संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, खतरनाक कुत्तों को दे सकते हैं मौत … लोगों को बिना डरे जीने का अधिकार : सुप्रीम कोर्ट। उपशीर्षक है, लावारिस कुत्तों को सड़कों से हटाने वाले आदेश में कोई बदलाव नहीं। इसके साथ एक और खबर का शीर्षक है, आंकड़ों से पता चलती है समस्या की भयावहता, पशु जन्म नियंत्रण सही तरीके से लागू नहीं करने से बढ़ी समस्या। यही नहीं, अदालत ने यह भी कहा है कि सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट या जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले जमाने में नहीं जा सकते। एक खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, यदि कुत्तों के काटने की घटनाओं को बिना रोक टोक जारी रहने दिया गया, तो इसका परिणाम यह हो सकता है कि हम ऐसे दौर में लौट जाएं, जहां डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत नागरिक जीवन और सार्वजनिक जगहों पर प्रभावी रूप से लागू हो जाएगा। इसमें वही रहेगा या टिक पाएगा जो सबसे योग्य या मजबूत होगा। ऐसी स्थिति कानून के शासन से संचालित संवैधानिक लोकतंत्र के पूरी तरह विपरीत होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, संविधान ऐसे समाज की कल्पना नहीं करता है जहां बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर नागरिकों को सिर्फ शारीरिक शक्ति, संयोग या परिस्थितियों के भरोसे जीवित रहने के लिए मजबूर होना पड़े। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा जंगलों में होता है और समाज में व्यवस्था देखने के लिए राज्य मशीनरी होती है, उसकी संवैधानिक और वैधानिक जिम्मेदारियां हैं तथा इन्हें निभाने में विफलता के कारण आम नागरिकों को नुकसान होता है। इसलिए, कोर्ट ने कहा, वे अधिकारी, जिनकी यह ड्यूटी है कि वे कुत्तों से जगहों को सुरक्षित रखने के निर्देशों को लागू करें, उन्हें अपनी ड्यूटी निभाने के लिए उचित सुरक्षा का अधिकार होगा। इसके लिए उनके खिलाफ कोई एफआईआर या आपराधिक शिकायत दर्ज नहीं की जानी चाहिए।
मुझे लगता है कि इस आदेश में कुछ नया या अनूठा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है उसमें कोई चौंकाने वाली बात नहीं है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है तो खबर जरूर है लेकिन लीड बनाना असामान्य है। खासकर तब जब दूसरी महत्वपूर्ण खबरें हैं। उनकी खबरों पर आने से पहले बता दूं कि नवोदय टाइम्स, हिन्दुस्तान टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी यही खबर है। अंग्रेजी के इन दोनों अखबारों में अमूमन दिल्ली की खबरों को प्राथमिकता मिलती है पर आज की दूसरी खबरें कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। हालांकि, आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश देश भर के लिए है। हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, सार्वजनिक जगहों पर आवारा कुत्तों पर प्रतिबंध के मामले में सुप्रीम कोर्ट दृढ़ रहा। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड का शीर्षक है, “एक हफ्ते में दूसरी बार : पेट्रोल, डीजल की कीमत फिर बढ़ाई गई”। गौर तलब है कि एक हफ्ते में पेट्रोल, डीजल जैसी जरूरी चीजों की कीमत दूसरी बार बढ़ाने का मतलब है। ऐसा एक बार में नहीं बढ़ाने से लेकर दूसरी चीजों की कीमत पर असर होने और इस कारण जनता की नाराजगी से बचने के लिए भी किया गया होगा और इसलिए यह बड़ी खबर थी लेकिन सरकार की चाल या मजबूरी को रेखांकित करने का काम मीडिया कर रहा होता तो यह स्थिति आती ही नहीं। पर वह दूसरा मामला है।
इंडियन एक्सप्रेस में कुत्तों वाली खबर तो है ही, नीट के प्रश्नपत्र लीक होने से संबंधित खबर है और शीर्षक से लगता है कि नीट को अपने अंदर झांकने की जरूरत क्यों पड़ी यह बताया गया है। आप जानते हैं कि नीट के प्रश्नपत्र लीक होना और इस बार परीक्षा रद्द कर दिया जाना, 2024 में लीक होने पर परीक्षा रद्द नहीं करना, 2025 में लीक होने की खबर न होना लेकिन भाजपा नेता का सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करना कि उसके पांच करीबियों का नीट में चयन हो गया है और इस बार उसी को प्रश्नपत्र खरीदने के लिए गिरफ्तार किया गया है। ऐसे में इसमें कितनी खबरें होंगी और कितनी सूचनाएं उसका अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन पहले पन्ने पर खबरें दिख ही नहीं रही हैं या जो दिख रही हैं वे सीबीआई की कथित ‘कार्रवाई’ की होती हैं जबकि सीबीआई 2024 के मामले की भी जांच कर रही है और बिहार में जो कथित मास्टर माइंड पकड़ा गया था उसकी जमानत हो गई क्योंकि सीबीआई ने समय पर चार्जशीट दायर नहीं की। लीक में भाजपा नेताओं की भागीदारी, उसका लाभ भाजपा नेताओं के करीबियों को होना, एनटीए प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई तो छोड़िए ईनाम दिया जाना और सीबीआई के मुखिया के चयन में राहुल गांधी के विरोध के बावजूद पिछले प्रमुख को सेवा विस्तार दे दिया जाना बहुत कुछ कहता है। खासकर तब जब सीबीआई के प्रमुख की नियुक्ति करने वाली समिति में राहुल गांधी के अलावा दो सदस्य हैं – प्रधानमंत्री और सीबीआई प्रमुख। इसके बावजूद बात यहीं नहीं रुकी। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने भरी अदालत में बेरोजगार युवाओं को कॉकरोच और पैरासाइट यानी परजीवी कहा। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा था कि कुछ युवा जिन्हें पेशे (वकालत) में रोजगार नहीं मिलता, वे कॉकरोच जैसे होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इनमें से कुछ लोग मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई एक्टिविस्ट बन जाते हैं और सिस्टम पर हमला करना शुरू कर देते हैं। अदालत ने समाज के उन ‘परजीवियों’ का भी जिक्र किया जो व्यवस्था को नुकसान पहुंचाते हैं। यह टिप्पणी उस वकील को फटकार लगाते हुए की गई थी जो ‘सीनियर एडवोकेट’ का दर्जा देने के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट को निर्देश देने की मांग कर रहा था।
इस बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में भारी आक्रोश फैल गया। बढ़ते विवाद को देखते हुए, मुख्य न्यायाधीश कार्यालय ने स्पष्टीकरण दिया कि उनकी इस मौखिक टिप्पणी को मीडिया के एक वर्ग ने गलत तरीके से पेश किया था। उनका इशारा केवल उन लोगों की ओर था जो फर्जी और नकली डिग्रियों के सहारे सिस्टम में घुसपैठ करते हैं, न कि देश के सामान्य बेरोजगार युवाओं की ओर। यह सब इसलिए महत्वपूर्ण है कि फर्जी डिग्री का आरोप प्रधानमंत्री पर है और वकीलों की फर्डी डिग्री की जांच उसी सीबीआई से कराने की बात कही गई है जिसका मुखिया सरकार का पसंदीदा है और जो सीबीआई अरविन्द केजरीवाल को फंसाने में लगी हुई है। इसके लिए संबंधित जज के बच्चों को सीबीआई यानी सरकार की ओर से काम यानी पैसे दिए जाने के आरोप भी हैं। इसके बावजूद, द हिन्दू की मानें तो सरकार दिल्ली पुलिस के जरिए यूएपीए के मामलों में जमानत पर प्रतिबंध के प्रावधानों पर विचार के लिए सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच चाहती है। आज द हिन्दू की लीड यही खबर है। इसके अनुसार,एडिशनल सॉलिसिटर-जनरल एसवी राजू का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के 18 मई के उस फ़ैसले में, जिसमें ‘ज़मानत एक नियम है और जेल एक अपवाद’ के सिद्धांत को बरकरार रखा गया था, इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया गया कि यूएपीए के तहत ज़मानत पर लगी वैधानिक रोक के चलते ‘निर्दोष होने की धारणा’ पीछे रह जाती है। आप जानते हैं कि सरकार इस कानून का उपयोग विरोधियों को परेशान करने और जेल में रखने के लिए कर रही है। तथ्य यह है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो और सरकार द्वारा संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार यूएपीए के तहत गिरफ्तार किए गए लोगों में से दोषसिद्धि की दर बहुत कम है (अक्सर 3% से 5% के आसपास)। इसका मतलब है कि एक बड़ी संख्या में लोग सालों जेल में रहने के बाद निर्दोष होकर छूटते हैं। यूएपीए कानून के दुरुपयोग के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं
1. फादर स्टेन स्वामी: 84 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता स्टेन स्वामी को खराब स्वास्थ्य के बावजूद जमानत नहीं मिली। जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। उनकी स्थिति शुरू से ही खराब थी। स्वास्थ्य कारणों से उन्हें स्ट्रॉ की जरूरत थी और इसके लिए भी परेशान किया गया। बाद में उनके कंप्यूटर में सबूत ‘प्लांट’ करके उन्हें फंसाने का कहानी सामने आई।
2. न्यूज क्लिक के संपादक स्वामी प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित किया क्योंकि पुलिस ने गिरफ्तारी के आधार लिखित में नहीं दिए थे।
3. असम के एक पत्रकार को बिना चार्जशीट दो साल जेल में रखने के लिए हाल में सुप्रीम कोर्ट ने असम पुलिस को फटकार लगाई। कोर्ट ने इसे “भयावह”, “चौंकाने वाला” और “पूरी तरह से गैर-कानूनी” करार दिया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि यूएपीए जैसे सख्त कानून भी किसी को अवैध हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देते।
4. दिल्ली पुलिस चाहती है कि इस मामले को सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ तय करे तो निश्चित रूप से यह बड़ी खबर है और आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त है या अपने आदेश पर अड़ा हुआ है जैसी खबर से गंभीर और महत्वपूर्ण है। यही नहीं, यूएपीए कानून का दुरुपयोग भी हो रहा है। मुख्य न्यायाधीश कॉकरोच व पैरासाइट में फंसे हुए हैं वह भी बेमतलब तो मीडिया का काम था कि उन्हें सच्चाई बताता, खबरें देता। ऐसी खबरें इक्का-दुक्का ही मिलती हैं।
उदाहरण के लिए, द हिन्दू की एक अन्य खबर के अनुसार, छात्र नेता और एक्टिविस्ट उमर खालिद की 15 दिन की ज़मानत याचिका खारिज हो गई है। उमर खालिद ने यह ज़मानत अपने अंकल (चाचा/मामा) के अंतिम संस्कार में शामिल होने और अपनी बीमार माँ की देखभाल करने के लिए माँगी थी। दिल्ली की एक अदालत का यह फैसला मंगलवार को आया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में खालिद की ज़मानत याचिका खारिज करने के अपने ही फ़ैसले पर “आपत्ति” जताई थी। उमर खालिद को फरवरी 2020 में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की “बृहत्तर साजिश” रचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उसपर यूएपीए के तहत भी केस है। आप जानते हैं कि पर्यावरण और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पर भी यूएपीए के तहत मामला बनाया गया था। ठोस सबूतों के अभाव और सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक जांच के दबाव के चलते सरकार ने मार्च 2026 में यह मामला वापस ले लिया। उन्हें सितंबर 2025 में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने पाया कि सरकार द्वारा पेश किए गए भाषणों के अनुवाद और संदर्भ में भारी विरोधाभास तथा त्रुटियां थीं। अदालत ने इस पर गंभीर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट में अंतिम और निर्णायक सुनवाई से ठीक पहले 14 मार्च 2026 को केंद्र सरकार ने अपने आदेश को वापस ले लिया और उन्हें तत्काल प्रभाव से रिहा कर दिया। उधर, इंडियन एक्सप्रेस की लीड बिक्स सम्मेलन के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के भारत में होने की संभावना पर है। यह भी कुत्तों की खबर से महत्वपूर्ण लगती है। दि एशियन एज ने प्रधानमंत्री के दौरे और उससे संबंधित खबर को लीड बनाया है। हालांकि यह नई दिल्ली डेटलाइन से ही है। द टेलीग्राफ की लीड तेल की कीमत हफ्ते भर में दोबारा बढ़ने की खबर है। अखबार ने लिखा है कि इसका दर्द गरीब महसूस कर रहे हैं। शीर्षक है, तेल, खून, पसीना और आंसू। इससे जुड़ी खबर कम खतरनाक नहीं है। द टेलीग्राफ में भले यह सिंगल कॉलम है लेकिन देशबन्धु ने इसे लीड बनाया है। शीर्षक है, देश में आर्थिक तूफान आने वाला है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


