा मां का सिन्होरा रखा था। वह लकड़ी का नक्काशीदार सुंदर-सा डिब्बा था। भारतीय विवाह परंपरा में सिंदूर और सिन्होरा दोनों ही पवित्रता और सौभाग्य के प्रतीक माने जाते हैं। मुझे याद है हमारे पूर्वांचल में ये सिन्होरा विवाह के दिन दूल्हा अपने साथ लेकर कन्या के घर जाता है। शादी के दौरान दुल्हा अपनी दुल्हन की माँग में सिंदूर भरता है। ये सिंदूर दान, विवाह की पूर्णता और प्रेम का अद्भुत प्रतीक है। फिर वह सिन्होरा जीवन भर के लिए पत्नी की सम्पत्ति बन जाता है। उसी सिन्होरे से सिंदूर निकाल कर पत्नियां अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। और सुहाग के प्रतीक के रूप में उसे हर तीज, त्योहार और शुभ अवसरों पर अपनी मांग में लगाती हैं। ये सिन्होरा किसी अक्षय पात्र की तरह होता है, जिसमें सिंदूर कभी खत्म नहीं होता।
मैंने बचपन से देखा था कि मां अपने सिन्होरे को हमेशा सीने से लगाए रखती थीं। इसे सबसे सुरक्षित कमरे में रखती थीं। कहते हैं सिन्होरे और उसके ढक्कन का रिश्ता भी पति-पत्नी के संबंधों का प्रतीक है। ढक्कन अगर डिब्बे पर ठीक से न बैठे तो पत्नी-पत्नी में जिंदगी भर खटपट चलती रहती है। लेकिन मेरी मां के सिन्होरे का ढक्कन डिब्बे पर बिलकुल फिट बैठता था। दोनों में खूब प्यार था। इतना कि चाचियां-मामियां उनके आपसी प्रणय संबंधों पर चुटकियां लेती रहती थीं।
इसलिए 2012 में जब मां चल बसीं तो पिता एकदम से टूट गए। उनका अकेलापन मेरे अब के अकेलेपन से भी कहीं ज्यादा गहरा और वजनी था। कहते हैं कि पति अगर पहले चला जाए तो पत्नी अपने बच्चों के सहारे फिर भी जी लेती है लेकिन ये मर्द अक्सर अंदर से इतने कमज़ोर और पर-आश्रित होते हैं कि पत्नी अगर पहले चली जाए तो टूट के बिखरते उन्हें ज़रा भी देर नहीं लगती। मेरे पिता के संग भी यही हुआ था।
मुझे याद है तेरह साल पहले जब मां विदा हुईं तो घर की औरतों ने उनका अंतिम बार सोलह श्रृंगार किया था। उन्होंने उस दिन बंद अंधेरे कमरे से मां की आलमारी में सुरक्षित रखा सिन्होरा निकाला था और अंतिम बार मेरी मां की मांग भरी थी। विदाई के वक्त वह सिन्होरा जब मां की अर्थी के साथ बांधा जाने लगा तो पिता लगभग फट पड़े। और घर की महिलाओं को डांटते हुए बोले- ‘मैं अभी मरा नहीं हूं। इसे यहां से हटाकर अंदर रखो।’ फिर पिता भीतर कमरे में आकर फूट फूट कर रोने लगे थे। मैंने तब पहली बार पिता को इस तरह रोते देखा था। घर की सहमी औरतों ने सिन्होरा मां की अर्थी से हटाकर अंदर उसी पुरानी आलमारी में वापस सुरक्षित रख दिया था।

वही सिन्होरा आज मेरे सामने पिता की जलती हुई चिता के समीप रखा था- बिलकुल अनाथ-अकेला-असहाय और असुरक्षित। चिता जला रहे डोम ने आवाज़ देकर मुझे बुलाया। सिन्होरे की तरफ इशारा करते हुए बोला कि ‘अब इसे खोल कर सारा सिंदूर नदी में प्रवाहित कर दीजिए। और सिन्होरे को भी।’
मैंने नीचे प्लेटफार्म पर बिखरी चिता की राख की धूल के बीच रखे मां के सिन्होरे की तरफ कातर नजरों से देखा। उसे उठाते वक्त मेरे हाथ कांप गए। होंठ सूख गए। सिन्होरे को सीने से लगाए मैं घाट की तरफ बढ़ा। मेरे दोनों पैर लड़खड़ा रहे थे। छाती फटने जैसे असहनीय दर्द की तरह, मेरे मन की तरह, मेरा हर कदम भारी था। प्लेटफार्म के नीचे आकर मैंने खुले आसमान के नीचे सिन्होरे का ढक्कन धीमे से खोला। डिब्बा, कुमकुम के पौधे से बने सुर्ख नारंगी रंग के सिंदूर से आधा भरा था। दिमाग में पहला ख्याल आया कि ये करीब साठ साल पुराना सिंदूर है, जो इस डिब्बे में सुहाग के प्रतीक के रूप में अब तक संरक्षित है।
फिर सोचने लगा-कैसे मां-पिता वैवाहिक बंधन में बंधे होंगे। पिता बारात के साथ ये सिन्होरा लेकर मां के दरवाजे पर गए होंगे। दोनों ने अग्नि और ध्रुव तारे को साक्षी मानकर सात फेरे लिए होंगे। पिता ने पहली बार मेरी बहुत सुंदर-सी मां की मांग भरी होगी। कुछ साल बाद इस दुनिया में मैं आया हूंगा। फिर मेरे भाई-बहन। एक छोटा सा संसार बना और बसा होगा।
जब तक मां थी मैं हमेशा अपनी मां के ज्यादा करीब रहा। उनके बाद ये जगह पिता ने ले ली। कभी-कभी सोचता हूं, बेटे बहुत स्वार्थी होते हैं। वह जीवन भर मां के ज्यादा करीब रहते हैं। हमेशा रौब में रहने वाले पिता से एक तरह की भावनात्मक दूरी बनाए रखते हैं। लेकिन मां के जाते ही वे झट से पाला बदल लेते हैं। जबकि बेटियां जीवन भर मां और पिता दोनों के बीच एक अनोखा भावनात्मक संतुलन बनाए रखती हैं। शायद इसीलिए दोनों से ज्यादा दुलार भी पाती हैं।
अब इस उदास सुबह सिन्होरे को मैं गोमती नदी की जलधारा में खाली कर रहा हूं। पुत्र होने की यह कैसी सज़ा तय की है हमारे पूर्वजों ने? कैसी निर्मम, क्रूर, निर्दयी और निष्ठुर परंपरा है ये? लेकिन थोड़ा अलग ढंग से सोचिए तो खून और भावनाओं के आपसी रिश्तों का ये कैसा मीठा गोरखधंधा है। ये संस्कार व पंरापराएं एक परिवार के सभी सदस्यों को भावनाओं के मजबूत और पवित्र धागे से जीवन के अंतिम क्षणों तक बांधे रखती हैं। ये संस्कार जन्म से मृत्यु तक के जीवन को शुद्ध, पवित्र, पुनीत, नर्मल और जीने योग्य बनाते हैं।
विचारों के इसी तूफान में पहले आंखें डबडबाई। फिर ह्रदय हिंचकियों से भर गया। सब्र का बांध टूट गया। जैसे पलकों पर आंसुओं के सोते पर रखी चट्टान थोड़ा सरक गई हो। और अश्रुधारा किसी झरने की तरह फूट पड़ी। लकड़ी के सिन्होरा के ढक्कन नदी में उतरा रहा था और डिब्बे में पानी भर रहा था और नारंगी सिंदूर लहरों की सतह पर बह रहा था। कितना कठिन समय है मेरे लिए। आज पिता के साथ मैंने अपनी मां को एक बार फिर खो दिया। अब मैं ठगा-सा खड़ा, पीछे जलती चिता पर पिता को और सामने नदी की जलधारा में बहते सिंदूर के साथ अपनी मां को, दोनों को, एक साथ अंतिम विदाई दे रहा हूं। मां के बहते सिंदूर में मेरे आंसू भी घुलमिल कर किसी अनजानी यात्रा पर निकल गए हैं।


