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आज के अखबार : सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला तथा तमाम प्रचार व विज्ञापन सिस्टम में भाजपाई घुसपैठ बता रहे हैं

ममता बनर्जी के भाषण की भाजपाई और अखबारी रिपोर्ट का अंतर चौंकाने वाला है। सरकारी खर्च पर नारी शक्ति वंदन से प्रतिबद्धता ममता बनर्जी से मुकाबले के काम आएगा। दक्षिण के तमाम चुनावी मुद्दे पहले पन्ने पर हैं – बंगाल सिर्फ टेलीग्राफ में।

चुनावी सभा में आए लोगों से ममता ने कहा कि जिनका नाम एसआईआर में कट गया है वे हाथ उठाएं तो इतने सारे हाथ देखकर ममता भी दंग रह गईं।

संजय कुमार सिंह

भारतीय जनता पार्टी असम, बंगाल और दक्षिण के राज्यों में चुनाव जीतने के लिए अलग रणनीति पर चल रही है। केरल में राहुल गांधी भाजपा और माकपा गठजोड़ पर प्रकाश डाल रहे हैं। देशबन्धु की यह लीड है तो दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है – वामपंथ में कुछ नहीं बचा है : राहुल ने  विजयन की आलोचना की और भाजपा माकपा गठजोड़ को रेखांकित किया। असली खेल भाजपा या प्रधानमंत्री ने किया है। एक साथ महिला शक्ति वंदन, महिला आरक्षण, संसद का विशेष सत्र, परिसीमन, दक्षिण के राज्यों को नुकसान नहीं होने जैसा आश्वासन सब परोस दिया गया है। इंडियन एक्सप्रेस में भी केरल भाजपा की खबर है। सबरीमाला मंदिर का मामला सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ सुनेगी और दि एशियन एज की लीड के फ्लैग शीर्षक के अनुसार, प्रधानमंत्री ने कार्रवाई का प्रण किया है। आप जानते हैं कि दक्षिण भारत में शिक्षा उत्तर भारत के हिन्दी पट्टी के मुकाबले ज्यादा है, आर्थिक स्थिति बेहतर है, मातृत्व और प्रसव के दौरान मृत्यु दर के मामले में केरल देश के सबसे बेहतर राज्यों में है। इसलिए कहा जाता है कि भाजपा दक्षिण के राज्यों में नहीं जीतती है। प्रधानमंत्री अगर दक्षिण में जोर लगा रहे हैं तो खुद जीतें या न जीतें चाहते होंगे कि कांग्रेस न जीते ताकि यह संदेश नहीं जाए कि भाजपा के लिए दक्षिण के राज्य जीतना मुश्किल है क्योंकि मामला शिक्षा का है। दिलचस्प यह है कि ऐन चुनाव के मुद्दे पर सबरीमाला मंदिर का मामला आज हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विवाद है। सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 2018 में इसपर फैसला दिया था और (अब) हर उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति है। अब पांच जजों की पीठ के चार-एक से बहुमत वाले फैसले पर पुनर्विचार होना है। खबर है कि 7 अप्रैल 2026 से भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता में 9 जजों की संविधान पीठ 2018 के पांच जजों की पीठ के बहुमत के फैसले की समीक्षा करेगी। केरल विधानसभा चुनाव के लिए नौ अप्रैल को मतदान है। सरकार ने आज ही नारी शक्ति वंदन पर प्रतिबद्धता का विज्ञापन छपवाया है। इन खबरों से संदेश यही जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार हो तो अदालत (हिन्दू) धर्म के मामले सुनती है। 2018 में सुन चुकी है और फिर सुनने को तैयार है।

यह वही सर्वोच्च अदालत है जिसने एनसीईआरटी की कक्षा आठ के पुस्तक में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ पर आधारित अध्याय पर गंभीर आपत्ति जताते हुए प्रतिबंध लगा दिया है। अदालत ने इसे संस्था की छवि धूमिल करने का “षड्यंत्र” बताया, जबकि आलोचकों ने इसे पारदर्शिता की कमी और सेंसरशिप के रूप में देखा। इस विवाद ने न्यायिक जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है। नतीजे में तमिलनाडु के कानून के एक छात्र ने लिखा, द सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया हैज नौ स्पाइन। एक छात्र भी समझ या मान रहा है कि सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई अधिकारों से आगे बढ़कर की गई और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर असर पड़ा। लेकिन मीडिया में इसकी चर्चा नहीं के बराबर है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्र को ई-मेल भेजकर कहा, “संस्थान की प्रतिष्ठा दांव पर है” या “अपने या विश्वविद्यालय के हित में इसे हटाए”। कारण यह बताया गया कि वकीलों, जजों और लीगल कम्युनिटी से कॉल/शिकायतें आ रही थीं। मुझे लगता है कि, विश्वविद्यालय का काम था कि वह इस पर चर्चा करवाता। शिकायत करने वालों को भी बुलाता। यह सब नहीं हुआ और इससे पता चलता है कि हमने देश को कैसा बना दिया है। हालांकि अभी यह मुद्दा नहीं है। अभी भाजपा के हित साधने वाले चुनावी मुद्दे हैं और इनमें संसद का विशेष सत्र भी है। इससे संबंधित खबर पहले पन्ने पर तो नहीं है लेकिन चुनावी मामले अलग-अलग अखबारों में छिट-पुट हैं और इतने हैं कि अखबार वाले भी कनफूजियाए लगते हैं।    

टेलीग्राफ की आज की रिपोर्ट भाजपाई प्रचारक अमित मालवीय की एक पोस्ट के उलट है। द टेलीग्राफ की खबर है, हटाए गत मतदाताओं के साथ दीदी का दिन। बेशक यह कल की खबर है और उस मौके की नहीं है जिसका वर्णन अमित मालवीय ने किया है। यह भी संभव है कि अमित मालवीय की पोस्ट (या चर्चित घटना) के बाद ममता बनर्जी ने रणनीति बदल दी हो। पर अब जो दिखाई दे रहा है वह ज्यादा गंभीर है और इसकी खबर को वैसी प्रमुखता नहीं मिली है जैसी मिलनी चाहिए। दूसरी ओर अमित मालवीय ने जो बताया है वह चुनाव आयोग का बचाव है। भाजपा का प्रचार तो कहा ही जा सकता है। अमित मालवीय ने एक वीडियो से साथ एक्स पर लिखा है, “ममता बनर्जी ने भीड़ से बार-बार पूछा कि क्या वे एसआईआर की लाइन में लगे थे, लेकिन उन्हें पूरी तरह से चुप्पी का सामना करना पड़ा। जब यह चुप्पी लंबी होती गई, उनकी झुंझलाहट साफ़ दिखाई देने लगी। उन्होंने दर्शकों से फिर सवाल किया, यह जानने के लिए कि कोई जवाब क्यों नहीं दे रहा है। इस अजीब पल को भांपते हुए, मंच पर मौजूद टीएमसी नेताओं ने दखल दिया और लोगों से हाथ उठाने का आग्रह किया। फिर भी कोई जवाब नहीं मिला…. अमित मालवीय का यह ट्वीट शुक्रवार, तीन अप्रैल का है और रात नौ बजकर आठ मिनट का समय दर्ज है। इसके उलट ‘हटाए गए’ मतदाता सूची के लोगों के साथ दीदी का एक दिन शीर्षक रिपोर्ट में स्नेहमय चक्रवर्ती और सौम्य दे सरकार ने लिखा है, इनायतपुर में तृणमूल प्रमुख के भाषण शुरू किए लगभग 12 मिनट हुए थे कि उन्होंने कहा: “आप में से कई लोगों के नाम एसआईआर के दौरान हटा दिए गए हैं। जिनके नाम हटाए गए हैं, कृपया अपने हाथ उठाएँ।” आगे की कतारों में बैठी आधी से ज़्यादा महिलाओं ने हाथ खड़े किए। उनके पीछे हाथों की एक और दीवार खड़ी हो गई। ऐसा लगा उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हो रहा हो, ममता ने इसे दोहराने के लिए कहा। उन्होंने कहा, “जिनके नाम हटा दिए गए हैं, वे अपने हाथ ठीक से उठाएँ”। इस बार भी नज़ारा कुछ अलग नहीं था।

ममता ने रैली की रिकॉर्डिंग कर रहे लोगों से कहा: “तस्वीरें ठीक से लो। इसे वीडियो पर रिकॉर्ड करो।” मानिकचक में 50 प्रतिशत से कुछ ज़्यादा आबादी अल्पसंख्यकों की है। इनायतपुर में यह बढ़कर 90 प्रतिशत तक पहुँच जाती है। 2021 में, तृणमूल की सावित्री मित्रा ने मानिकचक सीट लगभग 34,000 वोटों से जीती थी। इस बार, पार्टी ने मित्रा को हटाकर 23 अप्रैल के मुकाबले के लिए कविता मंडल को मैदान में उतारा है। एसआईआर शुरू होने से पहले, मानिकचक में 2,53,353 वोटर थे। 28 फरवरी को जारी शुरुआती “अंतिम” लिस्ट में 65,496 वोटर्स (26 प्रतिशत) को “जाँच के दायरे में” चिह्नित किया गया है। आप समझ सकते हैं कि क्या हो रहा है तथा चुनाव आयोग और भाजपा की कैसी मिलीभगत हो सकती है। मालदा में इसका विरोध हुआ तो सुप्रीम कोर्ट वैसे ही नाराज हुआ जैसे भ्रष्टाचार वाले अध्याय को लेकर हुआ था। मालदा डेटलाइन की इस खबर के अनुसार, ममता बनर्जी ने अपने भाषण के बीच में रुककर भीड़ से कहा: “कृपया अपने हाथ ऊपर उठाएँ।” वे देखना चाहती थीं कि लगभग 6,000 लोगों की उनकी ऑडियंस में से कितने लोग अब तक एसआईआर के बाद की वोटर लिस्ट से बाहर कर दिए गए हैं। उन्होंने जो देखा, उससे वह साफ़ तौर पर हैरान रह गईं। मालदा के अल्पसंख्यक-बहुल इलाके मानिकचक की रैली में भी आधे से ज़्यादा लोगों ने अपने हाथ ऊपर उठाए हुए थे। कुछ पल चुप रहने के बाद, ममता के पास एक ही सवाल था: “तो फिर वोट कौन देगा?”

एक तरफ तो एसआईआर और उसकी पक्षपाती रिपोर्टिंग है दूसरी तरफ संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है। कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने एक्स पर लिखा है, 16-18 अप्रैल को संसद बुलाने का प्रस्ताव शरारतपूर्ण है और इसका विरोध होना चाहिए। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में मतदान 23 अप्रैल (और पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल) को होना तय है। तमिलनाडु के 39 और पश्चिम बंगाल के 28 सांसद लोकसभा में विपक्ष की बेंचों पर बैठते हैं। 16-18 अप्रैल के दौरान वे अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पूरी तरह व्यस्त रहेंगे। अगर उन तारीखों पर संविधान संशोधन से जुड़े अहम बिल चर्चा और मतदान के लिए लाए जाते हैं, तो लोकसभा में मौजूद ये 67 सांसद उनमें कैसे हिस्सा ले पाएंगे और वोट कैसे डाल पाएंगे? मुझे शक है कि इसके पीछे की मंशा इन सांसदों को बाहर रखना है। यह मामला इसलिए गंभीर है कि आज अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया में सेकेंड लीड का शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने कहा – महिलाओं को सुनिश्चित करना चाहिए कि कोटा बिल निर्विरोध पास हो जाए। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है – प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा,  महिलाओं के कोटे के लिए संसद का विशेष सत्र 16 अप्रैल से है। इस सत्र का उद्देश्य कानून में संशोधन करके इसे 2029 के चुनावों से पहले लागू करना है। यही नहीं, प्रधानमंत्री ने परिसीमन और सबरीमाला का मुद्दा भी छेड़ा है। तैयारियां, ऑर्डिनेशन भी देखने लायक है। द हिन्दू का शीर्षक है, प्रस्तावित डीलिमिटेशन से सभी राज्यों को लाभ होगा। उपशीर्षक में अखबार ने लिखा है, मोदी ने इससे संबंधित चिन्ता को दूर करने की कोशिश पहली बार की है। दि एशियन एज की लीड का शीर्षक है – प्रधानमंत्री ने कहा,  दक्षिण में लोकसभा की सीटें कम नहीं होंगी। प्रस्तावित परिसीमन सभी राज्यों को सीधे लाभ देने के बजाय ज्यादा आबादी वाले राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) के लिए अधिक सीटों का लाभ ला सकता है। दूसरी ओर, जनसंख्या में कम वृद्धि वाले राज्यों (जैसे केरल, तमिलनाडु) के लिए सीटों में कम वृद्धि या स्थिरता का जोखिम हो सकता है। हालांकि, केंद्र सरकार का प्रयास है कि सीट वृद्धि से सभी राज्यों को प्रतिनिधित्व में सुधार हो। महिलाओं के लिए आरक्षण और परिसीमन से हिन्दी पट्टी में सीटें बढ़ने का फायदा भाजपा को होने की उम्मीद है।

भाजपा ने 2021 में होने वाली जनगणना तो अभी तक नहीं कराई है लेकिन परिसीमन और महिला आरक्षण का मुद्दा छेड़ दिया गया है। विपक्ष विरोध करे तो उसकी आलोचना की जा सकेगी और जल्दबाजी में पास हो जाए तो भाजपा को 2029 के चुनाव में लाभ मिलने की उम्मीद है। ऐसे में जल्दबाजी में संसद का विशेष सत्र ही नहीं बुलाया जा रहा है सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर का मामला भी सुना जाने वाला है। हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड है, सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले की सुनवाई के लिए पीठ घोषित की। सुनवाई मंगलवार से है। दि एशियन एज के अनुसार प्रधानमंत्री ने सबरीमाला मामले में कार्रवाई का आश्वासन भी दिया है। सोशल मीडिया में जब हर चुनाव के दौरान घुसपैठिया भगाने तथा पांच साल में सपनों का भारत बनाने वाला भाषण दिखाया जा रहा है तब पोस्ट हटवाने और अंकाउंट बंद करवाने में बेहद तेजी आई है। ममता बनर्जी को निपटाने की कोशिश आखिरी लग रही है। नारी शक्ति वंदन से प्रतिबद्धता का विज्ञापन इसके लिए भी किया गया हो सकता है। नवोदय टाइम्स की खबर और शीर्षक चुनावी नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री के उच्च विचारों का प्रचार है। सेकेंड लीड का शीर्षक है, नरेन्द्र मोदी ने कहा – पश्चिम एशिया में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा (उनकी) सर्वोच्च प्राथमिकता है। कांग्रेस प्रधानमंत्री के निशाने पर रहती ही है और वे इन तथ्यों को रेखांकित किए जाने से परेशान नहीं होते हैं कि केरल में भाजपा-माकपा का गठजोड़ है। यह वैसे ही है कि गोमांस विरोधी भाजपा की सरकार केरल में गोमांस का प्रबंध करने के लिए मजबूर है। उसका मकसद सत्ता में बने रहने से ज्यादा कुछ नहीं दिखता है। इसलिए कम से कम मैं मानता हूं कि भाजपा ने सत्ता में अच्छी खासी घुसपैठ कर ली है। इसका पता हिन्दी अखबारों की सेवा और खबरों से भी चलता है। अमर उजाला का शीर्षक है, कांग्रेस ने छीना हक, हम 2029 से लागू कराएंगे महिला आरक्षण। यह शीर्षक पीएम मोदी के हवाले से तो है ही। उपशीर्षक है, संसद के विस्तारित सत्र से पहले प्रधानमंत्री ने केरल से दिया बड़ा संदेश।    

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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