सुनील छइयां की याद : मिलना था इत्तेफाक, बिछड़ना नसीब था

सुनील छइयां की तीन तस्वीरें, तीन मुद्राएं… अब यादें शेष!


 

-पारस अमरोही

सुनील छइयां से पहली मुलाकात कब हुई, अब याद नहीं। शायद अमरोहा के किसी
प्रोग्राम में। याद आते हैं सुनील के साथ बिताये दिन। दोनों साथ ही तो
अमर उजाला के मुरादाबाद संस्करण में रहे। सुनील एक पारखी छायाकार थे।
समर्पित। जुझारू। एक विश्वसनीय। इन्सान दोस्त। तब अमर उजाला की मुरादाबाद
ब्यूरो की कमान थी वरिष्ठ पत्रकार उमेश प्रसाद कैरे के हाथों में। अमर
उजाला का मुरादाबाद कार्यालय था-19 सिविल लाइंस यानी कैरे साहब का निवास।
सुनील की पहचान का दायरा मुरादाबाद में किसी भी लोकप्रिय माननीय से
ज्यादा था।

अपने मोहल्ले नीम की प्याउ से कैमरा लेकर निकलने वाले सुनील
की मुरादाबाद की गली-गली में छइयां भाई की रट लगाने वालों की तादाद कम
नहीं थी। यही सुनील के संपर्क सूत्र भी थे। करीबी संपर्क में धनसिंह
धनेन्द्र, सांध्य युगबंधु के संस्थापक-संपादक, अरविन्द मिश्र नारद, डा
संतोष गुप्ता, शमीम अहमद तो सुनील के ऐसे हमजोली थे कि उनका नाम ही शमीम
छइयां पड़ गया। इनमें ऐसे भी नाम थे जो उम्र में सुनील से बड़े थे और ऐसे
भी जो छोटे थे लेकिन सुनील का अपनापा सभी के साथ था। इसकी वाजिब वजह थी,
सुनील छइयां का सहज और विश्वसनीय होना। यह दुर्लभ गुण उन्हें अपने माता
पिता से मिला और जीवन पर्यन्त सुनील ने इसे सहेजकर रखा।

सुनील छइयां का नजरिया व्यापक था। आखिर, कैमरे के साथ शुरू हुए उनके
सांसारिक जीवन ने उनके विजन का विस्तार दिया। वह अपने यादगार फोटो के साथ
जब अमर उजाला के पन्नों पर आते तो अगले दिन लोग मुबारकबाद दे देकर उनकी
झोली भर देते। यही सुनील की पूंजी थी। शोहरत के बावजूद वह हमेशा इस फिक्र
में मुब्तिला रहते कि आखिर आज का एंगल क्या हो।

बात 1980 की है। मुरादाबाद में दंगा हो गया। सांप्रदायिक दंगे की आग में
पूरा शहर और आस पास के गांव और कस्बे तक दहशत की लपटों से न बच सके। हर
चेहरे पर खौफ और दोनों फिरकों के बीच शक की दीवार। एक महीने तक पुलिस व
अर्द्ध सैनिक बलों के बूटों की आवाजें, अमन की उम्मीदों को कुचल देते। इन
दिनों दिल्ली से आने वाले हिन्दुस्तान, नवभारत टाइम्स और वीर अर्जुन जैसे
दैनिक की सप्लाई बदस्तूर आती रही लेकिन शहर के बाशिंदे अखबार नहीं हासिल
कर पाते। तब, प्रशासन ने अखबारों के बंडल मुरादाबाद रेलवे स्टेशन के
सामने कोठीवाल धर्मशाला में रखवाने का हुक्म दिया। अमर उजाला तब बरेली से
छपकर मुरादाबाद आता था। अमर उजाला के प्रबंध संपादक अतुल माहेश्वरी और
अशोक अग्रवाल ने तब कर्फ्यू के दौरान अमर उजाला को घर घर पहुंचाने की
योजना तैयार की। जिम्मेदारी सुनील छइयां और उमेश प्रसाद कैरे को सौंपी
गई।

सुनील ने योजना के तहत होमगार्डों के झोलों में दो दो कापी अमर उजाला
रखकर मोहल्ले मोहल्ले पहुंचाने का करिश्मा कर दिखा। इस काम में अमर उजाला
की तरफ से प्रसार विभाग के श्याम लाल की भी उल्लेखनीय भूमिका रही। श्याम
लाल वर्मा ने कर्फ्यू वाले शहर के स्टेशन रोड के एक होटल में बैठक कर गली
गली अखबार पहुंचाया। इस बीच देर रात तक दंगों से बेहाल मुरादाबाद के
बाशिंदों को अमर उजाला मिलने लगा। श्री कैरे और सुनील छइयां के साथ
हिन्दुस्तान के तत्कालीन संवाददाता डा राजेश चन्द्र श्रोत्रिय, नवभारत
टाइम्स के कुंवर बहादुर जौहरी की खबरों ने शहर को अमन से जुडी खबरों से
वाकिफ कराया और अपनी कलम से जिला प्रशासन की उन कोशिश को भी नाकाम किया
जिनकी वजह से सरकारी अमला लोगों को खबरों से महरूम रखना चाहता था।

सुनील छइयां को मुरादाबाद से अलग करके नहीं देखा जा सकता। नौकरी में रहकर
उन्होंने देहरादून हरिद्वार मेरठ, आगरा, मुजफफरनगर के अनुभव भले ही अपनी
झोली में सहेजे हों लेकिन 1980 के दंगों की कवरेज में उनका कैमरा बोलता
तो लोग छइयां को तलाशते।

मुरादाबाद में पहले नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान ही दिल्ली से छपकर आते
थे। बरेली से जब अमर उजाला का प्रकाशन प्रारंभ हुआ तो अखबारनवीसों की नई
टीम तैयार की गई। मुरादाबाद में पीटीआई के उमेश प्रसाद कैरे को जोडा गया।
इसी टीम में छायाकार के नाते सुनील को जोडा गया और सुनील के भीतर के
छइयां को खुद को तराशने का मंच मिला। अमर उजाला के साथ के दिनों ने ही
उन्हें आगे के दिनों के लिए तैयार किया। अमर उजाला बरेली के पन्नें पर
तत्कालीन संपादक अशोक अग्रवाल और प्रबंधक अतुल माहेश्वरी ने उनके भीतर के
छइयां को तराशा। दंगों के लिए उमेश प्रसाद कैरे की कवरेज के साथ  सुनील
छइयां के फोटो खबर को विस्तार देते। एकदम लाइव था-कवरेज और मंजरकशी। टीवी
तब था नहीं और रेडियो पर आने वाली खबरें सरकार के गले से निकलकर कानों तक
पहुंचती थीं। हालांकि बरेली कें अमर उजाला में उन दिनों प्रभात कुमार
सिंह और अरोडा भी थे लेकिन अंगारों पर चलने का हौसला छइयां ने चुना।
स्थानीय होने का लाभ भी उन्हें मिला।

दंगा थम नहीं रहा था। सुनील अपने दोस्तों शिशुपाल गुप्ता, आशेन्द्र कुमार
अग्रवाल मुन्ना, विनय कुमार वैघजी, बिजनौर टाइम्स के तत्कालीन संवाददाता
स्वर्गीय हरमहेन्द्र सिंह बेदी, युवक कांग्रेस के कार्यकर्ता शकील हुसैन
चचा, कुलदीप खन्ना, आनन्द मोहन गुप्ता एडवोकेट, विधायक राहत मौलाई के
नौजवान बेटे असद मौलाई,  कटघर में पत्रकार अखिलेश शर्मा, कामरेड रामकृपाल
शर्मा, पत्रकार हुमायूं कदीर आदि की मदद से दंगे की मिलने वाली सूचनाओं
के आधार पर कवरेज में जुटे।

कर्फ्यू की वजह से शहर में सन्नाटा था। लगातार कर्फ्यू से लोग बेहाल थे।
जिस शहर के गली-मोहल्ले, चौराहे देर रात लोगों की बतकही और गर्मागर्म
बहस- मुबाहिसों से गुलजार रहतों हों उस शहर के बाशिंदे घरों में कैद रहते
भी कैसे। लोग बेचैन थे। अखबार भी घरों ते नहीं पहुंच रहे थे। तब अमर
उजाला को उन होमगार्डों की मार्फत गली मोहल्लों तक अखबार पहुंवाया गया,
जिनकी डयूटी पुलिस वालों के साथ शहरभर के चौराहों पर लगी थी।  दंगा, तो
पुलिस के एक इंसपेक्टर की कमअक्ली और जिला प्रशासन की नाकामी की वजह से
हुआ था। हुआ यह था कि मुरादाबाद में पोंटी चड्ढा के पुराने मकान के पास
शहर की ईदगाह थी। लंबा चौडा मैदान। यहीं ईद की नमाज होनी तय थी। सरकारी
अमला अपने इन्तजाम करके भरोसे की नींद सोया। अगले दिन नमाज अभी पूरी नहीं
हुई थी कि एक जंगली जानवर आगे बढा तो एक पुलिस के इंस्पेक्टर ने जानवर को
लाठी लेकर दौडाया। जानवर सीधा नमाजियों के बीच ऐसा पहुंचा कि कोहराम मच
गया। फिर क्या था, नमाजियों ने अपना विरोध जताया और पुलिस के हाथ में लाठी
थी ही। प्रशासन ने अपनी जान बचाने की नीयत से इसे सांप्रदायिक दंगे का
नाम दे दिया।

बहरहाल, सुनील ने दंगे की संयमित और बेखौफ कवरेज की और करीब एक महीने बाद
जब प्रशासन की तरफ से हालात काबू में थे तो शहर पटरी पर। मुरादाबाद के
दस्तकार रोजी रोटी की तलाश में सडकों पर आ चुके थे। तब सुनील कैमरा इन
मजलूम, लुटे पिटे, बेजार दस्तकारों की हिमायत में और उमेश प्रसाद कैरे के
कदम इन्ही लोगों की बस्तियों की तरफ मुडे, जो पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों
के खौफ से संभल रोड पर करूला नाले के उस पार जा छिपे थे। 

मुरादाबाद में दंगे की कवरेज करने वाले अखबारनवीसों पर प्रशासन की पैनी
नजर थी। चूंकि दंगा जिला प्रशासन की नासमझी से हुआ और इसे सांप्रदायिक
रंग दे दिया गया था। चूंकि इस तरह के दंगों की कवरेज के लिए प्रशिक्षण की
न पहले व्यवस्था थी और न अब। इसलिए सभी पत्रकार यह मानकर खबरें लिखते कि
किसी तरह से अमन कायम हो। किसी की भावनाएं आहत न हों। बरेली से अमर उजाला
प्रबंधन की बैठक में अशोक अग्रवाल, अतुल माहेश्वरी तथा राजुल माहेश्वरी
ने तय किया कि अमर उजाला किसी भी फिरके का नाम नहीं छापेगा। दंगे में
मारे गए लोगों की तादाद छापी जाएगी लेकिन नाम या जाति नहीं।

दंगों के दौरान रोजाना मुरादाबाद कोतवाली में पुलिस अमन की सरकारी
कोशिशों और तनाव के बावजूद स्थिति नियंत्रण में होने की क्रमशः जानकारी
के लिए अखबारनवीसों को जानकारी देती। कोतवाली में उमेश प्रसाद कैरे, डा
राजेश श्रोत्रिय, कुंवर बहादुर जौहरी, अरविन्द मिश्र नारद, हरमहेन्द्र
सिंह बेदी, हुमायूं कदीर, उर्दू दैनिक गरज के संपादक सरफराज अहमद, सुनील
छइयां आदि जुटते। एक दिन सभी अखबारनवीस कोतवाली में थे। बातचीत के दौरान
डा श्रोत्रिय की हिन्दुस्तान में छपी खबर पर बहस इस सीमा तक जा पहुंची कि
प्रशासन का पक्ष अनसुना कर पत्रकार कोतवाली के बाहर निकल आये। बाहर तो
कर्फ्यू था ही।

तब, मुरादाबाद कोतवाली से लेकर गंज गुरहटटी तक के इलाके के मुख्य बाजार
की दुकानों के ऊपर तवायफों के कोठे थे। अभी पत्रकार अपनी बातचीत में उलझे
हुए थे कि कुछ पुलिस वाले कोतवाली के बाहर ऊंघते नजर आए। फोटो खींचने के
लिए सुनील छइयां को पुकारा तो छइयां इस मंडली से गायब। सभी मिलकर छइयां
का बेचैनी से इन्तार करने लगे। लंबे इतजार के बाद देखा तो सुनील छइयां एक
तवायफ के कोठे से लगभग लजाते हुए उतरते नजर आए। अरविन्द मिश्र नारद ने
बिना देर किए जुमला उछाला- निपटा आए, बहुत खूब।

बिना किसी हील हुज्जत के छइयां ने भी जवाब दिया-हां। क्या बहुत देर लगा
दी मैंने। माफ करना आप लोगों को मेरी वजह से इन्तजार करना पडा। देर तक
यही चर्चा का विषय रहा और बात आयी गई हो गई।

अगले दिन सुनील छइयां ने अमर उजाला में पूरे एक पन्ने पर कफर्यू के दौरान
तवायफों के दर्द की जो दास्तान लिखी, उसे मैं आज भी उनकी श्रेष्ठ सचित्र
कवरेज मानता हूं। इस कवरेज में छइयां की संवेदनशीलता, उनके इन्सान दोस्त
होने और उस नजरिये का सहज आभास मिला जो प्रशिक्षण प्राप्त अखबारनवीसों
में भी कम ही मिलता है। लगा वक्त की नदी एक अनघड पत्थर को आकार दे रही
है। मैं जब भी मिलता तो सुनील के कान में फुसफुसाता कहो निपटा आए। और वह
मुस्कराता कम, लजाता ज्यादा। छइयां की मुस्कान भी उसके फोटुओं की तरह से
दिलकश होती थी।

अमर उजाला में अशोक अग्रवाल और अतुल माहेश्वरी का बरेली में रहना कम ही
होता था। यह राजुल माहेश्वरी की प्रबंधकीय कौशल के होमवर्क के दिन थे।
अमर उजाला की तरफ से सुनील छइयां को सुजुकी मोटर साइकिल मुहैया करायी
गई। बाद में राजुल माहेश्वरी ने मुझे अपनी हीरो होंडा यूजीएल 7711 सौंप
दी। तब पेट्रोल के दाम थे छह रुपये दो पैसा लीटर। दोनों ही न केवल
मुरादाबाद जिले में बल्कि आसपास के जिलों कस्बों तक में कवरेज के लिए
दौडते। एक बार सुनील छइयां को सुबह के अखबार के साथ राजुल माहेश्वरी का
संदेश लिखा लिफाफा मिला। संदेश था- ”बदायूं मुरादाबाद की सीमा पर किसी गांव
में एक ही साथ सात-आठ कंकाल मिले हैं। पारस को साथ लेकर सचित्र कवरेज की
जा सकती है।” बदायूं में अमर उजाला के तत्कालीन प्रभारी मुन्ना बाबू शर्मा
का बदायूं जिला मुख्यालय से दूरी के कारण मौके पर पहुंचना आसान न था।
छइयां ने मुझसे बात की और शर्त रखी कि एक ही वाहन यानी सुजुकी से ही
चलेंगे और वही चलाएंगे भी। सुबह हम बिलारी, चंदौसी, इस्लामनगर होते हुए
खेजते हुए मौके पर पहुंचे तो दोपहर हो चुकी थी। गांव वालों, चरवाहों और
ग्राम प्रधान के साथ इलाके की पुलिस से बातचीत और एक दर्जन फोटो लेकर हम
मुरादाबाद की तरपफ चले। सूनसान इलाका था। दोपहर बाद उमड घुमड कर बादल आये
और बिजली कडकने लगी। चारों तरफ खेत और सन्नाटे से घिरी सडक। तेज बारिश ने
हमें एक पुराने भारी-भरकम पेड के नीचे रुकने को मजबूर कर दिया। अचानक
सुनील बोला- इस पेड के नीचे भीग सकते हैं। चलो, सडक पार वाले पेड के नीचे
जाकर सिर छिपाते हैं। वहां पहले से तीन चार राहगीर खडे थे। हमने ऐसा ही
किया।

अचानक बादल गरजे। बिजली चमकी। और देखते ही देखते बिजली उस पेड के ऊपर आ
गिरी, जिसके नीचे कुछ देर पहले तक सुनील और मैं खड़े हुए थे। बाद में हम
मिलते तो यह मंजर याद कर सिह जाते। इसके बाद सुनील ने सुजुकी स्टार्ट की
और हम मुरादाबाद के लिए भीगते हुए चल दिए। उसे कवरेज और फोटो बरेली भेजने
की बेचैनी थी। छइयां की यही बेचैनी, काम के प्रति ललक और वक्त की पाबंदी
उसे अपने साथियों से अलग मुकाम देती है।

मुरादाबाद के 1980 के दंगे का दाग शहर के चेहरे से मिटने लगा था। फिजा
में तनाव था ही। रात को कुछ शरपसन्द लोग अचानक किसी मोहल्ले से अल्लाह हो
अकबर की सदा बुलन्द करते तो जवाब में हर हर महादेव का जयघोष सुनकर लोग
सिहर जाते। मुख्तसर यह कि शहर में अम्न ओ अमान था और जेहन में दंगा चल
रहा था। शरपसन्दों की इन हरकतों से शरीफजादे और पुलिस प्रशासन, दोनों
परेशान थे।

इसी बीच शहर के रंगकर्मियों ने पीतलनगरी मुरादाबाद में नुक्कड नाटकों से
शहर में अमन के संदेश और नौजवानों को दंगों की सियाह खंदक से बाहर लाना
तय किया गया। मुरादाबाद यूं भी रंगकर्मियों की नर्सरी है। दिल्ली में
पचास से ज्यादा बडे मंचों पर मुरादाबाद के ही गैरपेशवर कलाकार रामलीला का
मंचन करते हैं। तय किया गया कि पहला नुक्कड नाटक टाउन हाल के सामने होगा।
तब टाउन हाल के सामने काफी जगह थी। दोनों तरफ गेट नहीं लगे थे। पहला
नाटक, शायद प्रयास संस्था की तरफ से हुआ- गिरगट।

नाटक के सूत्रधार बने सुनील छइयां ने एक दायरे में घूम घूम कर उपस्थित
दर्शकों से नाटक की कहानी को संक्षेप में बताया और अमन कायम करने के लिए
इसे एक विनम्र प्रयास बताया। नुक्कड नाटक देखने के लिए उमेश प्रसाद कैरे,
अरविन्द मिश्र नारद, अखिलेश शर्मा, डा संतोष गुप्ता, हुमायूं कदीर,
सरफराज अहमद, हरि कुमार पाठक, अखिलेश शर्मा, सुरेन्द्र शर्मा उर्फ मुन्ना
गुरु के अलावा राधाकृष्ण पूर्वी, सर्वेश कुमार सिंह, जय किशन पूर्वी, डा
रामू, आरपी मिश्रा, के अलावा कमलेश कुमार, शमीम छइयां, शकील अहमद चचा,
मनोज रस्तोगी आदि पत्रकारों के अलावा अंतरराष्ट्रीय शायर मंसूर उस्मानी,
वरिष्ठ रंगकर्मी बलबीर पाठक, मदन कबीर, डा प्रदीप शर्मा, तुलसीराम,
रामसिंह चित्रकार के साथ सुनील के करीबी दोस्त आशेन्द्र कुमार मुन्ना
अपने पिता महेन्द्र कुमार अग्रवाल के साथ नाटक देखने पहुंचे । सुनील के
छोटे भाई अखिलेश कुमार भटनागर तो नाटक देखने वक्त से पहले ही पहुंचे थे।
कभी दिल्ली के रामलीला मैदान पर राम का किरदार निभा चुके धन सिंह
धनेन्द्र, राकेश कुमार, रमेश कुमार आदि ने गिरगिट के माध्यम से सामाजिक
विसंगतियों पर चोट की तो नुक्कड नाटक के विभिन्न प्रसंगों को छायाकार के
नाते सुनील छइयों के साथ ओपी रोडा और आरके राजू ने अपने कैमरों में कैद
करने में कोई कोताही नहीं की।

नुक्कड नाटक खत्म होते ही टाउनहाल परिसर में मौजूद सत्य प्रकाश गुप्ता
ने आग्रह किया कि यह सिलसिला जारी रहना चाहिए। सत्य प्रकाश गुप्ता का
टाउन हाल पर न्यूज कार्नर था। दुनियाभर की किताबें और अखबार मंगाने वाले
वह इलाके के बडे और पुराने ऐजेन्ट थे। मजबूत वितरण व्यवस्था के बल पर
उन्होने जो विनम्र साख बनायी, उसी के नाते उनका न्यूज कार्नर , पीतल नगरी
के रिपोर्टरों और प्रेस फोटोग्राफरों का अडडा बन गया । गुप्ता जी की
गैरमौजूदगी में उनके बेटे शिशुपाल गुप्ता और विपिन गुप्ता सभी
अखबारनवीसों को बिना चाय पिलाए जाने न देते। हम आपसी बातचीत में गुप्ता
जी के न्यूज कार्नर को सचल प्रेस क्लब कहते। किसी भी पत्रकार की लोकेशन
का पता गुप्ता जी सहजता से बता देते थे। बाद में गुप्ता जी आग्रह पर
युगबंधु के संपादक कमलेश कुमार अग्रवाल ने सभी की राय से सहमति जतायी और
पीतल नगरी में नुक्कड नाटकों का सिलसिला जारी हो गया। समाज की बेहतरी के
लिए किये जाने वाले किसी भी तरह के प्रयास में सुनील छइयां की यह
रचनात्मक और विनम्र पहल थी। वक्त उनकों गढ रहा था और वह पफोटोग्रापफी के
साथ समाचार लेखन और नाटकों की मार्फत अपने किरदार को ढाल रहे थे।
मुरादाबाद टाउनहाल इलाके के इसी न्यूज कार्नर पर मेरी और सुनील छइयां की
पहली मुलाकात मनोहर कहानिया और सत्यकथा के चर्चित लेखक पुष्कर पुष्प से
हुई। उन दिनों इलाहाबाद से छपने वाली इन दोनों ही पत्रिकाओं का सभी को
इन्तजार रहता। पुष्कर पुष्प का मूल निवास अमरोहा के नजदीक का पीलाकुड
गांव है।

अमर उजाला ने अपने विस्तार क्रम में मेरठ को चुना। दैनिक जागरण वहां पहले
ही छपना शुरु हो गया था। नवभारत टाइम्स का पश्चिमी उत्तर प्रदेश संस्करण
छपने लगा था और राजन्द्र माथुर जी भाई इब्बार रब्बी जी और महरुददीन खां
को इस संस्करण की कमान सौंप दी थी। लिहाजा अमर उजाला भी मेरठ पहुंचा तो
मुरादाबाद से बतौर रिपोर्टर फोटोग्राफर सुनील छइयां को भी मेरठ लांचिंग
टीम का हिस्सा बनाया गया। अतुल माहेश्वरी जी ने सुनील से कहा- कल मेरठ
पहुंचना है। और सुनील मुस्कराते हुए मेरठ की क्रांतिकारी जमीन पर। अभी
अखबार छपना प्रारंभ नहीं हुआ और सुनील मेरठ के गली- मोहल्ला में अपनी
मौजूदगी दर्ज कराने लगा। मुरादाबाद से सुनील छइयां के जाने से उमेश कैरे
और मैं तो उदास थे ही, सुनील के 18 घंटे के साथियों में शमीम छइयां, शकील
हसन चचा, अशोक मेहरोत्रा, कमलेश कुमार, अरविन्द मिश्र नारद, हरमहेन्द्र
सिंह बेदी, जैसे अखबारनवीस भी लगता था जैसे उजाड दिए गए हों।

संयोग है कि अमर उजाला मेरठ से छपना शुरू हुआ और कुछ ही दिनों में मेरठ
में दंगा हो गया। सुनील छइयां को मुरादाबाद के 1980 दंगों का अनुभव था
ही। सो कैमरा और कलम, दंगाइयों की गोलियों और अफवाहों पर भारी पड़ा। मेरठ
अमन की चादर ओढकर बैठा तो अमर उजाला का प्रसार दूसरे अखबारों को चुनौती
देता नजर आया। फिर वक्त ने करवट बदली। अमर उजाला में भी कई तब्दीलियां
हुईं और सन 2000 आते आते अखबारी दुनिया एक ऐसे मुनाफे की मंडी के मुहाने
जा पहुंची जहां रिश्तों के लिए फुटपाथ भी नहीं होता। बाजार रिश्तों से
नहीं, पैसों से चलता है। और एक दिन सुनील ने अतुल माहेश्वरी की
गैरमौजूदगी में अमर उजाला को अलविदा बोला और उसी सडक पर आ गया था जिस पर
चहलकदमी करते हुए वह सुनील कुमार भटनागर से सुनील छइयां बना था।

इस दौरान मैंने भी अमर उजाला का दामन छोडा और मुरादाबाद से दैनिक
स्वतंत्र भारत की लांचिंग टीम का हिस्सा बना, जिसकी बागडोर मनोज तिवारी
को सौंपी गई थी। मनोज तिवारी ने स्वतंत्र भारत की टीम में अरुण अस्थाना,
सुफल भटटाचार्य, विवेक पचैरी, उदय यादव, जावेद बख्तियार, मत्स्येन्द्र
प्रभाकर, मनोज रस्तौगी, जोगेन्द्र राजपूत, अखिलेश शर्मा व अन्य
अखबारनवीसों को जोडकर जो अथक प्रयास किए उसी ने अमर उजाला को कुमाउं के
जिलों तक में चुनौती दे दी।

मैंने फिर मुरादाबाद छोडा और स्वतंत्र भारत के लखनऊ संस्करण में
अपना योगदान दिया जहां नवीन जोशी, अनूप श्रीवास्तव, जयप्रकाश शाही, राकेश
शुक्ला, ताहिर अब्बास, अशोक पांडे, जगदीश जोशी , रवि वर्मा, रजनीकान्त
वशिष्ठ, काशी यादव, रवीन्द्र जायसवाल, आशुतोष शुक्ला, गोमती प्रसाद
निराला, जय प्रकाश गौतम, कुवर राज शंकर, नन्द किशोर श्रीवास्तव, विनोद
श्रीवास्तव, योगेन्द्र कुमार लल्ला आदि पहले से प्रधान संपादक घनश्याम
पंकज तथा संपादक ज्ञानेन्द्र शर्मा के साथ मौजूद थे। बहरहाल, 1996 में
हिन्दुस्तान दैनिक की लखनऊ लांचिग टीम का हिस्सा बना और अनततः दिल्ली
एचटी हाउस जा विराजा।

इसी दौरान सुनील से संवाद तो हुआ लेकिन औपचारिक। फोन पर जी भरकर बातें
संभव भी नहीं थीं। एक दिन सुनील ने प्रभात के समूह संपादक होने की खबर
दी। बाद में सुनील के आग्रह पर मैं इस अखबार के लखनऊ संस्करण का संपादक
बना तो सुनील और हमने कई सपने बुने। इसी बीच एक दिन खबर मिली कि सुनील को
ब्रेन हैमरेज हो गया और हालात बेकाबू हैं। दिल्ली में उपचार और आपरेशन के
दौरान मेरा छइयां के छोटे भाई अखिलेश से संपर्क बना रहा। अस्पताल में
मिला तो सुनील ने हर बार इशारों में भरोसा जताया कि एक दिन वह चंगा होकर
सभी के बीच खडा होगा।

इस दौरान महंगे इलाज की भरपाई के लिए मैंने सुनील के अस्पतालों के खर्च
और दरख्वास्तों के साथ सत्ता के दरवाजे पर हरचंद कोशिश करके दस्तक दी।
मदद के लिए सरकारी दरवाजे किसी ने नहीं खोले। शायद इसीलिए कि सुनील न तो
दलित था, न मुसलमान और न यादव। सुनील अखबारनवीसों के सत्ता के साथ उस
गठजोड का हिस्सा भी नहीं था जहां दोनों एक-दूसरे की मदद करते हैं। वह तो
ईमानदारी से अखबारनवीसी करता रहा था। उसे खुद पर भरोसा था और ईश्वर पर
भी। सुनील छइयां को  यकीन था कि वह अपनी पुरानी जिन्दगी फिर पा लेगा।
जिन्दगी की इस खुरदरी हकीकत से वह शायद वाकिपफ नहीं था कि जिन्दगी
आखिरकार मौत से हाथ मिला लेती है।

मैं सुनील के लिए सिर्फ और सिर्फ यही कह सकता हूं।

वोह तो बता रहा था कई रोज का सफर।
जंजीर खींचकर जो राह में उतर गया।

इस संस्मरण के लेखक पारस अमरोही ने हिन्दी अखबारनवीसी के 1974 से कई रेगिस्तान, नदियों, घाटियों को पार किया है। अमर उजाला, असली भारत, बिजनौर टाइम्स, स्वतन्त्र भारत, हिन्दुस्तान के बाद वर्तमान में प्रभात दैनिक लखनऊ के संपादक हैं। Paras Amarohi से संपर्क के लिए parasamrohi@gmail.com पर मेल करें।


मूल खबर…

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