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सियासत

दलबदलू राघव चड्ढा ने अपने साथ छह और सांसदों की सदस्यता खतरे में डाल दी! कपिल सिब्बल को सुनिए

खुशदीप सहगल-

क्या राघव चड्ढा समेत आम आदमी पार्टी के 7 राज्यसभा सांसदों ने अपने बीजेपी में विलय का एलान करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है? राघव चड्ढा ने बीजेपी के साथ जो साठगांठ की, उसका क्या परिणाम सामने आएगा?

राघव चड्ढा और बीजेपी ने सोचा तो यही होगा, राज्यसभा में आप के 10 सदस्यों में से 7 यानि दो तिहाई टूट जाते हैं तो काम बन जाएगा. बीजेपी में विलय कर दलबदल विरोधी क़ानून के घेरे में आने से बच जाएंगे. लेकिन कपिल सिब्बल का कहना है कि न तो पाला बदलने वाले राघव चड्ढा समेत 7 सांसदों और न ही इनकी रिंगमास्टर बीजेपी को विलय की प्रक्रिया की सही समझ है…

कपिल सिब्बल के मुताबिक संविधान की 10वीं अनुसूची के अनुसार, मर्जर या विलय की प्रक्रिया दो चरणों में होती है. सबसे पहले मूल राजनीतिक दल को सांगठनिक स्तर पर यह फैसला लेना होता है कि वह किसी दूसरी पार्टी के साथ विलय कर रहा है. इसके लिए पार्टी को अपनी बैठक बुलाकर औपचारिक प्रस्ताव पास करना पड़ता है. यानी अगर आम आदमी पार्टी के सांसद बीजेपी में जाना चाहते हैं, तो पहले ‘आम आदमी पार्टी’ संगठन को खुद को बीजेपी में मर्ज करने का संकल्प लेना होगा. बिना संगठन के विलय के, केवल सांसद खुद को दूसरी पार्टी में मर्ज नहीं कर सकते…

जब राजनीतिक दल विलय का फैसला ले लेता है, तब बात आती है सदन में बैठे सांसदों की. कानून कहता है कि यदि पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक इस विलय के लिए तैयार हैं, तभी उनकी सदस्यता बची रहेगी. अगर 10 में से 7 सांसद (जो कि दो-तिहाई से ज्यादा हैं) तैयार हो भी जाएं, तो भी वे तभी कानूनी रूप से सुरक्षित हैं जब उनकी मूल पार्टी पहले विलय का फैसला ले. बिना ‘पॉलिटिकल पार्टी’ के विलय के ‘लेजिस्लेटिव पार्टी’ (सांसदों) का विलय 10वीं अनुसूची का उल्लंघन माना जाएगा. अब यदि कुछ सांसद विलय को स्वीकार नहीं करते, तो वे एक अलग गुट के रूप में काम कर सकते हैं, जिसे स्पीकर अलग बैठने की अनुमति दे सकता है…

लेकिन ये सब बातें नैतिकता वाली राजनीति में होती है. आज की अवसरवादी राजनीति में जिसकी लाठी उसी की भैंस का रूल चलता है. महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के मामलों में क्या हुआ, हम सबने देखा. क्या वाकई कानून का पालन हो रहा है? अक्सर विधानसभा अध्यक्ष या स्पीकर सत्ताधारी दल के दबाव में काम करते हैं, जिससे असंवैधानिक फैसलों को भी मान्यता मिल जाती है…

अगर आम आदमी पार्टी के मामले में भी बिना संगठन के विलय के सांसदों को मान्यता दी जाती है, तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा.

ये तो तय है कि अरविंद केजरीवाल इस मामले को ज़ोरशोर से उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. वो राज्यसभा के चेयरमैन (उपराष्ट्रपति) सी पी राधाकृष्णन के सामने ये मामला उठाएंगे. राष्ट्रपति से भी शिकायत करेंगे. लेकिन उनकी उम्मीद की सबसे बड़ी किरण कोर्ट ही होगा. आम आदमी पार्टी के सदस्य संजय सिंह ने राज्यसभा के चेयरमैन को याचिका भेज कर इन सात सदस्यों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है…

कपिल सिब्बल का पूरा वीडियो यहां देखें- दलबदलू चड्ढा


नीरेंद्र नागर-

कि कूड़ेदान में ही जँचे कूड़ा… कल जब राघव चड्ढा और छह अन्य सांसदों ने आम आदमी पार्टी छोड़ी और भारतीय जनता पार्टी का हाथ थामा तो मुझे पिताजी की किशोरावस्था में दी हुई वह सीख याद आ गई जब उन्होंने किसी मशहूर व्यक्ति (शायद माओ) को उद्धृत करते हुए कहा था – किसी व्यक्ति को इस आधार पर मत परखो कि वह क्या कहता है बल्कि इस आधार पर परखो कि वह क्या करता है।

उनकी उस सीख का ही असर है कि मैं किशोरावस्था से ही किसी के भाषणों से कभी प्रभावित नहीं होता चाहे वह कितना ही नामी व्यक्ति हो। मैं इसी आधार पर नेताओं को परखता हूँ कि वह क्या कर रहा है।

यही कारण है कि मैं किसी नेता का भाषण सुनता ही नहीं। क्योंकि भाषण तो उस रेहड़ीवाले की पुकार है जो चीख-चीखकर कह रहा है – सस्ता और बढ़िया आलू ले लो। अब आलू सस्ता और बढ़िया है या नहीं, यह तो पकाने और खाने के बाद ही पता चलेगा।

राघव चड्ढा और उनके छह साथी वैसे रेहड़ीवाले निकले जो सड़े हुए आलू बेच रहे थे। यह भी कहा जा सकता है कि वे ख़ुद ही सड़े हुए आलू थे और केजरीवाल यह जानते थे, फिर भी उन्होंने इन सड़े आलुओं को संसद में सजाया। लेकिन मुझे ऐसे लोगों से कोई उम्मीद नहीं थी।

वैचारिक ईमानदारी और मुद्दों के प्रति वफ़ादारी के बग़ैर यदि राजनीति होगी तो वह ऐसी ही होगी और उस राजनीति से जो लोग निकलेंगे, वे ऐसे ही होंगे।

अगर कोई ईमानदार व्यक्ति होता जो केजरीवाल से सैद्धांतिक असहमति के कारण पार्टी से अलग हो रहा होता तो वह पहले अपनी संसद सदस्यता से इस्तीफ़ा देता क्योंकि उसको यह कुर्सी आप के विधायकों के चलते मिली है। क्या इन सात सासंदों ने आप के विधायकों से पूछा था कि हम पार्टी बदलें या नहीं। नहीं पूछा होगा। इतनी ईमानदारी की आशा हम इन पेशेवर राजनीतिज्ञों से कैसे कर सकते हैं?

ये वे राजनीतिक प्राणी हैं जो कुर्सी और पैसों के लिए अपने परिवार वालों का भी सौदा कर दें।

इन बेशर्मों के लिए क्या रोना,
इन सड़े आलुओं को क्या धोना,
ये जहाँ गए, सही जगह पर गए
कि कूड़ेदान में ही जँचे कूड़ा

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