सीनियर पत्रकार Smita Prakash के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने राजनीति और मीडिया की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने इशारों में कहा कि अगर नेता “बिकाऊ” हो जाते हैं, तो इसके लिए मीडिया या आम जनता को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है।
Smita Prakash ने अपने पोस्ट में लिखा,
“अगर नेता बिकने के लिए तैयार हैं और बिक जाते हैं, तो इसके लिए मीडिया या खुद को दोष न दें। हम में से कोई खरीद-फरोख्त में शामिल नहीं था।”
यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में राजनीतिक दल बदल और सत्ता के समीकरणों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर उठे सवाल
स्मिता प्रकाश के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई यूजर्स ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि:
- आज की राजनीति में विचारधारा (ideology) कमजोर होती जा रही है
- नेता सत्ता, प्रभाव और राजनीतिक अस्तित्व के लिए पाला बदलते रहते हैं
कुछ आलोचकों ने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना है कि मीडिया, जिसका काम सत्ता से सवाल करना है, कई बार “मार्केट प्रोडक्ट” की तरह व्यवहार करता है— जहां खबरों का टोन, प्राथमिकताएं और नैरेटिव सत्ताधारी पक्ष के हिसाब से बदलते नजर आते हैं।
बड़ी तस्वीर
यह पूरा विवाद सिर्फ एक बयान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है—
- क्या राजनीति में विचारधारा खत्म हो रही है?
- क्या मीडिया अपनी जवाबदेही निभा पा रहा है?
- और क्या दोनों ही संस्थाएं बदलते दौर में अपने मूल चरित्र से दूर जा रही हैं?

आज के दौर में नेताओं की कोई ठोस विचारधारा नहीं रह गई है और वे सत्ता, प्रभाव और राजनीतिक अस्तित्व के लिए बार-बार पाला बदलते हैं।
जिस मीडिया का काम सत्ता से सवाल करना है, वह कई बार “मार्केटप्लेस प्रोडक्ट” की तरह व्यवहार करता दिखता है। मीडिया अपने टोन, प्राथमिकताओं और नैरेटिव को सत्ताधारी व्यवस्था के अनुसार ढालता नजर आता है।
“यकीन नहीं होता तो पिछले 12 सालों में अपनी ही न्यूज एजेंसी के ट्वीट्स देख लीजिए।” -मोहम्मद जुबेर, फैक्ट चेकर


