The Indian Newsroom – भारतीय मीडिया पर एक जरूरी पुस्तक

Samatendra Singh : कुछ दिन पहले भारतीय मीडिया पर एक जरूरी किताब आयी है. The Indian Newsroom. यह किताब संदीप भूषण ने लिखी है. संदीप वरिष्ठ पत्रकार हैं. एनडीटीवी में मेरे सीनियर रहे हैं. संजीदा शख्सियत हैं. और उन्होंने यह किताब भी बड़ी संजीदगी से लिखी है. अगर आप मीडिया में हैं, मीडिया के छात्र हैं या फिर आप मीडिया में आए बदलावों को समझना चाहते हैं तो यह किताब जरूर पढ़िएगा.

इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो आपकी समझ को विस्तार देगा. खासकर रिपोर्टर की घटती और एंकरों की बढ़ती अहमियत के पीछे का गणित समझ में आएगा. इसमें एनडीटीवी, सीएनएन न्यूज 18 और टाइम्स नाउ के बीच का अंतर है. उनके भीतर की संरचना है. डॉ रॉय के गिरोह में शामिल होने की शर्ते हैं और उनके खेल हैं. इसमें वोल्कर प्रकरण में नटवर का निपटाया जाना भी है.

संदीप भूषण ने बहुत करीने से चीजों को परोसा है. किसी भी मीडिया संस्थान के कुछ अनिवार्य अंग होते हैं. मीडिया संस्थान को चलाने के लिए पूंजी की जरूरत होती है इसलिए इसमें प्रमोटर होते हैं. नेतृत्व के लिए संपादक की जरूरत होती है, डेस्क की जरूरत होती है, खबरों की प्रस्तुत करने के लिए एंकरों की जरूरत होती है और जमीन से खबरों को आप सभी तक पहुंचाने के लिए रिपोर्टरों की जरूरत होती है. मतलब प्रमोटर, संपादक, एंकर और रिपोर्टर मिल कर एक टीवी न्यूज संस्थान को बनाते हैं. ये उसके मुख्य अंग हैं.

इस किताब में इन सबकी चर्चा है. संदीप ने सिलसिलेवार तरीके से बताया है कि किस तरह सुनियोजित तरीके से रिपोर्टरों को हाशिए पर ढकेला गया. वो खुद रिपोर्टर रहे हैं इसलिए वो इस पूरी प्रोसेस को बेहतर तरीके से समझा सके हैं.

एंकरों को सेलिब्रेटी स्टेटस मिलना, सत्ताधारी दल से उनके रिश्ते, नेताओं के साथ उनका गठजोड़… इस पुस्तक में इन सब मुद्दों पर चर्चा है. यह भी किस तरह संपादकों ने यह सब होने दिया और धीमे-धीमे उन्होंने अपने ही रिपोर्टरों को पीछे ढकेल दिया… यह अचानक नहीं हुआ है कि कोई मीडिया संस्थान किसी राजनीतिक दल की प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने बीट रिपोर्टर को छोड़ कर अपने एंकर को भेजे और उससे सवाल पूछवाए.

संदीप ने The Indian Newsroom में बताया है कि कैसे जब प्रमोटर न्यूजरूम कंट्रोल करने लगते हैं तो उनके हित साधने के लिए खबरों का खेल होने लगता है. भारतीय मीडिया पर चर्चा करते हुए उन्होंने वर्ल्ड मीडिया पर भी काफी कुछ लिखा है.

मीडिया बहुत बड़ा सब्जेक्ट है. यह सियासी खेल का सबसे असरदार औजार है. इसलिए इस पर नियंत्रण का बड़ा खेल निरंतर चलते रहता है. बहुत सी शक्तियां इसे नियंत्रित करती हैं. इसलिए आप देखेंगे कि जब भी सियासी समीकरण बदलते हैं तो मीडिया की संरचना, उसका स्वरूप और उसका तेवर सब बदलने लगता है. यह सब एक दूसरे में गूंथा हुआ है. इस कदर कि अलग करना मुश्किल हो जाता है.

संदीप भूषण ने सियासी संबंधों पर एक चैप्टर लिखा है. In the service of Power. इस चैप्टर में उन्होंने बहुत कुछ समेटने की कोशिश की है. वह चाहते तो सिर्फ दो-चार संस्थानों पर केंद्रित रख सकते थे. इससे विषय को विस्तार देने में सहूलियत रहती. बहुत कुछ समेटने के क्रम में कई बार विषय बोझिल हो जाता है. खैर इसमें जी न्यूज, टीवीआई, सीएनबीसी, एनडीटीवी समेत बहुतेरे संस्थानों के बनने की कहानी है. कैसे सियासी-आधिकारिक और कारोबारी संबंधों ने इन संस्थानों को जन्म दिया.

इस चैप्टर में उन्होंने यह भी बताया है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के क्रम में और उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद किस तरह से कई मीडिया संस्थानों में नेतृत्व बदल गए. एनडीटीवी के खिलाफ ईडी की जांच होने लगी. Open मैगजीन से, उससे पहले द हिंदू से स्थापित पत्रकारों की विदाई हो गई.

हालांकि संदीप ने यह नहीं बताया है कि Open को जिस कारोबारी समूह ने शुरू किया था उसके मालिक राम प्रसाद गोयनका पुराने कांग्रेसी थे. सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद गोयनका राज्य सभा में कांग्रेस के सांसद भी थे. इसी ओपन मैगजीन ने रहेजा के आउटलुक मैगजीन के साथ मिल कर 2G घोटाले में सोनिया गांधी को बचाने के लिए आर्थिक घोटाले पर होने वाली बहस को मीडिया बहस में परिवर्तित कर दिया था. आउटलुक के संपादक विनोद मेहता भी कांग्रेसी पत्रकार थे. अपनी किताब Editor Unplugged में अपने हाफ कांग्रेसी होने का जिक्र उन्होंने खुद ही किया था. यही वजह है कि उन्होंने 2G घोटाले में एक साथ आउटलुक के मालिक और कांग्रेस दोनों के कुछ पुराने हिसाब चुकाए थे.

2013 में आरपी गोयनका इस दुनिया से चले गए. उनके बाद RPG ग्रुप की बागडोर उनके बच्चों के हाथ में आ गयी. यह कारोबार इतना बड़ा है कि कुछ पत्रकारों के लिए उसे दांव पर नहीं लगाया जा सकता. इसलिए उन्हें विदा कर दिया गया. कई दूसरे संस्थानों में भी वही हुआ. मुझे लगता है कि अगर 2014 में कांग्रेस फिर से जीत जाती तो मीडिया में यह बदलाव नहीं होते. यह बदलाव सिर्फ इसलिए हुए क्योंकि बहुत से लोग खुद को कांग्रेस समर्थक पत्रकार/मालिक या फिर मोदी विरोधी पत्रकार/मालिक के तौर पर स्थापित कर चुके थे. केंद्र में जब सत्ता बदलेगी तो ऐसे बदलाव फिर से होंगे.

आखिर में, भारतीय मीडिया का ढांचा समझने के लिए आपको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए. इससे पता चलेगा कि किस तरह हमारे यहां एक ऐसा मीडिया तैयार किया गया है जो गुलाम है. जो किसी लिहाज से स्वतंत्र नहीं है. न आर्थिक तौर पर और ना ही राजनीतिक तौर पर.

मैं इस बेहद जरूरी पुस्तक के लिए संदीप भूषण को बहुत बहुत धन्यवाद देता हूं.

वरिष्ठ पत्रकार समरेंद्र सिंह की एफबी वॉल से साभार।

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