
दयाशंकर शुक्ल सागर-
मुझे नहीं पता कि प्रतिष्ठित टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप को the speaking tree नाम के आध्यात्मिक कॉलम शुरू करने का आइडिया कहां से आया होगा। लेकिन ये याद है कि जब से पढ़ने लिखने की नैसर्गिक समझ पैदा हुई तब से ये कॉलम पढ़ रहा हूं। संसार भर की तामाम सियासी व दुनियावी चालबाजियों, हादसों, हिंसक और अप्रिय घटनाओं से रंगे अखबार में एक कोना ऐसा भी हो जो आपको एक अलग और अनोखी अध्यात्म की दुनिया में ले जाए और समझाए कि ये सब जो आपके इर्द-गिर्द चारों तरफ घट रहा है उसके मूल में क्या है।
अखबार के मालिकान धर्म भीरू जैन परिवार से ताल्लुक रखते हैं। बेशक इसकी प्रेरणा जीवन पर संदेह करने और जीवन को अस्वीकार करने वाली उसी जैन परंपरा से आई होगी जिसका मन ताउम्र आत्म ज्ञान के लिए भटकता रहता है।
मुझे लगता है कि इस कालम का नाम The speaking tree: a study of Indian culture and society से लिया गया होगा। इसके लेखक रिचर्ड लैनॉय हैं और इस किताब को 70 के दशक में ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने छापा था। ये किताब भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और समाज के विशाल और जटिल विषय को व्यापक पैमाने और विभिन्न दृष्टिकोणों से पेश करती है। बहरहाल कहीं मिले तो पढ़ें।
जैसा कि मैंने बताया युवावस्था के शुरूआती दिनों से मैं the speaking tree का पाठक रहा। लिखना पढ़ना जब इस नमुराद जिंदगी का पेशा ही बन गया तो तमाम अच्छे अखबारों और प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में भी छपने लगा। लेकिन नवभारत टाइम्स में the speaking tree कॉलम में आज जब पहली बार मेरा ये लेख छपा तो एक गजब के रोमांच और आत्म संतुष्टि का अहसास हो रहा है।
इन दिनों बारिश में इस हरियाली से लकदक पहाड़ों के बीच शिमला के खुशनुमा मौसम में अध्यात्म और दर्शन के जरिए संसार के गूढ रहस्यों में उलझा हूं। कोई साथी है नहीं तो लंबें, ऊंचे, आलौकिक देवत्व का अहसास कराते देवदार के वृक्षों से संवाद कर रहा हूं। और अब ये लगने लगा है कि सदियों से मौन खड़े वृक्ष सचमुच सुनते और बोलते हैं। अब समझ सकता हूं कि पेड़ पौधों की आवाज की फ्रिक्वेंसी को रिकॉर्ड करके हमारे महान वनस्पति शास्त्री व वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस ने कैसे पूरी दुनिया को हैरान कर दिया होगा।
पढ़े the speaking tree कॉलम में ये लेख…


आईआईएमसी से पढ़े दयाशंकर शुक्ल इंडिया टुडे जैसे संस्थानों में कार्यरत रहे हैं.


