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आज के अखबार : द टेलीग्राफ और इंडियन एक्सप्रेस की खबरें बताती हैं कि दवाइयों के क्षेत्र में भारी गड़बड़ है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों को देखकर लग रहा है कि सरकारी हेडलाइन मैनेजमेंट के प्रभाव ने कई अखबारों को बेहद भौंडा और खबरों के मामले में बेहद घटिया बना दिया है। खबरों की गुणवत्ता घटने के साथ मैं पूरे अखबार से पहले पन्ने पर सीमित होता महसूस कर रहा था। अब लगता है कि सभी अखबारों के पहले पन्ने की लीड भी खास नहीं होती है। पूरे पन्ने पर कभी-कभी ही कुछ उल्लेखनीय मिलता है। ज्यादातर खबरें सोशल मीडिया पोस्ट जैसी होती है। हालांकि अब पीआईबी फैक्ट चेक से पता चलने लगा है कि खबर यहां हो सकती है। ज्यादातर अखबारों में यह विशेषता भी नहीं रही। आज मेरे नौ अखबारों में आठ लीड हैं और जो खबर दो अखबारों में है वह मौसम की है। मैं आठो लीड की बात करूंगा और आप पाएंगे कि खबर एक ही है। और वह द टेलीग्राफ की लीड है। इससे पता चलता है कि दवाइयों के क्षेत्र में सब ठीक नहीं चल रहा है। द इंडियन एक्सप्रेस ने भी आज दवाइयों के क्षेत्र की एक खबर दी है लेकिन यह लीड नहीं है पर दवाइयों के क्षेत्र में जो हो रहा है उसमें पहले पन्ने की खबर तो है ही। आज जो खबर सभी अखबारों में पहले पन्ने पर होनी चाहिए थी वह देशबन्धु और टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम में है। द हिन्दू में सेकेंड लीड है।

इसका शीर्षक है, असुरक्षित पानी से इंदौर में मरने वालों की संख्या बढ़कर 10 हुई; अधिकारी बर्खास्त। इससे संबंधित जो खबर नहीं छपी है वह है, कि इस बारे में केंद्रीय मंत्री कैलाश विजयवर्गीय  ने पूछने पर एनडीटीवी संवाददाता अनुराग द्वारी से जो कहा उसका 54 सेकेंड का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। उसे शेयर करते हुए अनुराग ने लिखा है, देश के सबसे साफ शहर में गंदा पानी पीने से 10 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जिस शख्स पर लोगों को साफ पानी पिलाने का जिम्मा है वो सवालों को फोकट का बता रहे हैं हमारे सवालों को “घंटे” में उड़ा रहे हैं। एनडीटीवी ने एक्स पर लिखा है, ‘तुम फोकट के प्रश्न मत पूछो..’। एनडीटीवी के पत्रकार ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाते हुए मंत्री कैलाश विजयवर्गीय से गंदे पानी से हुई मौत को लेकर सवाल पूछा, इस सवाल पर नेता जी जवाब देने के बजाय बदतमीज़ी पर उतर आए। कहने की जरूरत नहीं है कि 2025 में अगर इंदौर जैसे शहर में दूषित पानी पीने से 10 लोगों की मौत हो गई तो बड़ी खबर है। यह अलग बात है कि कैलाश विजयवर्गीय ने एक्स पर माफी मांगी है पर मुझे लगता है कि वह औपचारिकता है या राजनीतिक मजबूरी। लेकिन जो कहा उससे समस्या के प्रति मंत्री के नजरिए का पता चलता है। इसलिए यह खबर तो है ही लेकिन अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। 

मेरा मानना है कि आज जब लीड लायक खबर नहीं थी, सरकारी आदेश अगर होता है और आज नहीं था तो जनहित की खबर को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। इससे मौजूदा समय में जब जनहित उपेक्षित रह गया दिख रहा है और सरकार बिल्कुल सुनवाई नहीं कर रही है, पूछने पर मंत्री नाराज हो जा रहे हैं, संयम खो दे रहे हैं तब ऐसी खबरों को प्राथमिकता देकर सिस्टम पर यह दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन ज्यादातर अखबार सरकार का बचाव करते दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, भीषण सर्दी से हुआ नए साल का आगाज, घने कोहरे से ठहरी जिन्दगी। ठीक है कि यह बड़ी खबर है और गौर करने वाली बात है कि अमर उजाला ने सेकेंड लीड को लीड नहीं बनाया। हालांकि आम पाठकों को इससे फर्क नहीं पड़ता और लीड नहीं बनाना ज्यादा मायने नहीं रखता है। पहले पन्ने पर है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है। नवोदय टाइम्स की लीड भी मौसम की खबर है, सीजन का सबसे ठंडा दिन। सेकेंड लीड का शीर्षक है, नए साल का ‘मोदी मंत्र’ सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सरकार का प्रचार है और जब दूषित पानी से आज भी लोग मर रहे हैं, मंत्री सवाल पूछने पर घंटा बोल रहे हैं तो खबर मोदी मंत्र की नहीं, मोदी के तंत्र की होनी चाहिए थी। इसी तरह, एक और खबर है – घर से 5 करोड़ नकद और 8 करोड़ के आभूषण मिलने की। इसमें घर किसका था उसका नाम नहीं लिखा है। नकद को छोड़ दें तो जरूरी नहीं है कि यह सब अवैध ही हो या गलत ढंग से कमाया गया हो। लेकिन नाम नहीं बताने या बताने का नियम हर मामले में एक होना चाहिए।

वैसे भी, खबर वह नहीं होती है जो दी जाती है। खबर वह होती है जो छिपाई जाती है। इस खबर में अगर सरकारी अधिकारियों ने नाम नहीं दिया तो जाहिर है खबर उन्हीं ने दी होगी। नाम छिपाया जा रहा है तो खबर वही होगी। कायदे से बिना नाम इस खबर का कोई मतलब नहीं है। दूसरे अखबारों ने इसे प्राथमिकता नहीं ही दी है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे मामलों में ईडी का रिकार्ड बहुत खराब है और पुराने मामलों में धन बरामदगी या गिरफ्तारी को तो खूब प्रचार दिया गया है लेकिन मामला साबित नहीं हुआ और ऐसे ज्यादातर मामले सरकार विरोधियों के होते हैं। हाल में खबर थी कि इस सरकार को इंडिगो एयरलाइंस को इतनी मदद की या छूट दी कि भारतीय उड्डयन बाजार में उसका एकाधिकार हो गया है। हाल में उसकी उड़ान रद्द होने से जब अफरा-तफरी मची तो पता चला कि कर्मचारियों के हित में बनाए गए नियमों से एयरलाइंस को दिक्कत है और उसे इन नियमों को लागू करने में छूट दी गई। जब मामला फंसा तब भी सरकार को ही झुकना पड़ा और नियमों को लागू करने में फिर छूट दी गई। इसके बाद न्यूज18 डॉट कॉम की खबर के अनुसार, “देश के लाखों यात्रियों को नाको चने चबवाने वाली सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइन इंडिगो पर सरकार ने 458 करोड़ रुपये का जीएसटी जुर्माना ठोक दिया है। अब कंपनी ने कहा है कि सरकारी अधिकारियों ने उस पर जीएसटी जुर्माना लगाया है और वह इस फैसले को चुनौती देगी। कंपनी ने यह भी कहा कि जीएसटी विभाग का यह आदेश गलत है और कानून के अनुरूप नहीं है। लिहाजा अब इसके खिलाफ कानूनी कदम उठाया जाएगा।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह सरकार के काम करने का तरीका नहीं है और खबर यह होनी चाहिए थी कि सरकार इंडिगो को परेशान कर रही है या परेशान तो नहीं कर रही है। पर खबर सरकारी कार्रवाई के समर्थन में है। ऐसे में अगर इंडिगो को नुकसान हो, बंद हो जाए तो यह देश का (भी) नुकसान होगा। सरकार की कार्यशैली के कारण होगा। इसका ध्यान रखा जाना चाहिए खासकर तब जब देश की कोई सरकारी विमान सेवा नहीं है, पहले ही कई विमान सेवाएं बंद हो चुकी हैं और बेरोजगारी चरम पर है। देशबन्धु की आज की लीड चुनाव आयोग से तृणमूल कांग्रेस के प्रतिनिधि मंडल की मुलाकात की खबर है। देश भर में जिस ढंग से एसआईआर हो रहा है वह अपने आप में चौकाने वाला है। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस का चुनाव आयुक्त से मिल पाना या मिलना खबर है। और निश्चित रूप से बड़ी खबर है। मुलाकात के बाद अभिषेक बनर्जी ने कहा है कि चुनाव आयोग ने दो तीन को छोड़ किसी भी बिन्दु पर स्पष्टीकरण नहीं दिया और सवालों को घुमाते रहे। पूछा कुछ गया जवाब कुछ और मिलता था। अभिषेक बनर्जी ने समान विचारधारा वाली पार्टियों से सॉफ्टवेयर के जरिए की जा रही चुनाव चोरी को पकड़ने की अपील की है। मुझे लगता है कि यह खबर पर्याप्त गंभीर है लेकिन इसे आज मेरे किसी और अखबार में प्रमुखता नहीं मिली है।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने गए विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा उनके बेटे को मोदी की चिट्ठी दिए जाने की खबर को लीड बनाया है और इसी को शीर्षक बनाया है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर या शीर्षक सामान्य नहीं है। इससे लगता है कि विदेश मंत्री डाकिया का काम कर रहे हैं जबकि वे भारत का प्रतिनिधित्व करने गए थे। ऐसे में चिट्ठी बाद में या कल ही दूतावास के जरिए भी भेजी और दी जा सकती थी लेकिन विदेश मंत्री के जरिए दिए जाने से प्रधानमंत्री का कद बड़ा होता है। भले ही उनका कद विदेश मंत्री से बड़ा हो भी लेकिन वे राजा नहीं हैं। और वे खुद जाते तो भी भारत का प्रतिनिधित्व करते और विदेशमंत्री ने भी यही किया। विदेश मंत्री को प्रधानमंत्री की चिट्ठी लेकर जाने की जरूरत थी या नहीं इसपर विवाद हो सकता है और अगर उन्होंने चुपचाप सौंप दिया होता तो भी मुद्दा नहीं था। ठीक है कि इसे छिपाने की जरूरत नहीं थी लेकिन बताया नहीं जाता तो खबर नहीं बनती और शीर्षक बनने का मतलब है कि बताया जा रहा है, प्रचार है। मेरे ख्याल से इसकी जरूरत नहीं थी और कम से कम लीड में तो बिल्कुल नहीं। खबर यह नहीं है कि विदेश मंत्री ने चिट्ठी सौंपी। खबर यह है कि विदेश मंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में भाग लेने गए थे, भारत का प्रतिनिधित्व किया और उनके बेटे से मिले। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि प्रधानमंत्री ने खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान से कहा है कि उनके आदर्श हमारे संबंधों के लिए मार्गदर्शक प्रकाश हैं। इंडियन एक्सप्रेस की लीड महिलाओं के लिए रात्रि पाली में काम करने की इजाजत और सुरक्षा से संबंधित नियम जारी किए जाने की खबर लीड है।

द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, वोडाफोन-आईडिया को एजीआर बकाया का भुगतान करने में राहत मिली। यह राशि 87,695 करोड़ रुपए है और खबर के अनुसार 2017-19 से जो बकाया है उसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। इसका भुगतान 2025-26 से 2030-31 के बीच किया जाना है। कुल भुगतान 2031-32 से 2040-41 तक निर्धारित किया है। दि एशियन एज की लीड 20,600 करोड़ की दो हाईवे परियोजना क्लीयर किए जाने की खबर है। दि एशियन एज की सेकेंड लीड का शीर्षक है, विदेश मंत्री ने खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया प्रधान मंत्री का शोक संदेश सौंपा। इस तरह के शीर्षक से विदेश मंत्री देश के नहीं, प्रधानमंत्री के दूत लगते हैं जबकि विदेश मंत्री देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। हमारे यहां प्रधानमंत्री विदेश मंत्री का बॉस नहीं बराबर के लोगों में बड़ा होता है। इसलिए उन्होंने जो शोक संदेश दिया वह प्रधानमंत्री का होते हुए भी देश का है और प्रधानमंत्री का शोक संदेश दिया कहने से लगता है कि वे प्रधानमंत्री के दूत या पत्रवाहक का काम कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड आज भी सुप्रीम कोर्ट की खबर है। आज के शीर्षक के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट आबादी के उपेक्षित या पिछड़े वर्ग के मामले सुनने में प्राथमिकता देगा। मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को सबके लिए बराबर होना चाहिए, प्राथमिकता आबादी के वर्ग के लिए नहीं, मामले के आधार पर दी जानी चाहिए। लेकिन हमने देखा है कि अर्नब गोस्वामी को सप्ताह भर में जमानत मिल गई और सिद्दीक कप्पन दो साल जेल में रहे। सोनम वांगचुक तीन महीने से जेल में हैं। अगर तीनों को फंसाया गया मामला माना जाए तो अंतर नहीं होना चाहिए, अगर अंतर अपराध की प्रकृति या लगाई गई धारा के कारण है तो प्राथमिकता की क्या जरूरत और अगर जरूरत है और कहा जा रहा है कि अब सिद्दीक कप्पन जैसों को प्राथमिकता मिलेगी तो ऐसा हुआ यह स्वीकार करना है और यह सब आम आदमी नहीं कर सकता है या अवमानना कानून के कारण नहीं करना चाहिए। (जारी)

अगली किस्त – दवाइयों के क्षेत्र में कफ सिरप के बाद अब नियामक गड़बड़ी और लापरवाही का मामला। लिंक यह रहा – https://www.bhadas4media.com/dawaiyon-ke-kshetra-mein-cough-syrup-ke-baad/

लेखक, संजय कुमार सिंह से [email protected] के जरिए संपर्क किया जा सकता है।

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