श्रीनगर। कश्मीर में पत्रकारों पर पुलिस दबाव और पूछताछ का सिलसिला लगातार गहराता जा रहा है। जानकारी के अनुसार, श्रीनगर स्थित वरिष्ठ पत्रकार और देश के प्रमुख अंग्रेजी दैनिक द हिंदू का प्रतिनिधित्व करने वाले पीरज़ादा आशिक को 20 जनवरी को जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी का फोन आया, जिसमें उनसे पुलिस से मिलने को कहा गया। जब आशिक ने पूछताछ का कारण जानना चाहा तो कॉल करने वाले पुलिसकर्मी ने कहा कि उसे खुद नहीं पता है।
सूत्रों के मुताबिक, उस दिन पीरज़ादा आशिक शहर से बाहर थे और उन्होंने लौटने पर आने की बात कही, जिस पर पुलिसकर्मी ने कहा कि वे श्रीनगर लौटने के बाद मिल सकते हैं।
इससे पहले 20 जनवरी को श्रीनगर में राष्ट्रीय अखबारों के लिए काम करने वाले कई पत्रकारों को बिना कारण बताए पुलिस द्वारा “तलब” किया गया। द इंडियन एक्सप्रेस के बशारत मसूद और हिंदुस्तान टाइम्स के आशिक हुसैन को भी इसी तरह के फोन कॉल आए थे। बशारत मसूद, जो दो दशकों से अधिक समय से घाटी में रिपोर्टिंग कर रहे हैं, को चार दिनों में कुल 15 घंटे से ज्यादा समय तक थाने में बैठाए रखा गया। इस दौरान उनसे एक कथित “गलती” स्वीकार करने वाला बांड साइन करने को कहा गया, जिसे उन्होंने करने से इनकार कर दिया।
बताया गया कि मसूद को यह भी नहीं बताया गया कि उन्हें किस वजह से बुलाया गया है। केवल बांड के मसौदे से संकेत मिला कि मामला उस रिपोर्ट से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने घाटी की मस्जिदों और उनके प्रबंधन को लेकर पुलिस द्वारा मांगी गई जानकारी पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को कवर किया था।
हिंदुस्तान टाइम्स ने स्पष्ट किया है कि उसने जम्मू-कश्मीर पुलिस से लिखित समन देने को कहा है, जिसके बिना उनका रिपोर्टर पुलिस के बुलावे पर नहीं गया है।
सूत्रों का कहना है कि हाल के दिनों में जिन पत्रकारों को तलब किया गया, उनमें से अधिकांश को इसी मुद्दे से जुड़ी रिपोर्टिंग के कारण बुलाया गया। द वायर ने जब अन्य स्थानीय पत्रकारों से बात करने की कोशिश की तो कई ने, यहां तक कि गुमनाम रूप से भी, स्थिति पर बोलने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि उन्हें आशंका है कि उनके फोन पहले से निगरानी में हो सकते हैं।
स्थानीय पत्रकारों ने यह भी चिंता जताई कि कई मीडिया संस्थान अपने उन पत्रकारों के समर्थन में सार्वजनिक रूप से सामने आने में देरी कर रहे हैं, जिन्होंने वर्षों तक उनके लिए काम किया है।
इस पूरे घटनाक्रम की जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टियों, कांग्रेस समेत राष्ट्रीय विपक्षी दलों, वरिष्ठ पत्रकारों, संपादकों और प्रेस संगठनों ने कड़ी निंदा की है। डिजिटल मीडिया संगठन डिजिपब ने बयान जारी कर कहा कि “जनहित की पत्रकारिता को अपराध की तरह पेश करना और बिना उचित प्रक्रिया के पत्रकारों से बांड पर हस्ताक्षर कराने का दबाव प्रेस की आज़ादी पर गंभीर हमला है।” संगठन ने जम्मू-कश्मीर पुलिस से ऐसी कार्रवाइयां तत्काल रोकने की मांग की है।
वहीं, एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी कहा कि “लोकतंत्र में, जहां मीडिया एक प्रमुख स्तंभ है, इस तरह की मनमानी कार्रवाइयों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।”
पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाएं कश्मीर में मीडिया को डराने और दबाने के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा हैं, जो अगस्त 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के बाद और अधिक तीव्र हो गया है।


