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आज के अखबार : सुप्रीम कोर्ट के रुख, हाईकोर्ट की टिप्पणी यानी ‘जनता’ की नाराजगी का मतलब है!

ऐसे में सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच के खिलाफ कार्रवाई हो या नहीं आम जनता को क्या मतलब और अगर उन्हें सक्रिय होना हो जो शेयर बाजार में सक्रिय हैं तो उन्हें परेशानी कहां है। वे तो संबंधित कंपनियों से अलग हो सकते हैं या फिर भी उससे कमाते रह सकते हैं। मामला, ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का होता जा रहा है और आम आदमी की हालत खराब ही हो रही है। पहले यह बहुत शक्तिशाली लोगों के लिए सही था अब कुछ आम लोग और सत्ता के चाटुकार भी गरीबों, अशिक्षितों, दलितों और पिछड़ों के मुकाबले बहुत मजबूत हैं। 

संजय कुमार सिंह

महाराष्ट्र के बदलापुर में बच्चों के यौन उत्पीड़न पर पुलिस के ढीले-ढाले रवैये के खिलाफ बांबे हाईकोर्ट ने कहा है कि जब तक जनता का गुस्सा जोर से नहीं फूटेगा, मशीनरी काम नहीं करेगी। क्या जनता की नाराजगी ऐसे नहीं फूटेगी तो सरकार भी कार्रवाई नहीं करेगी।? आज यह द टेलीग्राफ का कोट भी है और जाहिर है बांबे हाईकोर्ट ने कहा है तो बदलापुर और महाराष्ट्र के मामलों में ही कहा है। दूसरी तरफ बंगाल में डॉक्टर से बलात्कार और हत्या का मामला है जिससे जनता तो नाराज है ही, केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों ने पश्चिम बंगाल की गैर भाजपाई सरकार को परेशान, कमजोर और बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। पश्चिम बंगाल में आम जनता, सत्तारूढ़ तृणमूल, उसके विरोधी, भाजपाई और मीडिया के साथ-साथ आईएमए भी सरकार के खिलाफ है और उसका असर हुआ है। एक हफ्ते के अंदर, कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश पर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी है, उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और आवश्यक आदेश दिये हैं। आज की एक बड़ी खबर यही है कि सुप्रीम कोर्ट के शांति स्थापित कराने पर देश भर के राज्यों में डॉक्टर्स ने हड़ताल वापस ली (द हिन्दू का शीर्षक)।  

इस तरह, पश्चिम बंगाल में अगर भाजपा की सरकार नहीं है तो सब सक्रिय हैं और मुझे लगता है कि वहां के जागरूक समाज का ही असर है कि 12 घंटे में मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर लिये जाने, एक हफ्ते से भी कम में मामला हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई को सौंप दिये जाने के बावजूद पुलिस की खिंचाई हो रही है कि एफआईआर देर से हुई। कल आपने यहां पढ़ा कि उत्तर प्रदेश में एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो पीड़िता ने आत्महत्या कर ली बाद में पुलिस ने कहा कि उसके साथ बलात्कार या जबरदस्ती के सबूत नहीं मिले। हालांकि, आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया था। यह डबल इंजन वाला राज्य है और आज कल की उस खबर का फॉलोअप मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। भाजपा की सरकारों का विरोध देश भर में वैसे नहीं होता है जैसे भाजपा दूसरी पार्टियों की सरकारों का करती है। इसमें आम जनता भी आगे नहीं आती है। यह अलग बात है कि आम जनता शायद ही सक्रिय होती है। सक्रिय तो दलों और संगठनों में बंटे समूह होते हैं और उनमें आईएमए शामिल है।

यहां दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में एक डॉक्टर, नर्स और निजी अस्पताल तथा हरियाणा के रोहतक की पीजीआईएमएस से छात्रा को अगवा करने के दो मामलों का उल्लेख करते हुए मैंने पूछा, यहां आरोपी डॉक्टर हैं तो आईएमए चुप रहेगा या सिर्फ बंगाल के मामले में सक्रिय होता है? ये मामले आईएमए के तहत नहीं आते? भक्तों के लिए नहीं हैं? इनके लिए कोई कोर्ट क्यों नहीं जाता? तो (एक्स पर) मुझे बताया गया कि उत्तर प्रदेश का मामला एमबीबीएस डॉक्टर का नहीं है। भाजपा समर्थित एक पोर्टल की खबर के हवाले से बताया गया कि संबंधित डॉक्टर शाहनवाज (मैं जानबूझकर नाम लिख रहा हूं) बीएयूएमएस यानी बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मिडिसिन एंड सर्जरी के डिग्री धारक हैं और वे डॉक्टर नहीं हैं। उत्तर प्रदेश का मामला है, सामान्य स्थितियों में नाम काफी होता है पर मुझे लगता है कि यहां मकसद आईएमए का बचाव करना था। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बहुत बड़े स्तर पर नहीं हो रहा था और संगठन का मामला नहीं है, आम आदमी भी भाजपा समर्थकों का इतना ख्याल रखता है।

इससे आप समझ सकते हैं बंगाल के मुकाबले हिन्दी पट्टी और यहां के लोगों की दशा कितनी खराब है लेकिन कानून की नजर में सब बराबर हैं और वही हो रहा है। आईएमए ने इस बलात्कार और हत्याकांड का विरोध करते हुए अपने काम करा लिये जिसका फायदा देश भर में चिकित्सकों को तो होगा ही आईएमए को भी होगा। बिहार जैसे राज्यों में जहां सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर होते ही नहीं है वहां की जनता जागरूक होती तो इसके लिए लड़ रही होती पर अब जो स्थितियां हैं उसमें मुख्यमंत्री पलटू राम बनें रहें, अस्पतालों में इलाज हो या बलात्कार जनता सक्रिय नहीं होगी तो कुछ नहीं होगा। बिहार में बलात्कार के बाद हिन्सा के मामले में लगभग सन्नाटा है और कोलकाता या बदलापुर जैसी स्थिति तो नहीं ही है। दूसरी ओर, कहने वाले कह रहे हैं कि आरोपी यादव है इसलिए तेजस्वी विरोध नहीं कर रहे हैं। मुझे नहीं पता है कि बंगाल के आरोपी संजय राय की जाति क्या हुई और विरोध करने वाले भाजपा या आईएमए प्रमुख की जाति क्या थी। कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि जो कमजोर हैं, बंटे हुए हैं उनके लिए कुछ नहीं है।

जहां तक बंगाल में बलात्कार और हत्या का मामला है, स्थानीय पुलिस ने जो जांच की थी सीबीआई उससे आगे नहीं बढ़ पाई है। लेकिन आज के अखबारों में पहले पन्ने पर कई खबरें उससे संबंधित हैं। कुछ से राज्य सरकार और पुलिस की ढिलाई का पता चलता है पर ऐसी खबरें हिन्दी पट्टी की पुलिस और उसकी ढिलाई के मामले में नहीं आती है। कारण कई हैं। एक डबल इंजन की सरकार होना भी हो सकता है। कम से कम उसकी सरकार होने के कारण विपक्षी दल वैसा विरोध नहीं कर रहा है जैसा कलकत्ता में हुआ। मुख्य रूप से इसके जरिये यह संदेश दिया जा रहा है कि यादवों की सरकार यादवों के खिलाफ काम नहीं करेगी और यह इतना रणनीतिक तथा चतुराई भरा है कि डॉ. शाहनवाज को छोड़कर आईएमए का बचाव ज्यादा महत्वपूर्ण है। सामान्य तौर पर डॉक्टर शाहनवाज के खिलाफ कार्रवाई हो जाती, संभव है हुई भी हो और यह कहा जाना चाहिये था कि कार्रवाई हुई है। पर मुद्दा कार्रवाई नहीं है, आईएमए का बचाव है। सेबी और उसकी प्रमुख माधवी पुरी बुच के मामले में लोग कहते हैं कि भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस को भी ऐसा ही होना होगा। मेरा मानना है कि कांग्रेस ऐसी है नहीं और हो भी जाये तो उसके समर्थक ऐसे नहीं होंगे और होंगे भी तो ऐसे काम नहीं करेंगे।   

आइए, अब बंगाल मामले में आज के शीर्षक देखें। सबसे पहले इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है, अपराध की जगह से छेड़छाड़ हुई है, हमारी जांच एक चुनौती है। पीठ ने एफआईआर में देरी और कॉलेज प्राचार्य के स्थानांतरण पर सवाल किया। सीबीआई ने जो कहा है वह सुप्रीम कोर्ट से कहा है और आगे की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट करेगी पर सीबीआई का रिकार्ड हमलोगों को भी मालूम है और नोएडा का आरुषि हत्याकांड ऐसा ही एक उदाहरण है। तब भी पुलिस की जांच के बाद मौका ए वारदात को सामान्य छोड़ दिया गया था और सीबीआई मामले को नहीं सुलझा पाई। अगर भविष्य के लिए ऐसी कोई जरूरत थी तो सीबीआई को तब कहना चाहिये था। व्यवस्था (और मामले पर नजर रख रहे) लोगों को तब यह बात कहनी चाहिये थी और आगे के लिये नियम बनाना चाहिये था पर ऐसा कुछ नहीं हुआ है। ऐसे में स्थानीय पुलिस या अस्पताल प्रशासन या पुलिस ने अपने विवेक से काम किया तो वह गलत कैसे है। कानूनन दोषी हो तो सुप्रीम कोर्ट को तय करना है और वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है।

सरकार और संबंधित एजेंसियों को तब ऐसे नियम के लिए कार्रवाई करनी चाहिये थी। इसका पता इस बात से भी चलता है कि ममता बनर्जी ने इसकी जरूरत समझी तो कल प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी है। नवोदय टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के अनुसार मुख्यमंत्री ने मांग की है कि बलात्कार के दोषियों के लिए कठोर सजा के साथ सख्त केंद्रीय कानून बनाया जाये। यही नहीं, त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए 15 दिन के भीतर मुकदमे की सुनवाई पुरी होने का नियम भी होना चाहिये। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा है कि देश में रोज लगभग 90 बलात्कार की घटनाएं होती हैं। कई मामलों में बलात्कार पीड़ितों की हत्या कर दी जाती है। पत्र में नहीं है पर बिलकिस बानो के बलात्कारियों को तो बाकायदा जेल से छोड़ दिया गया, सम्मान हुआ और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोबारा जेल भेजा। पर ये सब तो इक्का-दुक्का मामले हैं। कानून और व्यवस्था ऐसी होनी चाहिये कि हर पीड़ित को न्याय मिले और हर अपराधी को सजा हो। कानून जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला नहीं हो सकता है। 

अपराध स्थल सुरक्षित नहीं होने की शिकायत औरों से अलग है और उसी लाइन पर है जो बंगाल पुलिस और तृणमूल को घेरने के लिए ली गई है। आप जानते हैं कि सीबीआई का राजनीतिक प्रयोग होता रहा है और बंगाल सरकार सीबीआई से जांच का विरोध करती रही है। इस बार मुख्यमंत्री ने स्थानीय पुलिस को अल्टीमेटम दिया था कि इतने समय में मामला स्पष्ट नहीं हुआ तो जांच का काम सीबीआई को दे दिया जायेगा। जांच का काम उससे पहले ही सीबीआई को दे दिया गया। आप जानते हैं कि मुख्य अभियुक्त को 12 घंटे के अंदर गिरफ्तार कर लिया गया था पर मामले में कई झूठ फैलाये गये और सब धीरे-धीरे गलत साबित हुए। इनमें एक आरोप घटना स्थल पर तोड़फोड़ का भी था। दूसरा आरोप पीड़िता के परिवार वालों को इंतजार करवाने का भी था। मुझे लगता है कि किसी भी वारदात के बाद घटना स्थल का निरीक्षण, आवश्यक सबूत और जानकारी इकट्ठी की जाती है। तस्वीरें ली जाती हैं, वीडियो ग्राफी होती है और उसके बाद घटना स्थल को सामान्य छोड़ दिया जाता है। घटनास्थल से छेड़छाड़ नहीं करने का मतलब तभी तक है तब तक जांच करने वाले अपना काम नहीं कर लें। कहने की जरूरत नहीं है कि घटना स्थल को अनंत काल तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता है और ना इसका बहुत मतलब है। अब अगर पुलिस ने यह काम कर लिया था, इसी कारण पीड़िता के परिवार वालों को इंतजार करवाया गया हो तो तोड़फोड़ हो ही सकती है लेकिन आरोप भी लगाया ही जा सकता है और यह वैसे ही है जैसे इलेक्टोरल बांड के लिए भाजपा पर आरोप नहीं है लेकिन शराब नीति के लिए आम आदमी पार्टी पर आरोप है। वहां सबूत है, यहां नहीं मिला है। पर दावा यह कि अरविन्द केजरीवाल अनुभवी चोर हैं। आप समझ सकते हैं कि स्थिति क्या है। 

द टेलीग्राफ में आज लीड के साथ बराबर में, सिंगल कॉलम में प्रकाशित एक खबर का शीर्षक है, उत्तर प्रदेश के झांसी में 17 साल की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार। उसके पिता और रिश्तेदार ने कहा कि पुलिस ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया तथा उनकी शिकायत स्वीकार करने में 12 घंटे लगाये। इस बीच दो आरोपी लापता हो चुके थे। आज कई अखबारों में खबर है कि कोलकाता मामले में एफआईआर में देरी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की खिंचाई की। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, केस से पहले एफआईआर कैसे? न्यायमूर्ति पारदीवाला के हवाले से कहा गया है, पूरी प्रक्रिया ऐसी है जो मैंने अपने 30 साल के करियर में नहीं देखी। अदालत के तीखे सवाल शीर्षक से प्रकाशित सवाल इस तरह हैं – क्या कारण है कि शव मिलने के लगभग 14 घंटे बाद प्राथमिकी दर्ज की गई, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉलेज के प्राचार्य को सीधे कॉलेज आकर प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश देना चाहिये था, वे किसके संपर्क में थे, इसका उद्देश्य क्या था? जैसे ही प्राचार्य इस्तीफा देते हैं उन्हें दूसरे कॉलेज का प्राचार्य नियुक्त कर दिया जाता है। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार अदालत ने हड़ताली डॉक्टर्स से कहा है कि वे काम पर लौटें, शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए कोई दमनात्मक कार्रवाई नहीं होगी।

मुख्य शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट उम्मीद करती है कि हड़ताल खत्म होगी, आरजी कार के डॉक्टर मानने के लिए   तैयार नहीं। खबर के अनुसार, आरजी कार के स्नातकोत्तर प्रशिक्षु और विरोध प्रदर्शन करने वालों में एक, अनिकेत महतो ने कहा, “मुख्य मांग डॉक्टर के बलात्कार और हत्या में शामिल सभी लोगों की गिरफ्तारी थी। लेकिन एक व्यक्ति को छोड़कर, अभी तक किसी और को गिरफ्तार नहीं किया गया है। न ही सीबीआई ने आगे आकर बताया है कि उसे क्या मिला है।” अदालत के लिखित आदेश में कहा है, “इस तथ्य के मद्देनजर कि इस न्यायालय ने 20 अगस्त 2024 के पिछले आदेश के संदर्भ में चिकित्सा पेशेवरों की चिंताओं को  संस्थागत रूप देना सुनिश्चित करने के लिए उपाय किए हैं, यह केवल उम्मीद की जा सकती है कि डॉक्टर अब काम पर लौटेंगे।” अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने राज्य सरकारों को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई भी कानूनी कार्रवाई करने से नहीं रोका है, लेकिन कहा कि जब तक विरोध शांतिपूर्ण है तब तक उनके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। न ही उन्हें अदालत के आदेश से पहले किए गए विरोध प्रदर्शन के लिए ऐसी कार्रवाई का सामना करना चाहिए। हालाँकि, पीठ ने यह निर्देश देने से इनकार कर दिया कि 9 अगस्त को कलकत्ता के आरजी कार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के बाद काम से अनुपस्थित डॉक्टर को उपस्थित माना जाए।

आप समझ सकते हैं कि अति उत्साह में तोड़फोड़ करने वालों को बचाव चाहिये और वह उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, बंगाल सरकार एक ऐसा मामले में घिर गई है जो दूसरे राज्यों में आम है। अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – 30 वर्षों में ऐसी लापरवाही नहीं देखी …. अपील के बाद काम पर लौटे डॉक्टर (यह आरजी कार के डॉक्टर के लिए नहीं है)। अमर उजाला में सरकारी वकील यानी सॉलिसिटर जनरल की दलीलों और पश्चिम बंगाल सरकार के वकील कपिल सिब्बल की बातचीत का भी विवरण है, सिब्बल हंसे तो मेहता ने कहा, कम से कम हंसिये तो मत। खबर के अनुसार मेहता ने कहा कि बेहद अमानवीय और असम्मानजनक तरीके से एक लड़की की जान गई है। मुझे नहीं पता कि सिबल क्यों हंसे पर लगता है कि मुद्दा यही है यानी मामला लड़की का नहीं, डॉक्टर का है। ड्यूटी पर हत्या और बलात्कार का है। वरना हत्या और बलात्कार तो होते रहते हैं और इसमें सम्मान और मानवीयता की उम्मीद करना ही हंसने वाली बात है। हालांकि, भाजपा के लोगों के पास हत्या में भी झटका और हलाल का मुद्दा है और वे किसी एक को अच्छा ठहरा सकते हैं और जो इसे नहीं मानेगा वह हंसेगा ही लेकिन शीर्षक लगाकर यह बताया जा सकता है कि फलां व्यक्ति हत्या और बलात्कार के मामले में हंस रहा था। पहले हमलोग समझते थे कि डेस्क पर काम करने वाला नाराज रहता है तो ऐसे काम करता है। अब लग रहा है कि यह मीडिया में संघ समर्थकों को प्लांट करने का भी असर हो सकता है।

द हिन्दू में आज यह खबर लीड नहीं है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट के शांति स्थापित कराने पर देश भर के राज्यों में डॉक्टर्स ने हड़ताल वापस ली। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है। सुप्रीम कोर्ट ने आरजी कार बलात्कार-हत्या की एफआईआर दायर करने में 14 घंटे की देरी को रेखांकित किया। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में स्वतः संज्ञान लेने के बाद हुई कार्रवाई की द टेलीग्राफ और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट विस्तार में है और सभी पहलुओं को ठीक से बताती है। हत्याकांड में प्रिंसिपल की भूमिका और उसे मिल रही प्रमुखता का मामला मुझे अभी तक नहीं समझ में आया था। आज की खबर से लग रहा है कि उन्हें आकर एफआईआर दर्ज करवाना चाहिये था और इसमें हुई देरी से शक होता है कि वे किसी से (संभवतः किसी को बचाने के लिए) निर्देश ले रहे थे। तृणमूल कांग्रेस के साकेत गोखले ने कल (गुरुवार को) एक्स पर कोई 800 शब्दो में अपनी बात रखी थी उसके साथ एनडीटीवी का आठ मिनट का एक क्लिप लगया था और पाठकों से उनके पांच मिनट की मांग की थी ताकि इस मामले फैलाये जा रहे फेक न्यूज का खुलासा हो सके। इसके पहले बिन्दु में यह स्वीकारोक्ति थी, हां, कुछ गलतियां हुई हैं। प्रचार्य का तबादला नहीं होना चाहिये था। उन्हें निलंबित किया जाना चाहिये था। प्राचार्य के ट्रांसफर के संबंध में निर्णय मुख्यमंत्री नहीं लेती हैं। जब इस चूक को मुख्यमंत्री के ध्यान में लाया गया तो प्राचार्य को काम से हटा दिया गया और आगे की जांच के बाद एक एसआईटी बनाई गई और उनके खिलाफ एफआईआर दायर की गई। उनसे पद से हटा भी दिया गया है। इससे यह तो पता चला कि उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होने की बात गलत है और उनके खिलाफ कार्रवाई हुई है। पर किसलिये यह समझ में नहीं आया। उसका पता आज सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जो खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रमुखता से छपी है उसी से समझ में आया।

इस तरह मैं यह कहना चाहता हूं कि कुछ अखबार जानबूझकर अफवाह तो फैलाते ही हैं, राजनीति भी करते हैं और सोशल मीडिया पर भाजपा की ट्रोल सेना है ही। इन सबके दबाव में कुछ पत्रकार भी निष्पक्षता दिखाने के लिए जल्दबाजी कर देते हैं और यही सब चल रहा है जो राजनीति का प्रभाव है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है – इस बलात्कार-हत्या मामले में कई लोग थे। अस्पताल के सेमिनार रूप में अपराध हुआ, प्रवेश पर सीसीटीवी कैमरा लगा था उसी से मुख्य अपराधी पकड़ा गया फिर भी बिना सबूत या किसी आधार के और भी अपराधी थे उन्हें बचाया जा रहा है। डबल इंजन वाले राज्यों में कैमरे होते ही नहीं है या काम नहीं कर रहे होते हैं और सब हो तो एफआईआर ही नहीं होती पर वह मुद्दा नहीं बनता। पढ़ते रहिये।

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