यशवंत सिंह-
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आए ताज़ा बदलाव ने सिर्फ़ राजनीतिक दलों को नहीं, मीडिया के रवैये को भी बेनकाब कर दिया है। अंग्रेज़ी अख़बार ‘द टेलीग्राफ’ का आज का पहला पन्ना इसी बदलाव की सबसे दिलचस्प मिसाल बनकर सामने आया है। कभी भाजपा विरोधी तेवरों के लिए चर्चित रहा यह अख़बार अब ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस पर उसी आक्रामक अंदाज़ में निशाना साधता दिख रहा है।
पहले पन्ने की विशाल हेडलाइन “Madam, This Is What Rejection Looks Like” सिर्फ़ एक समाचार शीर्षक नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक संदेश की तरह पढ़ी जा रही है। तस्वीरों का चयन, भाषा का स्वर और पूरे पेज की संरचना साफ़ संकेत देती है कि अख़बार अब सत्ता के नए समीकरणों के हिसाब से अपनी संपादकीय दिशा तय कर रहा है।
असल सवाल यही है कि क्या मीडिया का चरित्र सत्ता विरोधी होना चाहिए या सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन के साथ विरोध का चेहरा बदल जाना चाहिए। जब भाजपा बंगाल में उभार पर थी और ममता बनर्जी मजबूत स्थिति में थीं, तब ‘द टेलीग्राफ’ भाजपा पर बेहद तीखे हमले करता था। अब जब चुनावी नतीजों ने ममता की राजनीतिक पकड़ को कमजोर किया है, तो वही अख़बार अचानक जनता के “रिजेक्शन” का सबसे मुखर व्याख्याकार बन गया है।
यह घटना भारतीय मीडिया के उस पुराने संकट की याद दिलाती है जिसमें वैचारिक प्रतिबद्धता और सत्ता समीकरण अक्सर एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं। कई अख़बार और चैनल खुद को निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रतीक बताते हैं, लेकिन राजनीतिक हवा बदलते ही उनकी भाषा, प्राथमिकताएँ और नैरेटिव भी बदल जाते हैं। ऐसे में पाठक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मीडिया वास्तव में जनपक्षधर है या सिर्फ़ सत्ता के नए केंद्रों की तरफ़ झुकने वाला संस्थान।
मीडिया का काम किसी दल का स्थायी समर्थक या स्थायी विरोधी बनना नहीं है। उसका काम तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल करना और जनता के सवालों को सत्ता के सामने रखना है। लेकिन जब हेडलाइनें राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल होने लगें, तब पत्रकारिता और राजनीतिक अभियान के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
‘द टेलीग्राफ’ का यह पहला पन्ना सिर्फ़ बंगाल की राजनीति की कहानी नहीं कहता, बल्कि भारतीय मीडिया की बदलती प्रवृत्तियों का भी आईना है। तीर सचमुच वही है, बस निशाना बदल गया है।

टेलिग्राफ़ कोलकाता अख़बार दो दिन पहले तक एक अलंग रूपरंग विचार का था । इसकी हैडलाइन्स चर्चा का विषय रहती थीं जो अब रह सकतीं हैं लेकिन प्रहार की दिशा बदल गयी । जो पहले इसे ट्रोलग्राफ कहते हैं वे अब खुश होंगें कि ट्रोल हमारे विरोधी का हो रहा है ।
क्या अख़बार के मालिकों सम्पादकों में हड्डी नाम की चीज़ ही नहीं होती कि जैसे ही सरकार बदले तो तोप की दिशा ठीक उलट दिशा में घुमा दी जाये । पूरे दस पंद्रह बरस इस अख़बार ने ममता के समर्थन एवं भाजपा के विरोध में हैडलाइंस बनाई और पलटने के लिये एक रात भी नहीं ! वाह अवीक सरकार बंधु , तुम तो किसी के बंधु न हुये । अब फिर कब पलटना यह सब बता सकते हैं । अरे दो चार हफ़्ते निष्पक्ष तटस्थ का नाटक करते फिर जनहित राष्ट्रहित की बात होती और इसी बीच नये मुख्यमंत्री से चर्चा होती रहती । फिर रंग बदलता तो तुम्हारे कई पाठक भी सोचते कि ठीक ही बदला ।
-रामा शंकर सिंह


