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आज के अखबार : 50 दिन में सपनों का भारत बनाने वाले मोदी जी अब बंगाल की जनता से ‘एक मौका’ मांग रहे हैं

संजय कुमार सिंह

द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंगाल के मतदाताओं से कहा है कि कांग्रेस, वामंपथ और तृणमूल को आजमा चुके राज्य के मतदाता उन्हें ‘एक मौका’ दें। यह खबर मुझे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं दिखी। टेलीग्राफ में भी यह खबर अंदर के पन्ने पर है। यह तथ्य है कि तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार में मंत्री रह चुकी हैं और अभी उनके खिलाफ भाजपा के उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस में उनके साथ थे। इसलिए प्रधानमंत्री अगर एक मौका मांग रहे हैं तो वह भाजपा के लिए नहीं, अपने लिए है। देश देख रहा है कि पहले की भाजपा सरकार सत्ता में रही, चुनाव लड़ी हार गई। नरेन्द्र मोदी की सरकार वोट चोरी से चुनाव जीतती है और एपस्टीन से कई बार मिल चुके तथा मिलने का मकसद नहीं बताने वाले हरदीप पुरी को मंत्री बनाए हुए है। भाजपा नेता ने उनके मंत्रियों पर आरोप लगाए हैं और बताया है कि मंत्री बनने की क्या शर्त होती है। पुरानी समर्थक मधु किश्वर ने कहा है कि वे इसी कारण मोदी के करीब नहीं गईं। सबको पता है कि उन्हें कोई लाभ नहीं मिला लेकिन ट्रोल सेना ने यह आरोप लगाया कि उन्हें लाभ नहीं मिला इसलिए विरोधी हो गईं जबकि इस आरोप से मधु किश्वर का दावा ही मजबूत होता है। मीडिया और सरकार इस पर शांत है। यही हालत असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा पर कांग्रेस नेता पंकज खेड़ा के आरोप के संबंध में है। आप जानते हैं कि आरोप लगाने के अगले ही दिन असम पुलिस के 100 कर्मी पवन खेड़ा को गिरफ्तार करने दिल्ली में उनके घर पहुंच गए। भारी खर्च वाली इस कार्रवाई से पहले यह सुनिश्चित करने की भी जरूरत नहीं समझी गई है कि पवन खेड़ा घर पर हैं भी या नहीं। अखबारों में विश्व गुरू के इस शासन की तारीफ भी नहीं है। खबरों का बुरा हाल है। पता ही नहीं चलता स क्या है, झूठ क्या। फैक्ट चेक भी झूठ होते हैं।   

भाजपाई मुख्यमंत्री की पत्नी के तीन विदेशी पासपोर्ट में से एक के बारे में कहा गया कि संबंधित देश ने उसके असली होने से इनकार किया है। प्रचार कर दिए जाने के बाद संबंधित देश ने कहा कि उसने ऐसा नहीं कहा है। बाद में संबंधित देश की यह पोस्ट सोशल मीडिया से गायब हो गई। पता नहीं नकली थी या हटवा दी गई। इसी तरह आरएसएस प्रमुख की एक चिट्ठी सोशल मीडिया में घूम रही थी जो प्रधानमंत्री को संबोधित थी। इसमें प्रधानमंत्री से पूछा गया था, क्या गृह मंत्री श्री अमित शाह जी किसी अनैतिक समझौते के तहत श्री हिमंता बिस्वा सरमा एवं उनकी पत्नी को बचाने का प्रयास कर रहे हैं तो क्या भाजपा ने चरित्र, नैतिकता और ईमानदारी का पूर्णतया त्याग कर दिया है? यदि नहीं, तो फिर एक ऐसा व्यक्ति, जिसकी पत्नी तीन मुस्लिम देशों की नागरिकता/पासपोर्ट रखती हो, भाजपा में क्या कर रहा है? माननीय प्रधानमंत्री जी, सत्ता के लोभ में अंधे होने की बजाय कृपया आँखें खोलिए। असम की जनता से अपील कीजिए कि वे श्री हिमंता बिस्वा सरमा का बहिष्कार करें। हम एक राज्य में सत्ता से दूर हो जाएँ, तो हो जाएँ, लेकिन इससे जनता के बीच सही संदेश जाएगा कि भाजपा भ्रष्टाचार और नैतिकता को बर्दाश्त नहीं करती। मैं इस पत्र की सत्यता की पुष्टि नहीं कर पाया। लेकिन यह पत्र सोशल मीडिया पर है। मुझे इसकी जानकारी है लेकिन मीडिया को नहीं है और मीडिया ने ना तो इस सूचना का उपयोग किया और ना ही इसे (गलत होने के कारण) हटवाया। उल्टे जिसने उपयोग किया उसने थोड़ी देर बाद डिलीट कर दिया। यह पत्रकारिता की स्थिति है और इसमें भाजपा के खिलाफ खबरें नहीं होती हैं और भाजपा विरोधियों के खिलाफ झूठी, अनर्गल और आपत्तिजनक खबरें भी चलती हैं।

अखबारों में खबर भाजपा के फायदे के हिसाब से छपती है। आज युद्ध, समझौते से संबंधित बातचीत के बेनतीजा रहने के साथ आशा भोंसले के निधन की खबरें प्रमुख हैं लेकिन बंगाल के लिए प्रधानमंत्री के भाषण और भाजपा के काम व खबरें रेखांकित करने लायक हैं। गौरतलब है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार के बाद भाजपा ने रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया और उनके काम सर्वविदित हैं। इसी तरह बिहार में भाजपा की जीत के बाद नीतिश कुमार को राज्यसभा का सदस्य बनना और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं देना, कल अचानक मुख्यमंत्री और विधायक दल के नेता के चयन के लिए पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाना बताता है कि भाजपा चुनाव जीतकर भी जनता के लिए क्या कुछ कर पाती है। दि एशियन एज और देशबन्धु में आज एक जैसी खबर है, नीतिश कुमार 15 अप्रैल को (पद) छोड़ देंगे, 15 को नए मुख्यमंत्री होंगे। देशबन्धु का शीर्षक है, कल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे सकते हैं नीतिश। जाहिर है, इस्तीफा देने का कोई कारण होगा और खबर कारण भी है। खबर में यह सब नहीं बताया गया है लेकिन भाजपाई राजनीति है और इससे संदेश जाता है कि केंद्र सरकार को समर्थन देने वाले दो राजनीतिक दलों के नेताओं नीतिश कुमार और चंद्रबाबू नायडू में एक का यह हाल है कि वे इस्तीफा दे देंगे। वह गुस्से में या किसी कारण से नहीं है, अचानक नहीं है और दे रहे हैं तो कारण यह भी है या यही है या यह भी हो सकता है कि भाजपा ऐसा चाहती है और भाजपा जो चाहती है वह हो रहा है तो भाजपा मजबूत है। मोदी जी महान हैं। इसीलिए यह खबर दि एशियन एज में पांच कॉलम में छपी है। दि एशियन एज की खबर में लिखा है, … इसके बाद संभावना है कि जनता दल (एकीकृत) के मुखिया पद छोड़ देंगे ताकि भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार बने। नीतिश कुमार अब राज्यसभा के सदस्य हैं। रिटायर नहीं हुए हैं और भाजपा ने जबरदस्ती नहीं की है। यह सब लिखा नहीं है लेकिन समझा जा सकता है। खबरों से आपको पता चला हो या नहीं, नाटक काफी समय से चल रहा है।

इसी तरह, हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन कॉलम की खबर का शीर्षक है, भाजपा ने महिला आरक्षण विधेयक पर (संसद के) विशेष सत्र से पहले व्हिप जारी की। मुझे लगता है कि इससे पहले, विशेष सत्र से संबंधित खबरें वैसे नहीं छपी हैं जैसे छपनी चाहिए थी लेकिन सच्चाई यह है कि महिला आरक्षण बिल 2023 में संसद से पास हुआ था। उस समय, विपक्षी पार्टियों ने यह बात उठाई थी कि इस बिल से 33% महिला आरक्षण 2034 तक टल जाएगा, और उन्होंने मांग की थी कि इसे तुरंत लागू किया जाए। तब सरकार ने विपक्ष की मांग को नज़रअंदाज़ कर दिया था। अब, अचानक, बंगाल और तमिलनाडु में ऐन चुनाव के मौके पर मोदी (सरकार) ने फैसला किया है कि परिसीमन 2026 की जनगणना से पहले ही कर दिया जाएगा। नवोदय टाइम्स की एक खबर का शीर्षक है, “महिला आरक्षण अधिनियम को लागू करने का आ गया है समय : मोदी”। भारत की असल आबादी के आधार पर परिसीमन करने के बजाय, मोदी सरकार अपना ही अनजान फॉर्मूला लागू कर सकती है। आप जानते हैं कि 2021 में होने वाली जनगणना अब शुरू हुई है। अचानक आए परिसीमन के इस विचार के बारे में देशवासियों को संतुष्ट करना मुश्किल होगा क्योंकि इसका कोई आधार नहीं है। इसलिए, मोदी सरकार अचानक परिसीमन पर ज़ोर दे रही है और दावा कर रही है कि “इससे महिला आरक्षण को जल्द लागू करने में मदद मिलेगी।” महिला आरक्षण को लागू करने में जल्दबाजी का मतलब समझा जा सकता है। वह भी तब जब 10 दिन बाद चुनाव निपटने पर भी ऐसा किया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं है कि पार्टी अगर महिला आरक्षण देना चाहे तो वैसे भी दे सकती है और इसके लिए कानून का आवश्यकता नहीं है फिर भी क्या स्थिति है।

एक स्थिति यह भी है कि नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी महिलाओं के भले तथा के लिए नहीं जानी जाती है। ममता बनर्जी का भरपूर विरोध करती रही है। चुनाव हराने और सत्ता पर कब्जा करने में बिल्कुल पीछे नहीं है। फिर भी चुनाव प्रचार के लिए प्रधानमंत्री ने जो कहा है और आज जो शीर्षक है, वे इस प्रकार हैं (1) हिन्दुस्तान टाइम्स – चुनाव अभियान के तहत ताजा हमले में मोदी ने टीएमसी को टुकड़े-टुकड़े गैंग से जोड़ा। आप जानते हैं कि देश में ऐसा कोई गैंग नहीं है और कन्हैया कुमार के प्रदर्शन तथा गिरफ्तारी के बाद ये नाम चले हैं। आप समझ सकते हैं कि प्रधानमंत्री किस स्तर की बात करते हैं। एआई के अनुसार, यह एक विवादित और राजनीतिक रूप से पक्षपाती शब्द है। इसका कोई तय या कानूनी अर्थ नहीं है। अलग-अलग राजनीतिक दल और लोग इसे अलग नजरिये से देखते हैं—कुछ इसे उचित आलोचना मानते हैं, तो कुछ इसे विरोधियों को बदनाम करने वाला टैग कहते हैं। फिर भी यह शीर्षक टाइम्स ऑफ इंडिया और हिन्दुस्तान टाइम्स में भी पहले पन्ने पर है। अमर उजाला में दूसरे पहले पन्ने की सेकेंड लीड का शीर्षक है, न्यायिक अफसरों के घेराव में कांग्रेस उम्मीदवार हिरासत में। आप जानते हैं कि एसआईआर के तहत लाखों लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है। इस क्रम में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने के मामले की जांच सीबीआई कर रही है और एक उम्मीदवार का नाम सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर क्लीयर हो पाया है। अब खबर है कि उम्मीदवार को गिरफ्तार कर लिया गया है। कुल मिलाकर बंगाल में चुनाव लड़ना युद्ध जीतने की तरह हो गया है पर खबरें वैसे नहीं छप रही हैं। जो छप रही हैं वो एक तरफा ही हैं और ज्यादातर में प्रधानमंत्री के आरोप भर हैं। 

इसके अलावा, आज के अखबारों में टीएमसी पर प्रधानमंत्री के आरोपों की कमी नहीं है। दि एशियन एज में एक शीर्षक है, सिलीगुड़ी कॉरीडोर लिंक को खत्म करने की साजिश का समर्थन कर रही है टीएमसी। इस खबर का उपशीर्षक है, ममता (बनर्जी की)  पार्टी आदिवासी विरोधी और विकास विरोधी है। असल में यह खबर टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन वाली ही है। द हिन्दू की एक खबर का शीर्षक है,  राज्य में चुनाव से पहले ईडी ने पश्चिम बंगाल में कार्रवाई बढ़ाई। कहने की जरूरत नहीं है कि सिर्फ लेवल प्लेइंग फील्ड के लिए चुनाव के समय विपक्षी दलों पर छापे जैसी कार्रवाई नहीं होनी चाहिए। पर भाजपा शासन में यह आम है लेकिन खबर ऐसे छपती है जैसे विपक्ष की सरकारें भ्रष्ट हों और उनके खिलाफ कई मामले हैं। सच्चाई यह है कि अरविन्द केजरीवाल ने अपने खिलाफ मामले की सुनवाई कर रही जज से कहा है कि वे इस मामले को नहीं सुनें। बाद में इसका कारण सार्वजनिक हो गया। एक तो यह कि वे अपने बच्चों के लिए सरकार से लाभ प्राप्त करती रही हैं और उनके बच्चे सरकारी वकील हैं। उनके बॉस देश के सॉलीसिटर जनरल होंगे और केजरीवाले के खिलाफ मामलों  में सरकार की तरफ से वही होते हैं। यह हितों के टकराव का मामला है लेकिन जज सहिबा इस मामले से खुद अलग नहीं हो रही हैं। उल्टे कुछ मीडिया वाले खबर चला रहे हैं, सीबीआई ने कहा, आरएसएस सेमिनार में शामिल होना पक्षपात नहीं है। सच्चाई यह है कि किसी मामले से अलग होने का फैसला जज खुद करते रहे हैं। मैंने पहली बार सुना कि किसी पीड़ित ने ऐसी मांग की। ऐसे मामले को साबित करना और सार्वजनिक तौर पर ऐसी मांग करना कितना मुश्किल है आप समझ सकते हैं। फिर भी करनी पड़ी यह बहुत शर्मनाक स्थिति है। उल्लेखनीय है कि उत्तराखंड काडर के आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी के मामलों से अब तक 16 जजों ने खुद को सुनवाई से अलग कर लिया है। यह भी मोदी सरकार के समय में ही हुआ है और देश के न्यायिक इतिहास में रिकॉर्ड है। बच्चों की ‘नौकरी’ और लाभ का मामला तो छिपाए नहीं छिपने वाला है। फिर भी मामले से अलग नहीं होना किसी मजबूरी में भी हो सकता है लेकिन मीडिया के लिए यह सब मुद्दा नहीं है।

मीडिया के लिए मुद्दा तो जजों पर भ्रष्टाचार का मामला भी नहीं है। यशंवत वर्मा का मामला यूं ही खत्म होने पर है। दुनिया शायद ही कभी जान पाए कि उनके घर पर जले बताए गए पैसे किसके थे और न्यायमूर्ति वर्मा के थे तो कमरे में खुले में क्यों रखे थे। लोहे का फायर सेफ अलमीरा क्यों नहीं खरीदा गया या यह आईडिया ही नहीं आया। इंडियन एक्सप्रेस में एक गंभीर खबर छपी है कि कैंसर के किसी जादुई टीके की खबर लीक हुई और शिखर के अस्पतालों ने इसके फर्जी खुराक डेढ़ लाख प्रति टीका की दर से बेच लिए। ऐसी हालत और सरकार में आज देशबन्धु की एक खबर का शीर्षक है, नेताजी के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस टीएमसी में शामिल। इस खबर के साथ हाईलाइट किया हुआ अंश है, भाजपा के साथ जुड़ाव को ‘ऐतिहासिक गलती’ बताया। यह तब हुआ है जब ममता बनर्जी ने कहा है कि एसआईआर देश का सबसे बड़ा घोटाला है। दूसरी ओर, यह तथ्य है कि नरेन्द्र मोदी बंगाल की सत्ता पर काबिज होने की कोशिश जमाने से कर रहे हैं और 2015 में नेताजी से संबंधित फाइलों को सार्वजनिक करने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बंगाल में विधानसभा चुनाव 2016 में हुए थे। राष्ट्रीय अभिलेखागार में दर्ज सैकड़ों फाइलों को डीक्लासिफाई करने का राजनीतिक संकेत यही संदेश देना था कि सरकार ऐतिहासिक तथ्यों को सामने लाना चाहती है। यह अलग बात है कि फाइलों से नेताजी की मृत्यु पर कोई निर्णायक निष्कर्ष सामने नहीं आया। कई महत्वपूर्ण दस्तावेज या तो उपलब्ध नहीं थे या अभी भी विवादित हैं। ऐसे में नेताजी के प्रपौत्र से संबंधित यह खबर महत्वपूर्ण है। आपको कहीं और दिखी क्या?

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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