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ये कौन लोग हैं जो युद्ध के हालात में पाकिस्तान समर्थित टेलीग्राफ की खबर फैला रहे थे?

अशोक कुमार पांडेय-

टेलीग्राफ, प्रगतिशीलता, चीन और पाकिस्तान

ब्रिटिश अखबार टेलीग्राफ की एक सनसनीखेज रिपोर्ट को सिर्फ़ इसीलिए इंटरनेट पर बाक़ायदा अनुवाद करके फैलाया गया क्योंकि वह पाकिस्तान को बेहतर बताती थी; कोई भी निरपेक्ष व्यक्ति समझ सकता था कि चीन परस्त टेलीग्राफ ने 8 तारीख को वह कथित खबर चीनी हथियारों की श्रेष्ठता साबित करने के लिए ही छापी थी।

एक भी तथ्य ऐसा नहीं था जिसका सबूत दिया गया हो, बस एक मनोहर कहानी जो चीन और पाकिस्तान के समर्थकों के मन को मोह गई और बिना सोचे उसका हिन्दी अनुवाद कर फैलाया जाने लगा।

टेलीग्राफ सब्सक्रिप्शन बेस्ड है, ज़ाहिर है वही पढ़ पाते जिन्होंने सब्सक्रिप्शन खरीदा है, तो उसका प्रॉपगंडा फैलाने के लिए अनुवाद शेयर किया गया। टेलीग्राफ पर चीन से पैसे लेने के आरोप लगभग स्थापित हैं।

खैर, सोचिएगा कौन से लोग हैं जो युद्ध जैसे हालात में पाकिस्तान समर्थक खबर को फैलाने के लिए इतने उत्साहित थे? क्या युद्ध विरोध का मतलब पाकिस्तान समर्थन है? कोई शांति प्रेमी हथियारों की श्रेष्ठता के इस खेल में रुचि क्यों लेगा?

क्या वाकई ‘फेसबुकिया’ प्रगतिशील होने के लिए चीन और पाकिस्तान का समर्थक और भारत का विरोधी होना इतना ज़रूरी है? या उसे फैलाने के लिए भी चीन पैसा खर्च रहा था?

फेसबुकिया इसलिए जोड़ा कि मैंने ज़मीन पर जो प्रगतिशील देखे हैं, वे ऐसे बिल्कुल नहीं।

पाकिस्तानी फर्जीवाड़े की ये खबर भी पढ़ें….

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