
विमल दीक्षित-
अब तेरहवीं स्टेटस सिंबल बन गई है। भारतीय समाज ने इसे शुद्धिकरण पूजा के बजाय समारोह का रूप दे दिया है। पिछले दिनों कानपुर से सटे एक जनपद में तेरहवीं में जाना हुआ। परलोक सिधार गए सज्जन अपने समय के सरकारी ओहदेदार रह चुके थे। परिवरीजन भी बड़े अफसर थे।
स्वजन थे इसलिए जाना भी जरूरी था। ₹3100 में कानपुर से टैक्सी लेकर वहां पहुंचा। देखा कि पूरी सड़क पर भव्य पंडाल लगा हुआ। यातायात के जवान वहां पहुंच रहे लोगों की गाड़ियों को बनाए गए पार्किंग स्थल पर खड़ी करवा रहे थे। तो फोर्स के जवान आगंतुकों को बड़ी इज्जत के साथ अंदर लिए जा रहे थे।
हम जब पहुंचे, गेट पर खड़े मृतक के पुत्र ने एक तिरछी निगाह से देखा और मुंह घुमा लिया। वह केवल आ रहे वीआईपी लोगों की आवभगत में जुटे थे। खैर, इन बातों को दरकिनार करते पंडाल में घुसे तो आंखें और भी चौड़ी हो गई। तरह-तरह के व्यंजन मेज पर रखे थे।
पनीर की बीसों डिश थी। हैरत तो तब हुई जब एक स्टॉल पर गरम-गरम इडली डोसा बनते देखा। हमने एक संबंधी से पूछा कि तिरहीं में इडली डोसा। बोले हां दरअसल इस तरह के कार्यक्रम में देर हो जाती है। खाना देर से शुरू होता है इसलिए जिनको अधिक भूख लगती है उनके लिए इडली डोसा की व्यवस्था रखी गई है।
लगभग 2:00 बज रहा था, खास रिश्तेदार झोला झंडा लेकर बाहर आते दिखे। समझ गया कि घर में पूजा समाप्त हो गई। अंदर से निकलने वाले सभी मेहमान बड़े खुश नजर आ रहे थे। मैंने पूछा कि क्यों खुश हो। बोले भैया ऐसी तिरहीं रोज खाने को मिले तो जीवन बदल जाए।
मतलब…, वह बोले भैया दिव्य भोजन के साथ-साथ ग्यारह हजार का लिफाफा और सूट का कपड़ा भी मिला है। अब मेरी आंखें चौड़ी होने की बारी थी। समझ में नहीं आ रहा था यह तिरहीं का मौका है या कोई शादी समारोह।
हमने किसी तरीके से भोजन लिया और वहां से कानपुर के लिए रवाना हो गए। रास्ते भर यही सोचते आया की शुद्धिकरण के नाम पर यह कैसा मजाक किया जा रहा है। तिरहीं कोई अच्छा कार्य नहीं है। मरने वाले का कोई नाम नहीं ले रहा। किसी ने एक आंसू नहीं बहाया। बल्कि हंसी ठहाके गूंज रहे हैं।
हमें अच्छी तरह याद है कि ऐसे मामलों में लोग मृतक के घर जाकर उनके जीवन से संबंधित अच्छी-अच्छी बातें करते थे। और श्रद्धांजलि देते थे। भोजन में कदुआ पूरी रायता और बूंदी के अलावा कुछ नहीं होता था। लगता है समाज बहुत तेजी के साथ बदल रहा है। और हमारी सोच अभी भी सन् 80 वाली है।


